मंगलवार, जुलाई 27, 2010

कहते हैं कहनेवाले कि स्वराज चल रहा.

किस हाल में हमारा ये समाज चल रहा?
'सब चलता है' के नारे से हर काज चल रहा.

बीते हैं छः दशक, अब भी भूख है, गरीबी है,
सब जानते हैं , फिर भी है ये राज चल रहा.

हिंसा की आग में जनता फतिंगों की तरह भुन रही
इस मुल्क का हाल-ओ-करम नासाज चल रहा.

आकाश की अगाधता को देख कर भी बिना डरे
दूजा किनारा छूने को, परिंदे का परवाज चल रहा.

आतंक का किसी मजहब से न लेना न कोई देना
फूटे थे कल बम मस्जिद में, जब नमाज चल रहा.

कहीं जुबां पे है ताले, कहीं पांवों में हैं छाले,
पर कहते हैं कहनेवाले कि स्वराज चल रहा.

जब मुस्कराना भूलने लगे सभी बच्चे
समझो की खुदा दुनिया से नाराज चल रहा.

ऐसे अनगिन कड़वे सच सीने में मेरे हैं दफ़न
फिर फुर्सत से सुनाऊंगा, मैं आज चल रहा.

गुरुवार, जुलाई 15, 2010

क्या कभी साहिर को भूली अमृता

जिन्दगी में आ गयी है रिक्तता
मन में फैली कैसी है ये तिक्तता.

प्रेम में इस कदर अँधा हो गया
दुनिया से है हो गयी अनभिज्ञता.

जी रहा हूँ अतीत में मैं इस कदर
की देखता हूँ भविष्य, दिखती शून्यता.

शिथिल तन में मन हुआ है बदहवास
खुशमिजाजी में हुई है न्यूनता.

एक दोराहे पे आ ठिठका खड़ा हूँ
एक तरफ है प्रेम दूजे पूर्णता.

जिन्दगी में आ गया इमरोज, फिर भी
क्या कभी साहिर को भूली अमृता?

रविवार, जुलाई 11, 2010

किसी सोये हुए को कस के झिंझोड़ा नहीं करते

यूँ बैचैन होके न आने वालों की बाट अगोरा नही करते


रूठा बालम जो लौट आये तो यूँ मुंह मोड़ा नही करते.



किसी भी हाल में ना मानने की जिद हो जिसकी

वैसे इन्सान से कभी भी निहोरा नही करते.



कोई प्यारा सा सपना बेरहमी से टूट जाता है

किसी सोये हुए को कस के झिंझोड़ा नहीं करते.



कि जिन बातों से अपनी शर्म के परदे उघरते हो

वैसी बातों का शहर भर में ढिंढोरा नही करते.



बदन और रूह जैसे जुड़ चुका हो जब कोई जोड़ा

किन्हीं पंचायतों के कहने से उनका बिछोड़ा नही करते.

"एक शेर अपना, एक पराया" में दुष्यंत कुमार के शेरों का काफिला

इस पोस्ट में मैं हिंदी ग़ज़ल को एक नए मुकाम पर पहुचने वाले और आपातकाल की तानाशाही के खिलाफ जनता को झकझोरने वाले  शायर दुष्यंत कुमार के कुछ पसंदीदा शेर और उनकी तर्ज़ पर लिखे अपने शेर पेश करूँगा. पेशकश कैसी लगी. यह आपसे जानने की प्रतीक्षा रहेगी.

१. मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूँ, पर कुछ कहता नही,


बोलना भी है मना, सच बोलना तो दरकिनार.

---दुष्यंत कुमार----


घृणा से मुझे घूर कर पूछा वो पूछा ख्वाहिश आखिरी

हँसते हुए उसकी तरफ देखा, कहा मैंने, 'सिर्फ प्यार'.

----केशवेन्द्र कुमार----
 
 
 
२. सिर्फ शायर देखता है कहकहों की असलियत


हर किसी के पास तो ऐसी नजर होगी नहीं.

---दुष्यंत कुमार---


इश्क में सीखा है हमने फैलना आकाश-सा

आशिक तो हैं हम भी तेरे, होंगे मगर जोगी नहीं.

---केशवेन्द्र कुमार----
 
 
 
३. जियें तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले


मरे तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए

----दुष्यंत कुमार----


आँख में जम गया है अँधेरा परत-दर-परत

और कितना इंतजार बाकी है सहर के लिए.

----केशवेन्द्र----
 
 
 
४. ये सारा जिस्म झुककर बोझ से दुहरा हुआ होगा,


मैं सजदे में नही था, आपको धोखा हुआ होगा.


यहाँ तक आते-आते सूख जाती है कई नदियाँ,

मुझे मालूम है पानी कहाँ ठहरा हुआ होगा.

----दुष्यंत कुमार----



जिधर देखो उधर चीखें, कराहें, प्राथनाएँ हैं

कोई सुनता नही, लगता है खुदा बहरा हुआ होगा.


जख्म दिल के हमने बरसों से छूकर के नही देखे,

जख्म क्या ठीक होगा, और भी गहरा हुआ होगा.

----केशवेन्द्र कुमार---
 
 
 
५. कैसे आकाश में सुराख़ नहीं हो सकता


एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारों!

---दुष्यंत कुमार---



मन के सैलाब में दुनिया को बहा सकते हो

दिल के अरमानों को बाहर तो निकालो यारों!

----केशवेन्द्र--
 
 
 
६. मत कहो आकाश में कुहरा घना है


यह किसी की व्यक्तिगत आलोचना है.

---दुष्यंत कुमार---

इस देश के विधि-विधानों के क्या कहने, यहाँ

मारे गए तो कुछ नही, पर आत्महत्या मना है.

----केशवेन्द्र----
 
 
 
७. मेरे दिल पे हाथ रक्खो, मेरी बेबसी को समझो


मैं इधर से बन रहा हूँ, मैं इधर से ढह रहा हूँ.

----दुष्यंत कुमार----


कोई चीख है चुप-चुप सी, कोई दर्द गहरी नदी-सी

यूँ ही नही मैं नींदें गवां ग़ज़ल कह रहा हूँ.

-----केशवेन्द्र----
 
 
 
८. रोज जब रात को बारह का गजर होता है


यातनाओं के अँधेरे में सफ़र होता है


सर से सीने में कभी, पेट से पांवों में कभी,

एक जगह हो तो कहें दर्द इधर होता है.

-----दुष्यंत कुमार---


दो सूखी रोटियां जुटा लेते हैं दो वक़्त जैसे-तैसे

करोड़ों लोगों का इस देश में ऐसे भी गुजर होता है.

-----केशवेन्द्र----
 
 
९. खरगोश बन के दौड़ रहे हैं तमाम ख्वाब,


फिरता है चांदनी में कोई सच डरा-डरा

-----दुष्यंत कुमार----


होठों पे दुनिया को दिखलाने की खातिर

खुशियाँ सजा रखी है, पर है दिल भरा-भरा.

------केशवेन्द्र---

शुक्रवार, जुलाई 09, 2010

एक शेर अपना-एक पराया-"गुलज़ार साहेब" के शेरों के साथ

साथियों, इस कड़ी में मैं गुलज़ार साहब के लिखे कुछ पसंदीदा शेरों को लेकर उनकी तर्ज़ पर अपने शेर कहने की कोशिश कर रहा हूँ. शेर गुलज़ार साहब के गीतों-नज्मों-गजलों के प्यारे से संग्रह "यार जुलाहे" से लिए गए हैं.

१. हाथ छूटें भी तो रिश्ते नही तोड़ा करते


वक़्त की शाख़ से लम्हे नही तोड़ा करते

----गुलज़ार----


कोई प्यारा सा सपना बेरहमी से टूट जाता है

किसी सोए हुए को कस के नहीं झिंझोड़ा करते.

-----केशवेन्द्र----
 
 
 
२. आप के बाद ये महसूस हुआ है हम को


जीना मुश्किल नहीं और मरना भी दुश्वार नहीं

----गुलज़ार---


कहते रहे रोज तुम्हे तुमसे प्यार करते हैं

और दिल जानता था हमको तुमसे प्यार नहीं

------केशवेन्द्र-----
 
 
 
३. जिन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा


काफिला साथ चला और सफ़र तन्हा



अपने साये से चौक जाते हैं

उम्र गुजरी है इस कदर तन्हा

---गुलज़ार---



सड़कें NH बनी जब से, है मुंह फेर लिया

किनारे गुमसुम खड़े हैं शज़र तन्हा



छू के लौट आई है किनारों को लहर

लौटी है देखो मगर किस कदर तन्हा.

----केशवेन्द्र----



४..दर्द हल्का है साँस भारी है


जिए जाने की रस्म जारी है


आप के बाद हर घड़ी हमने

आपके साथ ही गुजारी है



रात को चांदनी तो ओढ़ा दो

दिन की चादर अभी उतारी है



शाख़ पर कोई कहकहा तो खिले

कैसी चुप-सी चमन में तारी है


कल का हर वाकया तुम्हारा था

आज की दास्ताँ हमारी है.

----गुलज़ार---



हम तो आजिज हुए ना मुहब्बत से
लगता है इश्क की हमें बीमारी है.



जीत की दहलीज पर हो के खड़े

इक गलत चाल और बाजी हारी है.



मौत का खौफ नहीं है हमको

इसलिए जिन्दगी इतनी प्यारी है.

-----केशवेन्द्र----
 
 
5. शाम से आँख में नमी सी है


आज फिर आप की कमी सी है


वक़्त रहता नही कहीं टिक कर

इसकी आदत भी आदमी सी है

-----गुलज़ार----



रूठ जाना तो होठों पे जड़ लेना ताले

आपकी ये अदा भी हमी सी है.

----केशवेन्द्र---

शुक्रवार, जून 25, 2010

आम की ख्वाहिश लिए बबूल बोता आदमी

कपड़ों के हिसाब से फिट होता आदमी


खुद की अर्थी, खुद के कांधे ढ़ोता आदमी.



मरियल रिक्शेवाले का कचूमर निकालते

गालियाँ बकता जा रहा था मोटा आदमी.



जितने खरे आदमियों के उठाये हैं मुखौटे

हंस के अन्दर से निकला है खोटा आदमी.



देखो जिधर भी, मिल जायेगा  तुम्हें उधर

आम की ख्वाहिश लिए बबूल बोता आदमी.



हर आँख से हर आंसू पोछे कैसे कोई भला


जिधर देखो उधर मिलेगा कोई रोता आदमी.



चेहरे के जंगल में भावनाएं लुप्तप्राय हैं

रोबोटों सा दिखने लगा है मशीन होता आदमी.



इतनी अँधेरी रात में भी कोई दिया जल रहा


नींद में मुस्कराया है सपने संजोता आदमी.

समानुभूति

ओ वाचाल वाणी !


एक दिन के लिए मूक हो कर देख,

शायद तुझे समझ आ सके दर्द उनका

जिनकी जुबां नही है

या जो जुबां होते हुए भी बे-जुबां है.



ओ चंचल नयन !

एक दिन पलकों के फाटक बंद करके देख,

शायद तू समझ पाए

ज्योतिविहीन जीवनों की व्यथा

और 'तमसो मा ज्योतिर्गमय' का अर्थ.



ओ बावरे श्रवण !

एक दिन के लिए कर्ण-पटलों को बंद कर के देख,

शायद तू अनुभव कर सके उनकी व्यथा

जो सुन नही सकते एक शब्द भी प्यार भरा.


सहानुभूति नही समानुभूति उपजाओ.

वंचितों के जीवन की वंचना मिटाओ.

फूल बन के खुशियों की खुशबू लुटाओ

कर सको यदि ये तो सार्थक होगा जीना तुम्हारा.

