संदेश

ग़ज़ल - आजतक कदर न की पैसे की

  आजतक कदर न की पैसे की | और कहता रहा-तेरी ऐसे की, तैसे की ||   दुनिया देख-देख के सर धुनती है | क्या करे समझ का मुझ जैसे की ||   बीन बजा-बजा के लोग हार गए | समझ में आए तब ना कुछ भैंसे की ||   दुनिया जलती है बहुत, मेहनत देखती है नहीं | पूछती फिरती है, ‘इतनी तरक्की कैसे की’ ?   मुस्कानें बांटीं, गम बटोरे और चलते रहे | जिन्दगी हमने अपनी गुजर-बसर ऐसे की ||

समंदर का गीत

समंदर आज भी वही गीत गाता है जो उसने पहली बार गाया था जब वो अस्तित्व में बस आया था | समंदर की रेत के हर कण और समंदर का हर जड़ -चेतन मिलेंगे तुम्हें उसी आदिम गीत में मगन | फिर इसमें अचरज क्यूँ हो कि समंदर जब भी लहरों के सुर में गाता है हर सुनने वाला गीतमुग्ध रह जाता है | २१-७-२०११

त्रिवेणी- शब्द जो पहले सजाते थे, अब लजाते हैं

किसी को नेता कह दो तो गाली लगती है | किसी को बाबू कह दो, साली, लगती है | शब्द जो पहले सजाते थे, अब लजाते हैं |

खुदा हाफिज़ दामिनी

दरिन्दे  भरे पड़े हैं दुनिया में  संभल के चलना माँओं -बहनों-बेटियों  खुदा हाफिज़. सरकार से ना रखो कोई उम्मीद  तो ही अच्छा. सरकार को वैसे भी कई जरूरी काम है. सरकार को इज़्ज़त से क्या, बस वोट चाहिए. न्याय की देवी की आंखों पे भी पट्टी है बँधी. और उसके यमदूतों से बचकर ही रहो, इसी में खुदा की रहमत है. हाँ अगर चिड़िया के खेत चुग जाने                      के बाद पछताने का और    वक्त और पैसा लुटाने का इरादा हो तो न्याय की दहलीज़ पे स्वागत है तुम्हारा.         पुलिस को देख् के झूठे dhandhas ना पालना मन में. वो तो होते हुए भी ना होने के बराबर है. आजकल तालियाँ बड़ी अच्छी वो बजाते हैं, और, नेताजी के जूते साफ करते पाये जाते हैं. प्रशासकों की तरफ़ भी उम्मीद से  मत देख बैठना बेचारे कितने सालों से रीढ़ की हड्डी तलाशे फिरते हैं. सन् पछत्तर में नसबंदी के बहाने  इनकी रीढ़ की हड्डी ही गायब कर दी, तबसे ये ...

धर्म की आंच पर सिक रही राजनीति की रोटियाँ

२०-८-२०१२ धर्म की आंच पर सिक रही राजनीति की रोटियाँ | हर कोई फिट कर रहा अपनी- अपनी गोटियाँ || व्यवस्था का बूढ़ा गिद्ध है हरपल चौकन्ना | जनता जिसे दिखती है बोटियाँ-ही-बोटियाँ || अपने ही देश में, लोग बेगाने हुए | दर-दर भटक रहे बनके घुमंतू भोटियाँ || दल-दल के दांत है दिखाने के और ही | मगर हमाम में सब, यार हैं   लँगोटियाँ || ---केशवेंद्र ---

शेर सिंह का लोकतंत्र

१.       शेर सिंह का लोकतंत्र जंगल के जानवरों की सभा में एक मरियल से चूहे ने जिसने शेर को जितने के लिए मतदान किया था, जंगल के राजा शेर से बड़ी हिम्मत उठा कर एक सवाल पूछने की जुर्रत की – “महाराज, आपने वादा किया था कि चुनाव जीतने के बाद आप हम गरीब छोटे जानवरों का और हमारे विकास का पूरा ध्यान रखेंगे मगर एक साल में भी ऐसा कुछ हुआ नहीं.” शेर सिंह जो चुनाव के वक्त इतने विनम्र थे कि हर एक चूहे-खरगोश –हिरन तक के घर जा वोट माँगा था, दहाड़े- “गिरफ्तार करो कमबख्त को, ये सरकार गिराने की साजिश करने वालों में शामिल है. ऐसे लोगों को मैं अच्छी तरह जनता हूँ, ये लोग समाज और लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है.” चूहा गिरफ्तार कर लिया गया और आजकल वो माओवादी होने के आरोप में जेल में सड़ रहा है.

ऐसा करे राम ना

वैसा ही है समंदर को शब्दों में बांधना | जैसा कि है लहरों को हाथों में थामना || हाथों में हरदम हाथ तेरा बना रहे | इसके सिवा मन में नहीं और कोई कामना || ख्याल से ही यार के मन सिहर-सिहर उठता है| क्या होगा रब जाने, जब होगा सामना || मीलों तनहा रस्ते चल, यार की मंजिल मिली | यार से जुदाई हो कभी, ऐसा करे राम ना ||