मंगलवार, सितंबर 17, 2013

नरेंद्र दाभोलकर के प्रति


एक नरेंद्र सुदूर अतीत में हुए थे |
एक नरेंद्र तुम थे;
एक नरेंद्र कोई और है |

एक नरेंद्र ने हिन्दू धर्म-समाज  को
उसकी जड़ निद्रा से जगाया,
देशवासियों को उनका खोया
आत्मविश्वास लौटाया
शंखनाद किया ‘जागो फिर एक बार’ का ;


एक नरेंद्र तुम थे जो धर्म के नाम पर अपनी
बाजार चलाते बाबाओं की पोल खोलते रहे,
हर ढोंगी बाबा को तर्क और विज्ञान के
तराजू पर तोलते रहे,
अंधविश्वासों के खिलाफ चीख-चीख कर बोलते रहे |

एक और नरेंद्र पता नहीं क्या कर रहा है |
काँटों का ताज सर पर रखे;
बंसी बजा कर राजधर्म निभा रहा था-
जब जनता जल रही थी दंगों की आग में |
और मरहम जो दिया लगाने को
उसमें नमक की मात्रा कुछ ज्यादा ही रही |

वैसे भी ‘शाह आलम कैंप की रूहों’ के जख्मों पे
कोई मरहम भी तो काम नहीं करता |



एक नरेंद्र ने नर की सेवा को नारायण सेवा समझा
धर्म का मर्म दीन-दुखियों की सेवा बताया
अपने गुरु के सर्वधर्म सद्भाव के सन्देश को 
जन-जन तक पहुचाया |
देश के मस्तक को गौरवान्वित किया विश्व के आगे |
और फिर, अपने कर्तव्यों का पालन कर
महासमाधि में लीन हुए |


तुमको कुछ गुंडों ने गोलियों से छलनी कर दिया
गुंडे जो भेजे गए थे उन धर्म के ठेकेदारों द्वारा
जिनका बाजार मंदा पड़ता था तुम्हारी वजह से ;
जो कांपते थे की अगर तुम अंधविश्वास विरोधी
कानून बनवाने के अपने मिशन में कामयाब हो गये
तो उनका और उनके मुनाफेदार धंधे का क्या होगा |
ये गुंडे गोडसे की परंपरा के गुंडे थे 
जिन्हें हर गाँधी से अपने धर्म के धंधे को खतरा दीखता है |


भूल गए थे तुम की यह देश अभी तक
धर्म की गुलामी से नहीं उबरा है
नौटंकी करनेवाले नचनिये बाबाओं के
करोड़ों भक्त होते हैं यहाँ
कोई बाबा समोसे खिलाकर कल्याण करते हैं
तो कोई एकांत में बुलाकर |
बाबाओं के इस देश में तुमको तो गोली ही मिलनी थी |
देखना है की तुम्हारे विचार और काम को
कब तक बचने देते हैं ये बाबा लोग |

नरेंद्र दाभोलकर,
निराश न हो |
कुछ सिरफिरे युवा
अभी भी तुम्हारे जैसा ही सोचते हैं
बाबाओं के इस देश में रहते हुए भी |
शायद वे बदल पाए इस देश की सूरत
जहाँ वैज्ञानिक सोच को विकसित करना
बस संविधान में एक मौलिक कर्त्तव्य भर है
जिसको निभाने की जिम्मेदारी
हर कोई दूसरे के माथे पर डालता है |


एक नरेंद्र सुदूर अतीत में हुए थे |
एक नरेंद्र तुम थे;
एक नरेंद्र कोई और है |


सोमवार, सितंबर 16, 2013

हिंदी दिवस को मनाये भारतीय भाषा दिवस के रूप में

हिंदी दिवस और हिंदी पखवाड़ों के आयोजन की औपचारिकता सारे देश में जारी है | इन औपचारिकताओं से हिंदी का कितना भला होने वाला है, यह तो इतने सालों में भी जनता की समझ में नहीं आया | राजभाषा दिवस, राजभाषा विभाग, राजभाषा आयोग- इन सारे सफ़ेद हाथियों ने हिंदी को उसकी अन्य भारतीय बहन भाषाओं से दूर ला कर खड़ा कर दिया |