रविवार, जून 20, 2010

जब कबीर सा कोई फक्कड़ लिखे ग़ज़ल

बहुत दिनों से लिख नहीं पाया कोई भी ग़ज़ल


तन्हाई में लिख ना डालूं कोई रोई-सी ग़ज़ल




दुनिया की तेज धूप में कुम्हलाये अहसासों के पौधे

आह! कितनी मेहनत से मैंने बोई थी ग़ज़ल




जब कबीर सा कोई फक्कड़ लिखे ग़ज़ल

दिल की भूख मिटाती है वो लोई-सी ग़ज़ल




दुनिया की गंदगी ने हर बार दिक दिया

चाहा तो था लिखना गंगाज़ल से धोई-सी ग़ज़ल




चाहा था ऐसी ग़ज़लें हों, झकझोर डाले दुनिया को

अफ़सोस की अब तक लिखी सब सोई-सी ग़ज़ल

शुक्रवार, जून 18, 2010

मंजिल मिलती है तो सफ़र खोता है

ऐसा ही दस्तूरे जमाना होता है
मंजिल मिलती है तो सफ़र खोता है.

एक और एटम  बम पर हो खर्च करोड़ों
और दूसरी और भूख से शिशु रोता है.

नेताओं में अद्भुत भाईचारा होता है
एक लगाता कालिख है, दूजा धोता है.

हाथ लगेगी सिर्फ  हताशा ,मिलेंगे ग़म
कोरे सपनों की फसलें जो बोता है.

संतुष्टि के मोती हासिल होते हैं उनको ही
खतरों के सागर  में लगाते जो गोता हैं.

नेताओं-अफसरों आओ फसल काट लो
मर-मर के खेतों को मैंने जोता है.

आँखें बरसी, पानी की जब बूँद ना बरसी,
टूट पड़ा ,खेतों को जिसने मर-मर कर जोता है.


जीवन के हर दर्शन को रट कर के भी
जीवन को जो ना समझे वो तोता है.

गुरुवार, मई 27, 2010

तुम्हे देख के ऐसा लगता है

तुम्हे देख के ऐसा लगता है





इक आंसू की बूँद जो छलकी नही


नयनों तक आई प लुढकी नही


जीती भी रही मरती भी रही


फिर आँखों-ही-आँखों में सूख चली.




तुम्हे देख के ऐसा लगता है




गंगा के जैसी दिखती हो तुम


पावन सबको करती आई


पर तुमको सबने मैला किया


तुम रह गयी अपनी परछाईं.




तुम्हे देख के ऐसा लगता है




जैसे  राधा खड़ी हो यमुना तट


रोती भी नही, हंसती भी नही


सुध-बुध बिसरा कर तन-मन की


निर्मोही की बाट अगोरे है.




तुम्हे देख के ऐसा लगता है




जैसे बादल का इक छोटा टुकड़ा


आकाश के कोने में तन्हा


छुप-छुप के रोया करता है


हर ग़म को छुपाये फिरता है.




तुम्हे देख के ऐसा लगता है




जैसे कोई बिन माँ का बच्चा


हँसना भी भूला, रोना भी


उसे भूख-प्यास का भी पता नही


आकाश निहारा करता है.




तुम्हे देख के ऐसा लगता है




जैसे कोई कली मुरझाई-सी


खिलने से पहले लील गई जिसको


इस जग़ की निठुराई


कोमलता का करुणांत हुआ.




तुम्हे देख के ऐसा लगता है




जैसे इक अभिमन्यु हो रण में


आशा सारी नैराश्य भरी


फिर भी रथ-चक्र उठाता है


लड़ता जाता अंतिम पल तक.




तुम्हे देख के ऐसा लगता है




जैसे कोई दिया अंधियारों में


कोई साथी नही कोई संगी नही ,


तूफ़ान के झोंके हैं चहुदिश,


फिर भी मुस्काकर जलता है






तुम्हे देख के ऐसा लगता है.



मंगलवार, मई 11, 2010

तुममे देखा, हम ही हम है

हंसी ओंठ पर आँखें नम है!


हंसकर रोने का मौसम है!!



सारी यादों को पछाड़ कर!

सबसे ऊपर तेरा ग़म है!!



खुदा सुखी है इस दुनिया से!

दुखी बचे तो केवल हम है!!



ताल ठोककर खड़े है हम भी!

देखे दुनिया में कितना दम है!!



इश्क के पागलपन का ये आलम!

तुममे देखा, हम ही हम है!!

हंसी होंठ पर आँखें नम है

कैफ़ी आज़मी का एक मार्मिक शेर याद आ रहा है-
"आज सोचा तो आंसू भर आये
  मुद्दतों   हो गयी मुस्कराएँ."

सचमुच, जीवन की आपाधापी ने आदमी के होंठों से हंसी छीन ली है. हंसी- जो जिन्दगी की सबसे मूल्यवान नेमत है, आज दुर्लभतम हो गयी है. स्वच्छ धवल मुस्कान, कहकहे, मुक्त अट्टहास  शायद ही कहीं दिखते हैं. बड़ों की दुनिया इतनी क्रूर, इतनी जालिम, इतनी बेरहम हो गयी है कि प्रकृति ने उससे हंसी छीन ली है.  हंसी  बची है अगर कहीं  तो मासूम बच्चों के पास बची है. बड़ों कि दुनिया में तो हंसी भी बाजार का उत्पाद बन गयी है. मुस्कराने के लिए भी अब विशेष ब्रांड के टूथपेस्ट , ब्रश  , क्रीम  और मोउथ  -फ्रेशनरों कि जरुरत है. हंसी हास्य  क्लबों के यहाँ मानों गिरवी रख दी गयी है.

आधुनिक युग का मानव हँसे भी तो कैसे हँसे ? आज की इस तेज रफ़्तार दुनिया में उसके पास जीने की  भी फुर्सत नही रह  गयी है शायद! आदमी आदमी ना रहकर मशीन होता जा रहा है, संवेदन शून्य रोबोट  होता जा रहा है.  हंस सकता है वो जो अपनी शर्तों पर एक भरी-पूरी जिन्दगी जीता हो, जो औरों  के दुःख-दर्द मिटाने का प्रयास करता हो, जो जिन्दादिली से जिन्दगी कि हर परिस्थिति का सामना करता हो और दुर्भाग्यवश ऐसे लोग दुनिया से बड़ी तेजी से विलुप्त होते जा रहे हैं.

हंसी बड़ी संक्रामक होती है. आपके आस-पास परिवार, समाज और देश-दुनिया में यदि हंसी-ख़ुशी का माहौल होगा तो जाहिरन  आपके होठों पर भी हंसी होगी. मगर कैसे हंस सकता है कोई जब वह दुखों कि आग में घिरा हो, बेरोजगारी के दंश से अन्दर-ही-अन्दर घुटता हो, व्यस्था और समाज की जड़ता और रूढ़िवादिता को देख कर छटपटाता हो? कैसे हंस सकता है कोई जब किसान-मजदुर भूख और गरीबी के कारण आत्महत्या कर रहे हों, जब गोधरा और गुजरात जैसी घटनाएँ होती हो, जब नक्सली और आतंकवादी हिंसा में निर्दोष लोगों कीड़ों-मकोड़ों कि तरह मरते हों, जब ईमानदार आवाजों को शैतानी हाथ हमेशा  के लिए खामोश कर देते हों, जब अफगानिस्तान, इराक और पाकिस्तान में सैकड़ों-हजारों निर्दोष लोग रोज मरे जाते हों, जब भूख के मारे दुनिया के कोने-कोने के बच्चे रोते हो,, जब हंसती-खेलती गुडिया सी बच्चियों की इज्ज़त  लूटी  जाती हो, मानवता जब ज़ार-ज़ार रो रही हो, तब मानव के होठों पर हंसी आ भी सकती है कैसे भला? कबीर याद आते हैं ऐसे में-

"सुखिया सब संसार है, खावै और सोवै
 दुखिया दस कबीर है, जागे और रोवै.

आजकल के ज़माने में समाज-देश-दुनिया की दुर्दशा से द्रवित हो कर रोनेवाले लोग बहुत ही कम रह  गए हैं. बाकी दुनिया खुशहाल होने का दिखावा करती है मगर उसके द्वारा ओढ़ी हर मुस्कराहट एक मुखौटा, इक छलावा है. उसकी हंसी बड़ी खोखली है क्योंकि वह सिर्फ बाह्य  अभिव्यक्ति है, आन्तरिक नही. वर्तमान दुनिया में आदमी के हर्ष-विषाद  की मात्रा भी बाजार निर्धारित कर रहा है. बाजारू सभ्यता का बोझ कंधे पर पड़ते ही बच्चे अपनी कुदरती मुस्कान भूल जाते हैं और सीखते हैं एक औपचारिक मुखमुद्रा बनाना जिसे हंसी कहना हंसी का अपमान है. ओढ़ी हुई मुस्कराहट हमें अन्दर से और उदास कर जाती है.

एक सच्चा और ईमानदार इन्सान उस भ्रष्ट व्यवस्था में कैसे मुस्करा सकता है जहाँ जनता भूखों मरती हो, हताश निराश हो और नौकरशाह तथा नेतागण  भोग-विलास में तल्लीन हों? रघुवीर सहाय ने अपनी कविता 'हंसो, हंसो, जल्दी हंसो' में ऐसी ही स्थिति पर लिखा था-

'हंसो, पर अपने पर ना हँसना क्योंकि उसकी कड़वाहट
पकड़ ली जाएगी और तुम मारे जाओगे

बेहतर है की जब कोई बात करो तब हंसों
ताकि किसी बात का कोई मतलब ना रहे
और ऐसे मौकों पर हंसो जो की अनिवार्य हों
जैसे गरीब पर किसी ताकतवर की मार
जहाँ कोई कुछ नही कर सकता उस गरीब के सिवाय
और वह भी अक्सर हँसता है."

खैर, दुनिया में ढेरों ग़म है, खुशियों के मौके कम हैं. पल-दो-पल जो मिले हमको, उसमें तो हम मुस्कुरा ले, कुछ हंस ले कुछ हंसा ले.   हमें फिर से प्रकृति के सान्निध्य में जाकर हँसना सीखना  होगा, बच्चों से थोड़ी-सी मुस्कुराहटें उधार लेनी होंगी, पूरी दुनिया में प्रेम-स्नेह-भाईचारे की लौ जलानी होगी, हर आँख के आंसू पोंछने  होंगे, हर होंठ पर हंसी लाने का प्रयास करना  होगा और देखते-देखते हमारी खुद की जिन्दगी खुशियों से भर उठेगी . आओ, साथियों, ग़म के कालकूट को पी हम बाकी  दुनिया को खुशियों का अमृतकलश सौंपे. पूरी दुनिया खिलखिलाएगी, ठहाके लगाएगी, मंद-मंद मुस्काएगी और उस मुस्कान में हमारा भी साझा होगा. पूरी दुनिया मुस्कान की रौशनी से चमक-दमक उठेगी. अपनी हाल में ही लिखी एक त्रिवेणी से इस पोस्ट को विराम देना चाहूँगा-  आप भी हँसते और हँसाते रहे.

उसके चेहरे की उदासी मेरी आँखों ने पढ़ी

और मेरे चेहरे की उदासी भांप ली उसने,

हँस के अपनी उदासियाँ साझा कर ली हमने.

रविवार, मई 09, 2010

त्रिवेणी--3

साथियों, त्रिवेणी की तीसरी कड़ी आप लोगों की सेवा में हाजिर है. आशा है की आप सबों को पसंद आएगी.

@प्रेम में टूट कर भी


प्रेम में टूट कर भी

प्रेम को टूटने नहीं देते.

टूट कर प्रेम किया करने वाले.  
 
