मंगलवार, अगस्त 30, 2011

समंदर का गीत

समंदर आज भी वही गीत गाता है
जो उसने पहली बार गाया था
जब वो अस्तित्व में बस आया था |

समंदर की रेत के हर कण
और समंदर का हर जड़ -चेतन
मिलेंगे तुम्हें उसी आदिम गीत में मगन |

फिर इसमें अचरज क्यूँ हो कि
समंदर जब भी लहरों के सुर में गाता है
हर सुनने वाला गीतमुग्ध रह जाता है |

२१-७-२०११

रविवार, अगस्त 07, 2011

जिंदगी से क्या गिला

जिंदगी से क्या गिला |
जो मिला है, सो मिला ||

दुःख से मुरझाया था मन |
आज देखो फिर खिला ||

राजे-महराजे गए |
खंडहर बचा है अब किला ||

उतरा नशा अब जिंदगी का |
आके तू, जरा सा पिला ||

मुर्दों से फिरते हैं लोग यहाँ |
कुछ भी कर, तू उन्हें जिला ||

मैं छोड़ आऊंगा सारा जहां |
तू होगी, ये दिलासा तो दिला ||

प्यार-रिश्तों का जहाँ |
पल भर में गया है ज्यूँ बिला ||


तेरी आँख में आंसू नही |
तेरा ह्रदय है या है शिला ||

ताश के पत्तों की ढेरी है दुनिया ये |
तू जरा सा इसको दे हिला ||

गम ना कर कीचड़ का तू |
बस, कुछ कमल तू दे खिला ||

(१९-०८-२०१०)