 मेरी नजर में हिंदी भाषा अपनी सारी भारतीय बहन भाषाओं के साथ एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है | तकनीकी क्रांति के इस युग में एक संभावना तो यह है की ये सारी भाषाएँ शिक्षा और रोजगार की भाषा बन कर उभरे | वहीं एक संभावना यह है की अंग्रेजी का प्रभुत्त्व हिंदी के साथ-साथ सारी भारतीय भाषाओं को हाशिये पर धकेल दे | अंग्रेजी जिस तरह से शिक्षा और रोजगार की भाषा के रूप में भारतीय भाषाओं को विस्थापित कर रही है, उसे देखते हुए ऐसी आशंका होना लाजमी भी है |  

भाषा की राजनीति को परे रख जिस एक कदम से हम हिंदी के साथ-साथ सारी भारतीय भाषाओं को फलने-फूलने में और राष्ट्रीय एकता फ़ैलाने में मदद दे सकते हैं वो है पूरे भारत में भाषा के पठन-पाठन की त्रिभाषा प्रद्धति को लागू करना | मातृभाषा, हिंदी/भारतीय भाषा/ अंग्रेजी इस रूप में यदि तीन भाषाओं को सारे राज्य में बच्चों को पढाना अनिवार्य कर दिया जाया तो भारत की भाषा की समस्या का शाश्वत समाधान हो सकता है यदि अहिन्दी भाषी राज्य अपने यहाँ हिंदी को बच्चों को दूसरी भाषा के रूप में  पढाये  तो उसके बदले में हिंदी भाषी राज्यों को अपने यहाँ कोई एक भारतीय भाषा बच्चों को अनिवार्य रूप से पढ़नी चाहिए | कल्पना कीजिये की यदि बिहार के बच्चे मलयालम सीखे, उत्तर प्रदेश में दूसरी भाषा के रूप में तमिल पढाई जाए, मध्य प्रदेश अपने बच्चों को तेलुगु पढाये, राजस्थान में कन्नड़ विद्यालयों में बच्चों को दूसरी भाषा के रूप में पढाई जाये और इसी भांति भारत का हर राज्य अपने बच्चों को मातृभाषा, हिंदी(हिंदी भाषी क्षेत्रों में कोई अन्य भारतीय भाषा) एवं अंग्रेजी, इन तीन भाषाओं की शिक्षा दे तो फिर हिंदी के साथ सारी भारतीय भाषाएँ भी प्रगति करेंगी और सरकारी और प्राइवेट स्कूलों के बीच की जो भाषिक खाई है, उसे भी पाटा जा सकेगा |

हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच संवाद अभी वक़्त की मांग है | भारतीय भाषाओं में उच्च कोटि के मौलिक लेखन के साथ विश्व की हर भाषा की उत्कृष्ट कृति के अनुवाद की व्यवस्था होनी चाहिए | साहित्यकारों को उनका समुचित सम्मान मिलना चाहिए | जिस भाषा के साहित्यकार हाशिये पर धकेले जाते हो, उस भाषा के दिन गिने-चुने होते हैं |  हिंदी तथा अन्य भारतीय भाषाओं को इन्टरनेट पर भी बढ़ावा दिए जाने की जरुरत है |



मैं तो यही कहूँगा की हिंदी दिवस को हम यदि भारतीय भाषा दिवस के रूप में मानते हुए हर भारतीय भाषा की प्रगति में अपना अंशदान देने का प्रण ले, तभी हम हिंदी के साथ ही समस्त भारतीय भाषाओं के प्रति अपना कर्तव्य निभा पायेंगें |