 
@विज्ञापन की दुनिया में


मम्मी की कहना मत सुनना

करना वही जो कहे टमी


विज्ञापन की दुनिया में रिश्ते सारे बने डमी.
 
 
 
@एक त्रिवेणी के दो चेहरे



1.

उसके चेहरे की उदासी मेरी आँखों ने पढ़ी

और मेरे चेहरे की उदासी भांप ली उसने,


और उस बच्ची के साथ मैं भी हंस पड़ा हौले-से.


2.

उसके चेहरे की उदासी मेरी आँखों ने पढ़ी

और मेरे चेहरे की उदासी भांप ली उसने,


हँस के अपनी उदासियाँ साझा कर ली हमने.  
 
 
@आँखें खुली हों

तुम जो कहते हो मेरे हमसफ़र बनोगे तुम

तुमको क्या खबर कि किस राह मैं चलूँगा?


चाहत पे भरोसा करो पर आँखें खुली हों.  


@ मेरी मज़बूरी भी, मजबूती भी


तुम्हारी पीड़ा से छलकी रहती है आँखें मेरी

दिल भरा सा रहता है, होंठों पे दुआ होती है


क्या कहूं, तुम मेरी मज़बूरी भी हो, मजबूती भी.
 
 
 
@ जिन्दगी से जी अभी भरा नही


रातें कितनी गुजारी जाग-जाग कर

और दिन गुजारे हैं भाग-भाग कर


फिर भी कमबख्त जिन्दगी से जी अभी भरा नही.
 
 
 
@ कृष्ण बेचारे दुविधा के मारे तन्हा-तन्हा रहते हैं


1.

एक और राधा के आंसू बहते हैं कुछ कहते नही

दूसरी और रुक्मिणी हरदम अपना हक़ जतलाती है.


कृष्ण बेचारे सोच रहे हैं जाए तो जाए किधर?


2.

एक और राधा के आंसू बहते हैं कुछ कहते नही

दूसरी और रुक्मिणी हरदम अपना हक़ जतलाती है.


कृष्ण बेचारे दुविधा के मारे तन्हा-तन्हा रहते हैं.
 
 
 
@ अंजाम


जिन्दगी सुलझाई है जब भी उलझनें हैं बढ़ गयी.

रिश्तों की हर डोर में अनबोली गांठें पड़ गयी.


अच्छा करने गए थे अंजाम देखो क्या निकला.
 
 
 
@ मेरी जुबां


ना तो शुद्ध हिंदी से लगाव है,

ना तो खालिस उर्दू का चाव है,


वो तो ठेठ हिन्दुस्तानी है जिसमें कहता हूँ अपनी बात मैं.

------केशवेन्द्र------

सोमवार, मई 03, 2010

ऐसी भी क्या कमी दिखी, मौला इस दीवाने में

एक ही चर्चा छेड़ा करते हैं अपने हर गाने में !


दर्द मिला मुझे ज्यादा तेरे आने में या जाने में !!



एक ही तेरा ग़म था जिसको कहते रहे अफ़सानों में!

इक अपना जो बिछड़ा उसको ढूंढा हर बेगाने में !!



ग़म-ही-ग़म पाकर अब रब से पूछा करते हरदम हम!

ऐसी भी क्या कमी दिखी, मौला इस दीवाने में !!



चैन से हम मर भी ना पाए, ओ संगदिल, तू ये तो बता!

काहे इतनी देर लगा दी, जालिम तूने आने में!!



खुद को पाना हो या खुदा को, इश्क की आग में जलके देख!

शमा के इश्क़ में जलते-जलते यही कहा परवाने ने!!



दिल की रस्साकस्सी में ना मालूम था ऐसा होगा!

दिल की रस्सी ही टूट गयी इक-दूजे को आजमाने में!!



तुमको खोने की चिंता में जीते जी कई बार मरा!

पर खो डाला तुझको मैंने शायद तुझको पाने में!!

गुरुवार, अप्रैल 22, 2010

दिल फिर से उम्मीदों की फसल बो गया है

साथियों, आपकी खिदमत में पेश है मेरी शुरुआती गजलों में एक ग़ज़ल. वर्ष 2004  में जब मैंने ग़ज़ल विधा पार हाथ आजमाने की शुरुआत की थी, तो उस समय की लिखी हुई ये छठे नंबर की ग़ज़ल है. ग़ज़ल में मामूली सा संसोधन किया है और कुछ नए शेर आज की रात में जोड़े हैं. शेर संख्या 3-8  नए हैं, आज के लिखे हुए हैं. बाकी शेर पुराने हैं और मार्च 2004 के लिखे हुए हैं.


आपसे मिला हूँ कुछ इस कदर , जिन्दगी का चैन खो गया है
सब कुछ तो है चैन से, बस दिल जरा बैचैन हो गया है. (१)

वो जो फूल है गुलाब का, काँटों के संग खुश था
और झरते-झरते विरह में दो बूँद आंसू रो गया है. (२)

माँ के हाथ नींद में भी झूले को हैं झुला रहे 
 लोरी सुनते-सुनते बच्चा सो गया है . (3)

अब गिले-शिकवा मिटा के, उसको लगा लो गले
जो आंसुओं  से दिल के दाग-धब्बे  धो गया है. (4)

कचरे से कुछ बीन कर खाते हुए भिखारी ने कहा
भला  हो ऊपरवाले  का कि पेट में कुछ तो गया है. (5)

लौट कर वो आ ना सका, राहे सारी बंद थी
लक्ष्मण रेखा पार कर के जो गया है.   (6)

जाने वालों को यूँ तड़प कर पुकारा नही करते
जाने दो उसे, जो गया है वो गया है.   (7)


दुनियावालों और कितने पाप करोगे, व्यर्थ में
पुराने पापों की गठरी मसीहा  ढ़ो गया है.   (8)

वो आया था यहाँ तब , रो रहा पुरजोर था
पर मिला है मुझसे जो, हँसते हुए वो गया है. (9)

दर्द जब इतना मिला है कि खुद पे बस न रहा है
न जाने किस ने थपकी दी है , हर ग़म खो गया है. (10)

मेरी आँखों में सपना था, मेरी यादों में अपना था
न जाने किसने झकझोड़ा  है , सब कुछ खो गया है. (11)

जिन्दों कि भीड़ में जिन्दगी है गुम गयी कुछ इस कदर
गोया कौमों कि भीड़ में फुलस्टॉप खो गया है. (12)

फसल उम्मीदों कि भले ही इस बार जल गई हो
मगर दिल फिर से उम्मीदों  की फसल बो गया है. (13)

बुधवार, अप्रैल 21, 2010

मुझे अच्छे लगते हैं

दोस्तों, दिसंबर 2005 में लिखी हुई पर अपने दिल के काफी करीब की इस कविता को आप लोगों के सामने रख रहा हूँ. उस वक़्त जो चीजें मुझे अच्छी लगती थी, आज भी उनमे कोई बदलाव नही आया है.



मुझे अच्छे लगते हैं

मुझे अच्छा लगता है कलकल करता झरना

मुझे अच्छी लगती है चहचहाती हुई चिड़ियाँ

मुझे अच्छी लगती है खिलखिलाती हुई लडकियाँ.



मुझे अच्छी लगती है उगते हुए सूरज की लालिमा

मुझे अच्छी लगती है युवा सूर्य की प्रखर उर्जा

मुझे अच्छा लगता है ढलते सूरज का अपराजेय भाव



मुझे अच्छे लगते है छोटे- छोटे बच्चे

मुझे अच्छी लगती है उनकी चंचलता

उनकी तोतली बोली, उनकी अबूझ भाषा

सबसे बढ़कर अच्छी लगती है-

उनके नयनों में चमकता विश्वास

और उनके मन में दमकती आशा.



मुझे अच्छे लगते हैं खिले हुए फूल

सौंदर्य का खजाना लुटते निःस्वार्थ

भीनी-भीनी सुगंध से सुरभित करते

दिग-दिगंत जन-जीवन



मुझे अच्छी लगती है ईमानदारी

मुझे अच्छी लगती है आशा

सबसे अच्छी लगती है मुझे

प्रेमी-स्नेही जनों के नयनों की

मूक भाषा.



मुझे हर वो चीज अच्छी लगती है

जो इस सुंदर दुनिया को बनाती है

और सुंदर और प्यारी और अच्छी.

सोमवार, अप्रैल 19, 2010

जिन्दगी से जी अभी तक भरा नही

जिन्दगी से जी अभी तक भरा नही


मायने ये है के मैं अब तक मरा नही



जिस शाख से पतझड़ में पत्ते न झड़े

वो शाख बसंत में था हरा नही



दुनिया दुश्वार कर देगी जीना अगर

कहते रहे तुम जरा हाँ, जरा नही.



ईमानवालों की बातें ना सुनो

कहते हैं, ईमानदारी में कुछ धरा नही



खुद को जिन्दा समझ तभी तक 'केशव'

जबतक कि दिल किसी से डरा नही

एक शेर अपना एक पराया- 4

दोस्तों, फिर से आपकी सेवा में हाजिर है इस श्रंखला की चौथी कड़ी. उम्मीद है की ये पेशकश आपको पसंद आ रही है. आप की समालोचनाओं का इंतजार रहेगा.


ज़ख्म खिले तो बात बने


फूलों का खिल जाना क्या

 

ग़म की दौलत है तो है

दुनिया को दिखलाना क्या

*****ज़फर रज़ा****


अश्क़ जो उमड़े आँखों में

रुकना क्या बह जाना क्या

###केशवेन्द्र####


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खिलखिलाता है जो आज के दौर में


इक अजूबे से क्या कम वो इंसान है



मीर, तुलसी, ज़फ़र, जोश, मीरा, कबीर


दिल ही ग़ालिब है और दिल ही रसखान है

 

ढूंढ़ता फिर रहा फूल पर तितलियां


शहर में वो नया है या नादान है



****NEERAJ GOSWAMI*****



हम को ग़म भी मिले तो नही ग़म कोई

तुमको खुशियाँ मिले ये ही अरमान है.

-------Keshvendra------


*********

कुछ लोग इस शहर में हमसे भी हैं खफा


हर एक से अपनी भी तबियत नही मिलती.

-------निदा फाजली-------


आईने सच दिखाते हैं या झूठ, नहीं मालूम मगर


जो आईने में है उससे अपनी सूरत नहीं मिलती.

---केशवेन्द्र----


***********


कभी पाबन्दियों से छुट के भी दम घुटने लगता है


दरो-दीवार हो जिनमें वही ज़िन्दाँ नहीं होता



हमारा ये तजुर्बा है कि ख़ुश होना मोहब्बत में

कभी मुश्किल नहीं होता, कभी आसाँ नहीं होता



बज़ा है ज़ब्त भी लेकिन मोहब्बत में कभी रो ले

दबाने के लिये हर दर्द ऐ नादाँ ! नहीं होता



यकीं लायें तो क्या लायें, जो शक लायें तो क्या लायें

कि बातों से तेरी सच झूठ का इम्काँ नहीं होता

---फिराक गोरखपुरी------



जो बिकना था तो यूँ ही बिक गए होते, बेशर्मों!


यूँ बिकने की कीमत बढ़ाने को तो इमाँ नही होता.

-------केशवेन्द्र---------


*********

"प्यार का पहला ख़त लिखने में वक्त तो लगता है


नए परिंदों को उड़ने में वक्त तो लगता है



जिस्म की बात नहीं थी उनके दिल तक जाना था

लम्बी दूरी तै करने में वक्त तो लगता है "



-----हस्ती मल जी हस्ती---



झूठ को पंख मिले है वो तो उड़ता फिरे फ़र-फ़र

सच को चलकर आने में वक़्त तो लगता है.



