रविवार, जुलाई 31, 2011

तीन त्रिवेणियाँ- दूसरी कड़ी

१.

ख्वाब इक खोया हुआ फुटपाथ पर


ख्वाब इक खोया हुआ फुटपाथ पर |
सर्द से कांपा किया था रात भर ||

आँख को क्या, चैन से सोई रही |

०७-५-२०११


२.मौत को जब करीब से देखा



झूठे ख्वाबों से हुई रुसवाई,
जिंदगी इक भरम नजर आई |

मौत को जब करीब से देखा |

०१-५-२०११

३.

फुर्सत नहीं है

वक्त दौड़ता जाता, जिंदगी थमी सी है|
आजकल हर किसी को वक्त की कमी सी है ||

जिससे मिलता हूँ, यही कहता है-फुर्सत नहीं है |
१६-७-२०११

शुक्रवार, जुलाई 29, 2011

तीन त्रिवेणियाँ


तेरी नजरों की छुअन

तुम जिन निगाहों से देखती हो मुझे
यूँ तो मैं लोहा हूँ मगर,
सोना बना देती है मुझे,तेरी नजरों की छुअन.

२२-५-२०१०


२.

इश्क में सीखा है हमने

इश्क में सीखा है हमने फैलना आकाश-सा
सूखी जमीं पे फैलती जाती सी नन्ही घास-सा.

जो समेत डाले खुद में, उस प्यार से दूरी भली.

९-७-२०१०


३.

मजबूरियां

हौसलों को हार, ना स्वीकार है
रौशनी को अंधेरों से कब प्यार है

मगर, सबके साथ हैं कुछ मजबूरियां चस्पां.
२९-३-२०११

शुक्रवार, जुलाई 15, 2011

रिश्ते

रिश्तों की डोर, कहाँ उलझी, कहाँ टूट गयी?
ना की परवा इसकी, तो जिंदगी हमसे रूठ गयी ||

रिश्तों के टूटे हुए धागों से घिरे बैठे हम |
सोचते हैं कि क्या इनकी मजबूती को लूट गयी ||

रिश्तों के जिस घर में सिर्फ दीवारें, दरवाजें नहीं |
जिंदगी ऐसे घर में अपनी झूठ-मूठ गयी ||

रिश्ते शतरंज की बिसात पर खड़े आमने-सामने |
शह और मात के फेर में प्यार की बाजी छूट गयी ||

रिश्ते दिल से निभाना भूली दुनिया, दोष किसे दें ?
ऐसे रिश्तों की गर्मी, हमें बर्फ-सी महसूस गयी ||