अपनी जमीन से उखड़ कर आया हूँ नयी जगह


फिर से जड़ें ज़माने में वक़्त तो लगता है.

----केशवेन्द्र----
 
 
*********
 
 
जिन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा


काफिला साथ चला और सफ़र तन्हा



अपने साये से चौक जाते हैं

उम्र गुजरी है इस कदर तन्हा

---गुलज़ार---



सड़कें NH बनी जब से, है मुंह फेर लिया

किनारे गुमसुम खड़े हैं शज़र तन्हा



छू के लौट आई है किनारों को लहर


लौटी है देखो मगर किस कदर तन्हा.

----केशवेन्द्र----


********

शाम से आँख में नमी सी है


आज फिर आप की कमी सी है



वक़्त रहता नही कहीं टिक कर

इसकी आदत भी आदमी सी है

-----गुलज़ार----




रूठ जाना तो होठों पे जड़ लेना ताले


आपकी ये अदा भी हमी सी है.


----केशवेन्द्र---

शनिवार, अप्रैल 03, 2010

इक सोते हुए शहर में जागता हुआ मैं

इक सोते हुए शहर में जागता हुआ मैं!


खुद के पीछे तो कभी खुद से भागता हुआ मैं!!



हर इक जगह तलाशा पर मालूम ना चला!

की किस जगह पे आकर के लापता हुआ मैं!!



चाहा बहुत है पर अब तक चाहत फ़क़त चाहत ही है!

कि देखूं किसी को खुद को चाहता हुआ मैं!!



इन आँधियों को मेरे घोंसले से न जाने कितना प्यार है!

इन आँधियों पे हूँ हंस रहा तिनके बटोरता हुआ मैं!!



लोग सारे सो चुके, रोशनियाँ अधजागी हैं और!

विरहा की आग में जल रहा तेरी बाट अगोरता हुआ मैं!!

मंगलवार, मार्च 30, 2010

स्वर्णमृग

पूरा जग ही माया है


कोई पार ना पाया है



रूप के पीछे हम भी, तुम भी

इसने जग भरमाया है



जूते घिसे, घिस गए तलवे

कुछ भी हाथ ना आया है



जिसके पीछे अबतक थे हम

देखा केवल साया है



अन्दर क्या है देखा किसने

दिखती केवल काया है



जब भी हमने देखा उसको

देखा वो शरमाया है



देखा आज जिसे फूल सा खिला

देखा कल कुम्हलाया है



उसको जब भी हँसते देखा

खुद को बेखुद पाया है



हरदम मेरे साथ चला कोई

देखा उसका साया है



खुद को जब भी तन्हा पाया

उसको पास ही पाया है



चाहे जितनी कड़ी धूप हो

सर पे उसका साया है



चाहूँ भी तो छूट ना सकता

ऐसा फांस फंसाया है



आई मन में उसकी ही छवि

जब भी कोई याद आया है



खोया है हम ने सब कुछ


तब जाकर खुद को पाया है



उसकी आँखों में जो झाँका

अपना अक्स ही पाया है



दोराहे पर ठिठका खड़ा हूँ

वक़्त कहाँ हमें लाया है



याद साथ तेरी, कलम हाथ मेरे

जीवन पन्नों पर छितराया है



रहो जहाँ भी, रहो खुश सदा

दिल ने ये फ़रमाया है



अब मैं हूँ और कलम संग है


शब्द मेरा सरमाया है.

(24 अप्रैल 2003 )

शनिवार, मार्च 27, 2010

Ek Sher Apna, Ek Paraya-3

एक अरसे के बाद फिर से मन किया है की उस्तादों के रदीफ़-काफिये की कसौटी पर फिर से जोर-आजमाइश की जाई. तो लीजिए, मीर साहेब का एक शेर और उसी की तुक-ताल में मेरा प्रयास प्रस्तुत है.( 28 Jan 2010)



********
इश्क हमारा आह ना पूछो क्या-क्या रंग बदलता है!


खून हुआ दिल दाग हुआ फिर दर्द हुआ फिर गम है अब!!


---मीर---




दुनिया की इस अंधी दौड़ में सब कुछ तो हासिल है हमें!


फिर भी बैठ के सोचा करते,क्या ज्यादा,क्या कम है अब!!


---keshvendra---
 
 
********
 
तुम नही पास, कोई पास नहीं!


अब मुझे जिन्दगी की आस नहीं!!



साँस लेने में दर्द होता है!

अब हवा जिन्दगी की रास नहीं!!

-------जिगर बरेलवी----



इस निगोड़ी जाम से जो बुझ जाये!

ऐसी ओछी हमारी प्यास नही!!



मेरी खुद्दारी को ललकारो नही!

ये किसी के पैरों तले की घास नहीं!!

------केशवेन्द्र------
 

*********
 
दिल धड़कने से खफा है और आँखें नम नहीं!

पीछे मुडके देखने की यह सजा कुछ कम नहीं!!

-----शहरयार------


तेरे हुश्न की खुशबू से जुट जायेंगे भँवरे कई नए!

देखना उस भीड़ में सब होंगे, होंगे हम नहीं !!

---केशवेन्द्र---
 


**********
 
इस सफ़र में बस मेरी तन्हाई मेरे साथ थी!


हर कदम क्यों खौफ मुझको भीड़ में खोने का था!!
***शहरयार***




जो नही था और हो सकता नहीं था मैं कभी!


बार-बार मुझको गुमाँ, क्यूँ वही होने का था!!


***केशवेन्द्र***
 


********
 
उनसे मिलकर भी तड़पते हैं उनसे मिलने को


पास जितने भी ज़ियादा हैं उतने कम हैं आज


- Gulab Khandelwal

चहकती-बहकती जितनी खुशियाँ थी मेरे हिस्से


खुशियों का लिबास ओढ़े उतने गम हैं आज.

--केशवेन्द्र--



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ये इल्म का सौदा, ये रिसाले, ये किताबें


इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं



- जां निसार अख्तर



हमने मांगी ज़ेहन से कुछ बहानों की 'थपकियाँ '

जो सीने में क़ैद आरजुओं को सुलाने के लिए हैं

- Taru


औरों के गम उधार लेते फिरने का पूछो ना सबब हमसे

ये अपनी बंजर पड़ी आँखों को फिर से रुलाने के लिए हैं.

**केशवेन्द्र**




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नींदें तो टूटती हैं कई बार रात में


इक ख्वाब है जो फ़िर भी कभी टूटता नहीं

---अशोक मिजाज----



दुनिया तो मतलबी है, रूठती है बात-बात पर

एक तू है, हमसे रूठ कर भी कभी रूठता नही

----केशवेन्द्र-----

 

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ढूंढता है खुलूस लोगों में


ये जो नादान मुझमें रहता है



ग़म किसी का हो ग़म समझता हूँ

अब भी इंसान मुझमें रहता है



हसरतें, आरजू, लगन, चाहत

ग़म का सामान मुझमें रहता है

===ज़फर रज़ा===



प्रार्थनाएँ सुनता हूँ बहरों कि तरह


लगता है भगवान मुझमें रहता है.


----केशवेन्द्र-----
 
 
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शुक्रवार, मार्च 26, 2010

एक शेर अपना एक पराया-२

साथियों, लो फिर से मैं आप लोगों की सेवा में हाजिर हूँ एक शेर अपना, एक पराया की दूसरी कड़ी लेकर. प्रयास कैसा लगा बताना मत भूलियेगा. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा.



 
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जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा


कुरेदते हो जो राख जुस्तजू निहाँ क्या है
.....ग़ालिब........


खरोंचे जो दिल पे लगते है कभी नही भरते


जो खोजते हो जिस्म पे निशाँ तो वहाँ क्या है
....केशवेन्द्र.......



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घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर ले


किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये

=====निदा फाजली=====



कांटे में फंस के तड़पती हुई मछली बोली

ऐ खुदा! इस तरह ना किसी को फंसाया जाये.

------keshav------
 
 
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पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है


कोई बतलाये कि हम बतलाये क्या...... ग़ालिब



जो उनने पूछा कि कितना प्यार करते हो

तबसे हैं इस सोच में कि जतलाये क्या


हम हनुमान नही इसका ही जरा गम है

वरना कहते कि दिल चीर के दिखाए क्या.... केशवेन्द्र
 

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मुद्दतों से न हमें तेरी याद आई है


और हम भूल गए है तुझे ऐसा भी नही....Firak



इस इश्क की भूलभुलैयाँ में सब कुछ लुटा बैठे

दिल भी गया हमारा और पास में पैसा भी नही....Keshav
 


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ना हो जब दिल ही सीने में


तो फिर मुह में जुबाँ क्यूँ हो

-कमलेश्वर के उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' से


ना हो जब पाँव के नीचे की जमीं

तो फिर सर के ऊपर का आसमां क्यूँ हो




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ग़ुरबत में हो अगर हम, रहता है दिल वतन में!


समझो वहीँ हैं हम भी, है दिल जहाँ हमारा !!
--- Iqbaal----



क्या हुआ गर छिन गयी पावों के नीचे की जमीं

अब भी सर के ऊपर है नीला आसमाँ हमारा

-Keshvendra


*******
हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उन को ।


क्या हुआ आज, यह किस बात पे रोना आया ?

-साहिर लुधियानवी


पास लेटी थी तुम मेरे पर मीलों के थे फासले

आज तन्हाई में उसी रात पे रोना आया.

-केशवेन्द्र
 



*****
आँख से दूर न हो दिल से उतर जायेगा


वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जायेगा


- Ahmed Faraz


दिल से चाहो जो बात वो हकीकत बनती है

ठान ले पूरे मन से जो तू वो कर जायेगा

-Keshvendra

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********
सब मेरे चाहने वाले हैं मेरा कोई नहीं


मैं भी इस देश में उर्दू की तरह रहता हूँ.


----निदा फाजली---



साजिशें किसकी, खता किसने की, सजा मुझको


मैं भी चुप हो के सारे रंजों-ग़म को सहता हूँ.

-केशव




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गुनगुनाता हुआ दिल चाहिए जीने के लिए


इस निजा-ऐ-सहर-ओ-शाम में क्या रक्खा है



हुस्न फनकार की एक छेड़ है इश्क-ऐ-नादाँ

बेवफाई के इस इलज़ाम में क्या रक्खा है



देखना यह है की वो दिल में मकीं है कि नहीं

चाहे जिस नाम से हो नाम में क्या रक्खा है.

----आनंद नारायण मुल्ला--------


पढना हो तो पढ़ लिक्खा है नजरों ने जो दिल पर

छोडो भी, कागज पर लिखे पैगाम में क्या रक्खा है

-केशवेन्द्र---

मंगलवार, मार्च 23, 2010

तूने चोट दी है ऐसे, जैसे डंक हो बिच्छू के

खुशबू का एक झोंका, आया है तुझको छू के!



आँखों से एक आंसू, छलका, गिरा है चू के !!



झगडे के बाद बीबी-मियां, बैठे हैं गुमसुम से !

याद आ रहे दिन प्रेम भरे, उनको हैं शुरू के!!



कैसा सुकून मिलता है, कहने में नही आता!


बुजुर्गों की दुआ लेते हुए, उनके पाँव छू के!!



छूटी है पाठशाला, मगर अब भी ये लगता है!

सर पर बने हुए है हाथ, अब भी मेरे गुरू के !!



सीने में कितना दर्द है, ये मुझको ही है मालूम!


तूने चोट दी है ऐसे, जैसे डंक हो बिच्छू के!!



कुछ रिश्ते नही बदलते, बदलने के ज़माने से !

पर मोटर बोटों के आते ही, दिन लदते हैं चप्पू के!!



पप्पू को दुनिया वालों ने घोंचू भले हो माना!


आई है खबर इस बार, टॉप होने के पप्पू के!!

शुक्रवार, मार्च 19, 2010

तेरी.. नहीं है, तेरी कमी

रिश्तों में है बर्फ जमी!
तेरी.. नहीं है, तेरी कमी!!



दुनिया तो निकली अक्लमंद!

बुद्धू ठहरे एक हमी!!



धरती सूखी जाती है!

आँखों में छुप गयी सारी नमी!!



खंडहरों में जीते हैं!

इक दिन बन जायेंगे ममी!!



दिल ना डोले इन्सां का !

तब डोला करती है ये जमी!!



बाजारू इस दुनिया में!

हैं रिश्ते सारे बने डमी!!



जाने क्या है होने वाला!

साँसें है सहमी-सहमी!!



बिकने कुछ दिल आये हैं!
बाजार में है गहमा-गहमी!!




रात में देखा सपना बुरा!

चीख पड़ा-"मम्मी-मम्मी"!!

शुक्रवार, मार्च 05, 2010

छाई इक धुंध- सी उदासी है

सब तो है पर कमी जरा-सी है!

जिन्दगी लगता है कि बासी है!!





तेरी यादों के सर्द मौसम पर!

छाई इक धुंध- सी उदासी है!!



जिस्म की बात छोडो जाने दो!

रूह तक मेरी कब से प्यासी है!!



कान कब से मेरे तरस से गए!

तुम से मिलती नही शाबासी है!!



साथ तुम थी तो लगता था,ये दुनिया!

जन्नत तो नहीं है पर वहां-सी है!!



तू खफा मुझसे, कोई बात नही!

शुक्र है, यादें तेरी, मेहरबां-सी है!!



हाल अब तो है ये अपना कि!

जुबां होते हुए हालत बेजुबां-सी है!!

गुरुवार, मार्च 04, 2010

एक शेर अपना एक पराया-1

साथियों, बहुत दिनों से मेरे मन में यह ख्याल था कि ग़ज़ल के दुनिया के नामचीन शायरों के पसंदीदा शेरों कि तर्ज़ पर शेर लिखूं...और उसी को मूर्त रूप दिया मैंने ऑरकुट कि कम्युनिटी महकार-ऐ शफक के माध्यम से. तो लीजिए उनमे से कुछ चुने हुए अपने-पराये शेर आपकी नज़र है-


******
धूप में निकलो, घटाओं में नहाकर देखो

जिन्दगी क्या है, किताबों को हटाकर देखो.
----निदा फाजली-----

मन के अरमानों को बाहर भी कभी आने दो
दिल के सैलाब में दुनिया को बहाकर देखो. -
------मेरा लिखा शेर----


******
तुमको देखा तो ये ख्याल आया

जिन्दगी धूप तुम घना साया
- जावेद अख्तर

दिल की हसरत कि दिल में घुट के रही
तुम न रूठी, ना मैं मना पाया.
---केशवेन्द्र-----

*******
मुझे खबर थी की वो मेरा नही पराया था

प' धडकनों ने उसी को खुदा बनाया था.

--शायर का तो पता नहीं पर गाया है लता जी ने--

जिसे ना देखने को बंद की थी ये आँखें
बंद आँखों में वही ख्वाब बनके आया था.
-केशवेन्द्र-

******
गम रहा जब तक की दम में दम रहा

दिल के जाने का निहायत गम रहा.
--------मीर--------

क्या कसक थी पता चल पाया नही
आँखें छलकी रही, ये दिल नम रहा.
====केशव====

******
इश्क में और कुछ नही मिलता

सैकड़ों गम नसीब होते हैं
```मुहम्मद नूह नारवी```

दुःख की हो सकती नहीं कोई इक वजह
सबके अपने-अपने सलीब होते है.
~~~केशव~~~


******
सीने में जलन, आँखों में तूफान सा क्यूँ है

इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूँ है
@@@शहरयार@@@@

माना की हक है जिन्दगी का परखे शौक से
पर जिन्दगी का हर कदम इम्तिहान सा क्यूँ है
**केशवेन्द्र**


******
प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है

नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है

जिस्म की बात नही थी,हमको दिल तक जाना था
लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है.
##हस्ती मल हस्ती ####


झूठ को पंख मिले है, वो तो उड़ता फिरे फर-फर
सच को चल कर आने में वक़्त तो लगता है
$$$$केशवेन्द्र$$$$$$


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नींद की ओस से पलकों को भिगोये कैसे

जागना जिसका मुकद्दर हो वो सोये कैसे

रेत दामन में हो या दश्त में हो, बस रेत ही है
रेत में फासले-तमन्ना कोई बोए कैसे
-------शहरयार------

देख बरबादियों का मंजर जुबां खामोश हुई
आंसू तक सूख चुके सारे हम रोये कैसे
====केशवेन्द्र=====


******
जख्मों को रफू कर ले, दिल शाद करे फिर से

ख्वाबों की कोई दुनिया, आबाद करे फिर से.
००० शहरयार 0000

थोडा-सा जी ले- मर ले, थोडा-सा हंस ले-गा ले
इससे पहले की कोई कोई आंधी बरबाद करे फिर से
oooकेशवेन्द्रooo


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काँटों के बीच से होकर फूलों को चूम आएगी

कि तितली के परों को कभी छिलते नही देखा.
----परवीन शाकिर-----


क्षितिज क्या है दोस्तों नजरों का धोखा है
मगर उसके सिवा धरती-गगन को कहीं मिलते नही देखा.
-----केशवेन्द्र----

दोस्तों, इस अपने-पराये शेरों कि दूसरी किश्त लेकर जल्द ही आपकी सेवा में हाजिर होंगे...तबतक के लिए विदा..

मंगलवार, मार्च 02, 2010

उदासी के रंगों की खोज

विश्व की एक और बड़ी खोज यात्रा पर निकला हूँ मैं

और यह खोज यात्रा एक छोटी-सी दिखने वाली चीज की है

दुनिया में लोगों ने खोजे हैं हर भावना के रंग

प्रेम के, शांति के, क्रांति के...भावनाओं की हर भ्रान्ति के

उदासी के सच्चे रंग किसी को भी मालूम नही.



इस खोज यात्रा में एक-एक कर मुझे करना था

उन सारे रंगों का विश्लेषण जिन्हें

जोड़ा जाता है उदासी या उदास होने से.



सबसे पहले मैं पहुंचा श्वेत रंग के पास

देखा तो वह मुझे अपनी धवलता में खिलखिलाता मिला

श्वेत को उदासी से कैसे कोई जोड़ सकता है भला.



खोज यात्रा आगे बढ़ी

पहुची धूसर मटमैले रंगों के पास

उनके पास से आई मिट्टी की सोंधी खुशबू

और कुछ नए कोपलों के तुतले चहकते बोल

धूसर मटमैला तो बड़ा ही खुशमिजाज रंग निकला.



यात्रा आगे बढती रही.

और इस बार मैं नीले रंगों के तट पर उतरा

बड़ा गुमान था कि नीले रंगों की विशाल दुनिया में

कोई तो उदासी का रंग मिलेगा, मगर

समंदर की खिलखिलाती नीली लहरें मुझे

फेन से भरी जीभ दिखा कर भाग गयी.

मैं उसकी इस शरारत पर मुस्कराकर

वहां से बढ़ चला.



यात्रा को बढ़ते चलना था, बढ़ते रहे हम

और इस बार काले रंग के पास जा पहुचे

शोक और मातम से जिसे जोडती आई है दुनिया

स्यापा करती हुए औरतों का रंग...

मगर कुछ कजरारी आँखों ने

मटकते हुए मुझे डाटा कि

काला रंग भी उदास होता है कहीं.

सहमत सा मैं आगे बढ़ चला.



रास्ते में कहीं पीली सरसों के फूल इतराते मिले

कहीं इन्द्रधनुषी तितलियाँ बलखाती मिली

कहीं चटक रंगों के फूल खिलखिलाते मिले

कहीं लोग उत्सव के रंगों में डूबते-उतराते मिले

कहीं बावरी हवाओं की धुन पर झूमते-थिरकते

हरियाले पेड़ों के झुण्ड मिले.



और फिर, धीरे-धीरे उदासी के कुछ रंग

नजरों के सामने आने शुरू हुए-

भूख-से रोते बच्चों की आँख के आंसूओं का रंग

अब तक मन को उदास किये है

सूखते तालाब में जमी काई का हरा-सावला रंग

याद दिलाता हुआ-

न जाने कितनी ठहरी जिंदगियों के उदास रंगों की.

किसी विधवा की सूनी मांग की उदास कालिमा..

ज्वालामुखी से निकलते इन्द्रधनुषी रंगों का कोलाज

जिसके खूबसूरत रंग न जाने कितनी जिंदगियों

के रंगों को हमेशा के लिए खामोश कर देंगे.





जान गया हूँ अब तो मैं की

हर चटक रंग की अपनी उदासियाँ होती है.

यूँ तो उदासी का कोई रंग नही होता

पर उदासी वह रंग है जिसके साथ

जिन्दगी का हर रंग उदास होता है.

Meri Triveniyan-2

Triveni- 2nd season

**प्यार कभी मुहताज नही

मैं शाहजहाँ नहीं और तू मुमताज नही
अपने प्रेम की निशानी कोई ताज नही

दिल कहता है-प्यार कभी मुहताज नही.

15 Febuary 2010 


**तेरा जूड़ा


किनारे की दो पतली चोटियाँ जैसे हो यमुना और सरस्वती

और बीच की चौड़ी चोटी जैसे हो चौड़ा पाट गंगा का.

 
मेरे लिए तो तेरा जूड़ा किसी त्रिवेणी से कम नही.
 
19 Febuary 2010
 
 
 
**दिल तो पत्थर नही था


दिल तो पत्थर नही था फिर भी तराशा था इसे

दिल हीरे-सा हो उठेगा ये आशा थी मुझे, मगर



दिल ने कई दिनों से धड़कना छोड़ दिया है.
 
20 Febuary 2010
 
 
 


**मुखौटा
.
एक मुखौटा लगा के यहाँ आये हो तुम


खुबसूरत है दिल तुम्हार मगर परदे में है.



और मैं हूँ की कोई राज सह सकता नही.
 
20 Febuary 2010
 
 
 
**शायर सभी निराले होते हैं


इस दुनिया के शायर सभी निराले होते हैं

दुनिया में हँसते रहते हैं घर में रोते हैं.



बीबी झाड़ू लिए मरम्मत उनकी करती है.
20 Febuary 2010




**99 के फेर में



सैकड़ों का इंतजार तो सबको होता है

99 के फेर में चाहे सचिन पड़े या कोई और,रोता है.



सैकड़ें जीत की गारंटी नहीं, ये और बात है.
 
21 Febuary 2010
 
 
 
**नींद और ख्वाब


जिन आँखों में नींद नही आती है

उन आँखों में ख्वाब कहाँ आयेंगे.



नींद और ख्वाब कभी भी बाजारू नहीं हो पाएंगे.
 
21 Febuary 2010




**उदासी में तो हर रंग उदास होता है.


सूनी-सूनी होली में कोई भी पास नही होता है

रंग छलकते हैं बाहर और भीतर, मन रोता है.



उदासी में तो हर रंग उदास होता है.
 
27 Febuary 2010
 
 
 
**होली का दिन है


उदासी के रंगों को चेहरे से मिटा दो

खुशियों के रंगों को चेहरे पे बसा लो



होली का दिन है, यूँ ही ज़ाया ना करो.
 
28 Febuary 2010
 
 
**रंग भरा चेहरा


उदासी धुलती है रंगों से या कि नहीं,

ये तो मालूम नहीं हमको, मगर



रंग भरा चेहरा उदासी को छुपा लेता है.

01 March 2010

Happy Holi friends.

रविवार, फ़रवरी 21, 2010

मेरी त्रिवेनियाँ-1

साथियों, ऑरकुट की कम्युनिटी महकार-ऐ-शफक पर लिखी अपनी जनवरी तक की त्रिवेणियों को आपके सामने रख रहा हूँ. प्रयास कैसे हैं ये तो आप लोग ही बताएँगे.


*This is my first trial to write a Triveni,


नेता-अफसर मिलकर के खाते जाते देश

और इधर टीवी पर बिग बी देते हैं सन्देश


हाजमोला-हजम सब चाहे जब(बिना डकार लिए)
29.12.2009
 
 
 
*दिल की राख जब से फिजाओं में बिखरी है


इन फिजाओं में फैली भीनी-भीनी खुशबू है.




दिल भले राख हो गया हो मगर दिल है ना.
30.12.2009
 
 
 
*नव वर्ष शिशु आया है नयी आशाओं के साथ

नव वर्ष शिशु आया है मुस्कान की भाषा के साथ


तुम्हारे हाथों में बन्दूक देख डर ना जाये वो कहीं.
01.01.2010
 
 
 
*अनमना-सा मन है, पीड़ा है अनकही


तुमको क्या, करते रहो तुम अपनी बतकही




वैसे भी तुम तो खुशियों के ही साथी हो.
03.01.2010
 
 

*Aaj raat meri 'Wo' jo mujhse kah rhi thi, usi ko dhala hai maine is Triveni me-


और कुछ हो न पता पर पता है मुझको ये बात

आजकल नींद नही आती होगी तुमको सारी रात


की सारी नींद तेरी मेरे हिस्से में जो चली आई है.
05.01.2010
 
 

*lo meri Unka sawal to aaya hi tha-jawab bhi aa gaya. Gaur farmaye...


नींद तो दे दी मुझे, ख्वाब किसे दोगे

अपनी ख्वाबों की दुनिया में मुझे कहाँ रक्खोगे


तेरी ख्वाबों की दुनिया में वैसे भी जगह कहाँ?
05.01.2010
 
 
 

*तुझसे नाराजी मिट गयी है मगर

खुद से नाराज चल रहा हूँ मैं


ये भी गर मिट गयी तो मुश्किल है.
10.01.2010
 
 
*400th Triveni

is thread ke 4th century complete karne par is thread ke karta-dharta, likhne walon or padhne walon sabokon badhai...
(Ye Orkut ki Community Maquar-e-shafaq me Triveni ke is thread ke 400 ka aankada par karne par likhi thi)

ख्वाबों की मौत का पता नही चलता


ख्वाब इतनी खामोश मौत मरते हैं.




फिर भी लोग ख्वाब-ख्वाब करते हैं.
19.01.2010
 
 
*फर्क मेरे और तेरे ख्वाब का

मेरी परिन्दगी ख्वाब देखती है नीले आसमानों के

वहीँ तेरी दरिंदगी ख्वाब देखती है खूं में नहाने के.


ख्वाब तो दोनों ही हैं, मगर उनमें फर्क कितना है.
22.01.2010
 
 
 

*आज तन्हाई में हम खुश थे बहुत

तेरी यादों ने आ के था तड़पाया नही


चाँद को देखा-तेरी याद आई और, रोने लगे.
24.01.2010
 
 
 
*प्रेम के समंदर में शार्क मछली

तेरी आँखों की दरिया में डूबे

प्रेम के समंदर में निकलते है


सुना है उस समंदर में बहुत-सी शार्क मछली हैं.
25.01.2010
 
 
 
*मेरे चेहरे पे इक मुखौटा था


आज मुझको पता चला है कि

मेरे चेहरे पे इक मुखौटा था


खुद को खरा समझने वाला सिक्का खोटा था.
25.01.2010
 
 
 
 

*इश्क कि बीमारी में अब तो हमारा दम निकले

मेरे महबूब ये मजाक नही.. तेरी कसम निकले


करना हो इलाज तो करो वरना तेरे दर से हम निकले.
25.01.2010
 
 
 

*मेरी आँखों के आंसुओं कि तमन्ना थी

तेरी आँखों से निकलने की मगर


तुम आँखें मूंद के सोये रहे.
25.01.2010





*तेरे साथ चल रहा प' तेरी आरजू नही

कि जिसकी आरजू वो किसी और राह है


दिल को कितना भुलावा देके लोग जिया करते हैं.
27.01.2010
 
 
 

*आस निराश नही होनी थी

चाहे होनी अनहोनी थी


जब से शादी हुई बेचारा रोता फिरता है.
27.01.2010
 
 
 
*'अमन की आशा'


आजकल बंदूकों से फूल बरसा करते हैं

आजकल बमों के हमले में लोग नही मरते हैं


'अमन की आशा' में देखे आशा कितनी बाकी है.
27.01.2010





*इश्क में खुशियों का हिसाब तो करते हैं मगर

इश्क में आंसुओं का हिसाब नही होता


वैसे भी आंसू बिसलेरी की बोतलों में नही बिकते.
28.01.2010



*भावुक होने के साइड इफेक्ट


मुझे इस दुनिया ने मजबूर करके रखा है

तुम्हारे इश्क ने तुमसे ही दूर करके रखा है


ज्यादा भावुक होने के ये साइड इफेक्ट सारे हैं.
28.01.2010





*'My Name is Khan'


तेरी आँखों में मेरा इंतजार रहे

तेरे दिल में मेरा ऐतबार रहे


बस प्यार रहे मैं रहूँ ना रहूँ
28.01.2010




*आंसूं आँखों में संजोये रहे, रोये नहीं

ध्रुवतारे का पता नही, फिर भी खोये नही


तेरी यादों के दिए ने हमें बुझने ना दिया.
28.01.2010



*     जख्म नासूर ना बन जाये


नाउम्मीदी है कि जख्म-पर-जख्म दिए जाती है

उम्मीद मरहम लाने गयी सो लौटी नही कब से.


डर है कि जख्म नासूर ना बन जाये मरहम के आते-आते.
30.01.2010

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शनिवार, फ़रवरी 20, 2010

धडकनों का इंस्पेक्शन

तेरी यादें जब भी दिल के गलियारे से गुजरती हैं

धडकनें थोड़ी टेंशन में, खड़ी attention में

उसको देख कर बजाती है

एक कड़क-सा सैल्यूट.



तुम्हारी यादें

धडकनों का इंस्पेक्शन करती हैं

चेक करती हैं कि धडकनों कि वफादारी

किसी और के लिए तो नही..

धड़कने किसी और के लिए तो नही

धड़कती हैं..



और फिर एक गर्व भरी टेढ़ी-सी

मुस्कान लिए अपने चेहरे पर

दिल के गलियारों से आगे बढ़ लेती है.



धडकनों को तो ये भी पूछने का हक नही

कि तेरी यादें किसी और की धडकनों की

सलामी तो नही लेती....?

मंगलवार, फ़रवरी 16, 2010

प्रेम दिवस के अवसर पर एक ग़ज़ल

साथियों, प्रेम दिवस  के  अवसर पर थोड़ी देर से  ही  सही पर अपनी ताजी-ताजी ग़ज़ल लेकर आपकी सेवा में हाजिर हो रहा हूँ. आप सब को मेरी शुभकामना की आप सब के जीवन में सच्चा प्रेम आये और आप उसे पहचान कर उसे अपनी जिन्दगी बना सके और फिर औरों की जिंदगियों में भी प्रेम भरी खुशियाँ फैला सके.

प्यार कभी मुहताज नही

मैं शाहजहाँ नहीं और तू मुमताज नही!

अपने प्रेम की निशानी कोई ताज नही!!


दिल ने तब भी छेड़े गीत तुम्हारी यादों के!

जब हाथों में मेरे कोई साज नही!!


बिछड़े हमको कितने ज़माने-से बीत गए!

विरहा की बातें करती रहना, आज नही!!


वो भी वक़्त था लोग कहते थे जब हमसे!

इश्क को छोडके तुमको कोई काज नही!!


राधा के हर आंसू का है दर्द पता!

पर दिल कहता, कान्हा धोखेबाज नही!!


अरमां करता मैं भी ताज बनाऊ इक!

दिल कहता है प्यार कभी मुहताज नही!!

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मंगलवार, फ़रवरी 09, 2010

मुंबई और मेलबोर्न

साथियों, एक कच्ची-सी कविता आपके सामने रख रहा हूँ, जान-बूझकर इसे पकाया नही क्यूंकि यह कविता महत्वपूर्ण नही, विषय महत्वपूर्ण है. प्रवासियों के मुद्दे पर इस दोहरे मापदंड पर आप लोगों के विचारों का इंतजार रहेगा. अपने ही देश में पराये बनते लोगों की पीड़ा को देश की जनता की सकारात्मक और मानवीय सोच ही मिटा सकती है.





हे मुंबई के महामहिम नेता!

काश की तुम या तुम्हरा कोई सगा

आस्ट्रेलिया में भारतीयों पर हो रही

नस्लीय हिंसा का शिकार होता;

तब शायद तुम समझ पाते

यूपी, बिहार और भारत के कोने-कोने से

पढाई, रोजगार या किसी और मरीचिका के पीछे

मुंबई में आकर झोपड़पट्टियों या

माचिस के डिब्बों जैसी काल-कोठरियों में

जैसा-तैसा जीवन गुजारते लोगों की

भय, विवशता और बेबसी को.



शायद फिर तुम कभी नही बांटते मुंबई को

मेरी-तेरी के सींखचों में.

कहते यही तुम कि मुंबई तो हमारी है.

कहते तुम कि मुंबई तो हर उस की है

जो दिल-और-जान से इसका है.



काश कि तुम एक बार

नेता की जगह,

इंसान बन कर सोचते!

गुरुवार, जनवरी 28, 2010

प्रेम अकेला कर देता है: ईमान मर नहीं सकता

प्रेम अकेला कर देता है: ईमान मर नहीं सकता

ये समय अब ना रहा मीर-ओ-ग़ालिब का

सीने में कितना दर्द है, कैसी ये आह है
कितनी नाउम्मीदी, कितनी बेबस चाह है?

तेरे साथ चल रहा प' तेरी आरजू नही
कि जिसकी आरजू वो किसी और राह है

मेरी छोटी खताओं को भी मिली है बड़ी सजा
तेरे खून सौ भी माफ़ है, तू कहाँ का शाह है?

ये समय अब ना रहा मीर-ओ-ग़ालिब का
बाजारू शेरों  पे यहाँ अब मिलती वाह है.

'हे राम' कहा सच का जब छलनी हुआ सीना
उसकी पुकार से भी करुण ये किसकी कराह है?

बुधवार, जनवरी 27, 2010

ऐसी ही कोई आस हूँ.


ना खुश हूँ, ना उदास हूँ!
ना दूर हूँ, ना पास हूँ!!

 
मिट पाए ना मिटाने से!
ऐसी अबूझ प्यास हूँ!!
 
 
हर पाँव जिसको रौंदता!  
बेबस-सी  मैं वो घास हूँ!!
 
 
सारी उदासी धुल उठे!
ऐसा मुकम्मल हास हूँ!!
 
 
बुझ-बुझ के भभक जो उठे!

ऐसी ही कोई आस हूँ!!

सोमवार, जनवरी 25, 2010

तेरी रूह के निशान निकलते हैं

झगड़ों में जब भी आगे आन-और-बान निकलते हैं!

जंगल के घर-घर से तब तीर-कमान निकलते हैं!!


खूबसूरत मुखौटे के पीछे!

बदसूरत इंसान निकलते हैं!!


तन का मुखौटा हटा के देखो!

क्या भगवान निकलते है?


दुनिया की आग में जलनेवाले!

कुंदन के समान निकलते है!!


बाबाओं के पास जाकर लोग !

और भी परेशान निकलते हैं!!


जंगल में बस्ती मिलती है!

शहर वीरान निकलते हैं!!


मेरे  जिस्म के कतरे-कतरे से!
तेरी रूह के निशान निकलते हैं!!


तुम जब भी गुमी हो, तलाश में तेरी!

मेरे जिस्म-और-जान निकलते हैं!!

शुक्रवार, जनवरी 22, 2010

मेरी परिन्दगी ख्वाब देखती है

मेरी परिन्दगी ख्वाब देखती है नीले आसमानों के!

वहीँ तेरी दरिंदगी ख्वाब देखती है खूं में नहाने के!!



क़त्ल करना है तो कर छोड़ना तो छोड़ कर तू जा!

धमकियों के नही हैं, ना रहे दिन आजमाने के!!



ये डींगे लम्बी-लम्बी हांककर बहलाओ ना हमको!

नही अपने हुए तुम क्या हुए फिर तुम ज़माने के!!



की दौलत हाथ तो आई मगर रिश्ते भुला बैठे!

चलो फिर से चले हम खोज में खोये खजाने के!!



नयी बीबी के पास आया है सरहद से कोई फौजी!

बहाने ढूंढ़ता रहा छुट्टी भर वापस ना जाने के!!



मजा तो इश्क में आता है बदले अंदाज़-ऐ-मोहब्बत से!

चलो ढूंढे बहाने फिर नए इक-दूजे को सताने के!!



भला करने गए लोगों की अब है खैरियत मुश्किल!

नही ये वक़्त अब है ना रहे राहों से पत्थर हटाने के!!



जो उम्र होती है खेलने-कूदने-हंसने-गाने की!

उस उम्र में भूख सिखा देती है गुर कमाने के!!

प्रेम अकेला कर देता है: बलात्कार के विरुद्ध

प्रेम अकेला कर देता है: बलात्कार के विरुद्ध

बुधवार, जनवरी 20, 2010

प्रेम अकेला कर देता है: निराला की याद में

प्रेम अकेला कर देता है: निराला की याद में

निराला की याद में

बसंत पंचमी माँ शारदे की पूजा का पवन त्यौहार होने के साथ हिंदी के महानतम  कवियों में एक महाप्राण महाकवि निराला का जन्मदिन भी है. महाप्राण निराला को याद करते हुए आज के दिन मैंने जो कविता लिखी है उसे आप सबों की सेवा में पेश कर रहा हूँ. बसंत पंचमी और सरस्वती पूजा की शुभ्र शुभकामनाएँ.


महाप्राण

कितना सोच समझ कर चुना था

अपने लिए निराला उपमान

कविता ही नही जिन्दगी भी

निराली जियी



अपरा, अनामिका से

कुकुरमुत्ते और नए पत्ते तक की

काव्य यात्रा में ना जाने

कितने साहित्य-शिखरों को लांघ

हे आधुनिक युग के तुलसीदास

जीवन भर करते रहे तुम राम

की तरह शक्ति की आराधना

अत्याचारों के रावण के नाश के लिए

राम को तो शक्ति का वरदान मिला




तुम कहो महाकवि

तुमको क्या मिला?

जीवन के अंतिम

विक्षिप्त पलों में

करते रह गए गिला

की मैं ही वसंत का अग्रदूत

जीवन की त्रासदियों से जूझते

कहते रहे तुम-

"स्नेह निर्झर बह गया है

रेत ज्यों तन रह गया है."



हे महाकवि, हर युग ने

अपने सबसे प्रबुद्ध लोगों को

सबसे ज्यादा प्रताड़ित किया है

सबसे ज्यादा दुःख दिए हैं उन्हें

तुम्हे दुःख देने में तो

दुनिया के साथ विधाता भी

नही रहे पीछे

पहले प्रिय पत्नी और फिर पुत्री

'सरोज की करुण स्मृति

नम करती आई है तुम्हारी कविताओं को

करुण रस से नही आंसुओं से.



इतने दुःख को झेला

फिर भी अपने अक्खड़-फक्कड़

स्वाभाव को छोड़ा नही

अपनी शर्तों पर जियी जिन्दगी

दुनिया छलती रही तुम्हे

और तुम दुनिया को ललकारते रहे.

गुलाबों को, अट्टालिकाओं को, धन्ना सेठों को

चेतावनी देते रहे

कुकुरमुत्तों, पत्थर तोड़ने वाली, कृषकों

और भिक्षुक की तरफ से



महाकवि, हे महाप्राण

तुम्हारी विद्रोही चेतना का

एक अंश भी पा जाये तो

धन्य हो उठे जीवन.

तुम्हारे जन्मदिन पर हे कविगुरु,

तुम्हे नमन.

फिर भी लोग ख्वाब-ख्वाब करते हैं.

दोस्तों, ब्लोगों की  दुनिया से दूर ऑरकुट में भी कुछ communities  में  काफी रचनात्मक संभावनाएं दिखती है. ऑरकुट में ऐसी है एक प्यारी कम्युनिटी है महकार-ऐ-शफक. इस कम्युनिटी ने इधर पिछले एक महीने में मुझे लिखने के लिए काफी प्रेरणा दी है और मैं शुक्रगुजार हूँ इस समुदाय का. तो लीजिए  पेश है ख्वाबों पर चली इस समुदाय की बतकही की प्रेरणा से लिखी मेरी ताजा-तरीन ग़ज़ल-
                   "फिर भी लोग ख्वाब-ख्वाब करते हैं. "

इंसान ख़ुदकुशी कहाँ करते हैं
वो तो ख्वाबों की मौत मरते हैं.


इस पेड़ के नीचे ना खड़े हो दोस्त मेरे
इससे पीले उदास पत्ते झड़ते हैं.


अपने गम में होते हैं बहोत तन्हा
हर गम औरों का जो हरते हैं


ख्वाबों की लाशों से अटी-पटी ये दुनिया
फिर भी लोग ख्वाब-ख्वाब करते हैं.


अपनी ऊँगली की पोरों से यूँ छुओ ना हमको
ऐसे छूने से हम सिहरते हैं.


ख्वाबों की मौत का पता नही चलता
ख्वाब इतनी ख़ामोशी से मरते हैं.

शनिवार, जनवरी 16, 2010

प्रेम अकेला कर देता है: पानी-पानी रे...

प्रेम अकेला कर देता है: पानी-पानी रे...

पानी-पानी रे...

                                        
                                 'पानी-पानी रे...'-पानी बाबा राजेंद्र सिंह त्रिशूर, केरल में
                                                         (07Dicember2009)

दिसम्बर  के महीने में केरल के त्रिशूर जिले में UNICEF  और जिला प्रशासन  की साझेदारी में सहस्त्राब्दि विकास लक्ष्य के एक पहलू जल और स्वच्छता को लेकर परिचर्चा का आयोजन किया गया था जिसमे मुख्य अतिथि के रूप में पधारे थे हमारे अपने पानी बाबा- मैग्सेसे  अवार्ड से सम्मानित राजेंद्र सिंह जी. भव्य प्रशांत मुखमंडल वाले इस महान कर्म योगी की गहरी पनियाई आँखें बता रही थी इस शख्श के समंदर जैसे व्यक्तित्व की गहराई को.  सभा में और भी बहुत सारे विद्वतापूर्ण भाषण हुए पर मेरा मानों सारा ध्यान पानी बाबा पर ही केन्द्रित था और मैं उनके भाषण को सुनने की उत्सुक प्रतीक्षा कर रहा था.


और जब वो घड़ी आई तो हिंदी में अपनी बात को रखते राजेंद्र जी को सुनना एक अनूठा अनुभव बन कर रह गया.  एक अहिन्दीभाषी राज्य में बड़े आत्मविश्वास के साथ हिंदी में बोलते हुए जब राजेन्द्रजी ने कहा की मुझे मलयालम बहुत प्यारी लगती है पर आती नही, अंग्रेजी आती है पर बोलने में जो दिल से बात निकलती है वो हिंदी में ही निकलती है, तो मन गदगद हो उठा. और जब उन्होंने कहा की दिलों के बीच भाषा की दीवारें नही होती तो सारे मलयाली लोग भी खुश हो उठे.  फिर राजेन्द्रजी अपने दिल के विषय पानी पर आये.  कहा कि पानी को समझना और पानी को प्यार से जीना जीवन के लिए जरुरी है.  44  नदियों के राज्य केरल की प्यार से चर्चा करते हुए वे इस बात से व्यथित दिखे की केरल की नदियाँ  बुरी तरह से प्रदूषित हो रही है.


और फिर उन्होंने अपनी चमत्कारी-सी दिखने वाली सफलता की दास्ताँ सुनाई -राजस्थान में सात मृत नदियों को पुनर्जीवित करने की अपनी महागाथा. उनका जीवन भी प्रेरणा की एक खुली किताब है- कैसे एक आयुर्वेदिक डॉक्टर  के मन में समाजसेवा का जूनून आया और उसमे  भी गाँव वालों के पलायन को रोकने  के लिए पानी की समस्या को सुलझाने का काम हाथ में लिया उसने.  और गाँव वालों के सहयोग और युवाओं की मदद से उन्होंने सात मृत पड़ी नदियों को पुनर्जीवित करने का भागीरथ कार्य कर दिखाया.  उनकी भाषा  और कहने के रोचक अंदाज़ की तो बात ही निराली थी. जैसे जब वे सवाल पूछते है की राजस्थान में पानी का सबसे बड़ा चोर कौन है  और फिर जवाब देते हैं- सूरज, तो श्रोताओं को निश्चित ही बड़ा मजा आता है.  फिर जब वे बड़े ही लयात्मक अंदाज़ में अपना जल संरक्षण का फंडा  समझाते हैं कि दौड़ते पानी को चलना सिखाओ, चलते पानी को रेंगना सिखाओ, रेंगते पानी को धरती में छुपा दो ताकि चोर सूरज की नजर ना पड़े उस पर; और जब जरुरत हो तो उसे निकाल  कर जीवन बचा लो-तो मानों जनजीवन के मुहावरे में एक चित्र मूर्तिमान हो उठता है. जब  उन्होंने अपने प्रस्तुतीकरण में राजस्थान में 1985  के समय के सूखा ग्रस्त क्षेत्रों और सूखी नदियों कि तस्वीरें दिखाई और उन्ही जगहो की पानी और हरियाली से भरी वर्तमान तस्वीरें दिखाई तो सच में लगा कि  यह किसी चमत्कार से  कम नही.


राजेंद्र जी ने अपने संवाद में और भी कई महत्वपूर्ण मुद्दे उठाये जिसमे सबसे अहम् जल प्रबंधन  की प्रणालियों को लेकर था.  उन्होंने कहा की क्या कारण है की भारत के अधिकांश शहर पानी की किल्लत से जूझ रहे हैं, क्या कारण है की सरकार जानता को स्वच्छ पेयजल तक उपलब्ध नही करा पा रही है?  सरकार की तरफ से बहाने दिए जाते हैं की ऐसा बेतहाशा बढ़ी जनसंख्या के कारण हो रहा है या फिर अमुक कारण से हो रहा है पर असलियत है की ऐसा इसलिए हो रहा है की इंजीनियरों  और नागरिक समाज के बीच काफी अलगाव और दूरी आ गयी है. पहले के ज़माने में भी काफी बड़े शहर थे हमारे देश में और वहां जल प्रबंधन काफी उत्कृष्ट था. जैसे उन्होंने गढ़ सीसर तालाब का उदहारण दिया. राजस्थान में स्थित  इस तालाब को उस ज़माने में शहर की पानी की जरुरत को पूरा करने में उपयोग किया जाता था. तालाब में हाथी और घोडा बने हुए हैं. ये शिल्प की सजावट के लिए नही वरन जल प्रबंधन के लिए बनाये गए थे. हाथी के पैरों तक पानी होने का मतलब की शहर की एक साल की जरुरत का पानी उपलब्ध है और उसके सर तक पानी होने का मतलब की दो साल की जरुरत का पानी उपलब्ध है.  इस उदाहरण को सामने रखकर उन्होंने बताया की समय की कसौटी पर खड़ी उतरी स्थानीय देशज जल संरक्षण की प्रणालियों को अपनाये जाने की जरुरत है. पुराने जल संरक्षण की प्रणालियों को जीवित करने के साथ-साथ नयी प्रणालियों को भी विकसित किया जाना चाहिए.  इस सन्दर्भ में भूमिगत जल का स्तर बनाये रखने के लिए जोहड़ और तालाब की भूमिका पर भी उन्होंने प्रकाश डाला. सुनते हुए प्रख्यात पर्यावरणवादी अनुपम मिश्र की किताब 'आज भी खरे हैं तालाब' का स्मरण हो आया जिसके बारे में मैंने बहुत पढ़ा है पर जिसे दुर्भाग्यवश अभी तक नही पढ़ पाया हूँ.


पानी की चर्चा करते हुए जब राजेन्द्रजी राजस्थान की महिलाओं की पानी लाने में किये जा रहे श्रम और कष्ट को बता रहे थे तो लगा की भाग्यवान हैं वो लोग जिन्हें जीवन की इस सबसे बड़ी जरुरत के लिए मशक्कत नही करनी पड़ती. देश के कई कोनो की उन महिलाओं की पीड़ा सोचिये जिन्हें सर पर बर्तन लेकर मीलों की यात्रा बस पानी जुटाने के लिए करनी पड़ती है, उन किशोरियों की सोचिये जो पानी की इस मज़बूरी की वजह से विद्यालय जाने से वंचित रह जाती  हैं. उस पीड़ा को अपने मन में  मूर्त कर सके तो बिसलेरी की बोतलों से पानी पीते हुए पानी की समस्या पर गंभीर विमर्श करते हम लोगों को पानी की समस्या शायद समझ में आये.


कई और भी सार्थक और गहन बाते कही राजेंद्र जी ने, साधारण सी लगने वाली असाधारण बाते- जैसे 'पानी का व्यवसाय तो हर कोई कर सकता है पर पानी कोई बना नही सकता.' नेताओं द्वारा इस अतिगंभीर मुद्दे की अवहेलना का दर्द भी उनकी बातों में बार-बार झलक रहा था. मरती या प्रदूषित होती नदियों के दर्द के प्रति किसी का भी ध्यान ना जाने की पीड़ा उनके चेहरे और उनके स्वर से झांक रही थी. वे प्लास्टिक की सभ्यता  और आधुनिक जीवनशैली द्वारा बढ़ते प्रदूषण और इस वजह से नदियों के जीवन के सामने उपस्थित आसन्न खतरे के प्रति बड़े गंभीर और चिंतित थे. उनका कहनाथा की पानी पर मनुष्य, पशुओं और पेड़ों का सामान अधिकार है और हमें इन सब के लिए पानी को बचाना होगा.

राजेंद्र जी के शब्दों में पर्यावरण और जल से संबंधित समस्याओं का "कोपनहेगन जैसी जगहों से समाधान नही निकलेगा, समाधान निकलेगा त्रिशूर जैसी जगहों से." वे देशज प्रद्धति से जल और पर्यावरण की समस्याओं से निपटने की बात कर रहे थे. उनका कहना था की पर्यावरण की परवाह किये बिना  लाए गए बड़े-बड़े बांध जैसे प्रोजेक्ट Displacement , Disaster  और Drought के सिवा कुछ नही लाते.  उनका कहना था की  नदियों के प्रदूषण को समझ, समाज को उन्हें प्रदूषण मुक्त बनाने की जिम्मेदारी उठानी होगी. रिवर बेसिन प्रबंधन के बाद ही नदी से जुडी किसी-भी  परियोजना को मूर्त रूप दिया जाये, इसकी निगरानी करनी होगी.  पानी पंचायत और पानी संसद बना कर पानी की लड़ाई को मुख्यधारा की लड़ाई बनाना उन्होंने अभी के वक़्त की जरूरत बताया. अगर हम पानी को बचाने के प्रति अपनी जिम्मेदारी से अभी चूके तो अगला विश्वयुद्ध निश्चय ही पानी को लेकर होगा, ये उनकी भविष्यवाणी थी. वाकई भारत के ही कई शहरों, राज्यों में पानी को लेकर जो हाहाकार मचा है और विश्व के कई हिस्से में कई देशों में पानी को लेकर जो नदी जल बटवारे के विवाद चल रहे हैं, वे इस भविष्यवाणी  के सच हो सकने की आशंका जताते हैं...अगर हम नही चेते.


पानी के ऊपर इस सारे संवाद को सुनते हुए 4-5 साल पहले  बिहार की बाढ़ के ऊपर लिखी अपनी चंद पंक्तियाँ याद आती रही. लीजिए, आप सबों की  खिदमत में पेश है वे पंक्तियाँ-
देख पानी की तांडव लीला आँख में भर आये पानी
पानी ने लीली ना जाने कितनी ही जिंदगानी
पानी कहीं जिन्दगी है, यहाँ मौत है पानी
पानी कहीं ख़ुशी है, यहाँ सोग है पानी.

वाकई,  पानी की लीला महान है, एक और तो बिन पानी जीना दुश्वार है, दूसरी और कोसी की प्रलयंकारी बाढ़  के भुक्तभोगियों से पूछे या फिर सुनामी की तांडव नृत्य करती लहरों में अपना सब कुछ लुटाने वाले लोगों से पूछिये...उनके लिए पानी के मायने अलग है. वाकई जिस पानी में इस सृष्टि के प्रथम जीवन का सृजन हुआ, वही पानी इस सृष्टि के हर जीवन को जिलाए रखने का भी हेतु है और अगर हम उसका यूँ ही दुरूपयोग करते रहे तो वह इस सृष्टि के हर जीवन को नष्ट करने की भी क्षमता रखती है.  पानी को प्यार करना, पानी को समझना और पानी को बचाना हमारे जीवन के ही लिए नही वरन दुनिया के हर जीवधारी के जीवन को बचाए रखने के लिए जरुरी है. दोस्तों, आइये हम भी जल संरक्षण की दिशा में कुछ सोचे, कुछ करे...बूँद-बूँद से घड़ा भरता है, ये पानीदार कहावत तो शायद सबके जहन में होगी ही... हम भी पानी की चंद बूँद बचाए, पानी के बाजारीकरण को रोकने की दिशा में प्रयास करे,नदियों-तालाबों को प्रदूषण मुक्त करने और उन्हें बचाने में अपना योगदान दे और इस सन्दर्भ में जागरूकता फैलाकर जल संरक्षण के इस परमावश्यक अभियान में अपनी भागीदारी दर्ज करे.   क्यूंकि पानी की उपलब्धता यूँ ही घटते-घटते अगर चुल्लू-भर ही पानी बचा और हम लोग दुर्भाग्य से उस समय तक जीवित बचे तो हमारे पास उस चुल्लू-भर पानी में डूब मरने के सिवा कोई चारा नही बचेगा.

बुधवार, जनवरी 06, 2010

बादलों के घेरे में

बादलों के घेरे में
चेहरा तेरा दिखता है

क्या बताऊँ और किसे
गम भी जहाँ में बिकता है

ख़ुशी-आशा आए-गए
देखे मन में क्या अब टिकता है

दूर तक पसरा अँधेरा
मुझको तो अब दिखता है

खुश रहो कहता सभी से
दुनिया से ये ही रिश्ता है

बिछुड़ना तेरा याद आये तो
जख्म दिल का रिसता  है

विरह की चक्की में देखो
ह्रदय मेरा पिसता है

प्रेम करके प्रेम ही पाए
इंसां नही वो फ़रिश्ता है

हमने तो देखा यारों
प्रेम का गम से रिश्ता है.

(कृष्ण सोबती की कहानी "बादलों के घेरे" को समर्पित)

मंगलवार, जनवरी 05, 2010

मेरा कोई कारवां नही

मुझे जिन्दगी का मर्ज है

जिसकी कोई दवा नही



मैं जहां में तन्हा-तन्हा हूँ

यहाँ कोई मेरा हमनवां नही



मेरा दिल अभी भी है सीने में

ये कोई दिल-ए-नातवां नही



मैं अडिग हूँ अपनी जमीन पर

मुझे हिला सके वो हवा नही



लाखों हैं मेरे हमसफ़र

पर मेरा कोई कारवां नही

बस दिल में तेरी वफ़ा रहे

जब तलक जिन्दा रहे

हम जिन्दगी से खफा रहे



मौत आये करीब तो बस

दिल में तेरी वफ़ा रहे



जिन्दगी कभी ठहरे नही

ये ही मेरा फ़लसफ़ा रहे



पलड़े बराबर रहे दोनों

नाही नुकसां नाही नफा रहे



दामन भले मेरा काला हो

औरों के दामन सफा रहे



मैं छोडूँ जब इस दुनिया को

मुझपर ना कोई दफा रहे.

रविवार, जनवरी 03, 2010

ग़जल-जिन्दगी से क्या गिला

अनमना-सा मन है, पीड़ा है अनकही
तुमको क्या,करते रहो तुम अपनी बतकही

भुला दिया था जिसको हमने बरसों पहले
आज क्यूँ उसकी याद आँखों से आंसू बनके बही

फिर से याद आई है अपनी इज़हार-ए-मोहब्बत
और उसके होठों से निकली रुंधी-सी 'नहीं'

उसको अपनी जिन्दगी से तो निकाल दिया
मगर उसकी यादें दिल में घर करके रही

जिन्दगी में जो मिला हंसकर के लिया
ख़ुशी मिली  तो भी अच्छा,गम मिला तो भी सही.

शनिवार, जनवरी 02, 2010

मन की पीड़ा अनकही

मन को कितनी.... पीड़ा होती है
जब तेरी आँखों में दिख जाता कोई मोती है.

दूर मुझसे जो रहो खुश.. तो कोई बात नही
तन्हा होते हुए भी गम का अहसास नही

मांगती फिरती हो खुशियों की दुआ सबके लिए
काश! लोगों के दिलों में आईने होते

जब से तेरी आँख में आंसू देखा
तब से मन मेरा बड़ा सूना है
बाँट सकता नही तेरा गम में
इसका दुःख मुझको और दूना है

ख्वाहिशे मन की मेरी मन में रही
बच गई एक तमन्ना..जो जीवन में रही

कोई दिन आएगा ऐसा की मेरी याद आएगी
अपने गम बांटने को, मुझको तू बुलाएगी.

क्या पता, वो दिन कब आएगा?
क्या पता, वो घडी आ पायेगी?
क्या पता..कल को क्या-क्या होगा?
क्या पता..उसको क्या पता होगा?

कल की ना जानूँ , मैं इतना जानूँ
 मौला जो भी करे अच्छा होगा.

बात सुन मेरी मेरे हमनवा, ओ यार मेरे!
भूल से भूलना भी मुमकिन ना, पहले प्यार मेरे
ये जो मौसम है उदासी का, चला जायेगा
कोई प्यारी-सी धुन.. भंवरा गुनगुनाएगा
तब मुझे याद करो, ना करो, कोई बात नही
अपने गम में मुझे बेगाना ना समझा करना
मुझपे ज्यादा ना सही, इतना भरोसा करना
एक आवाज जरा देके देख तो लेना
मैं वहां हूँ तुम्हारे साथ में या की नहीं....