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नशा शराब का ज्यादा है या कि साकी का

नशा शराब का ज्यादा है या कि साकी का ! छुपी कशिश का असर ज्यादा या बेबाकी का !! बहुत सी ठोकरें खायी, मगर अभी तक भी ! दिल-ए-नादाँ ने सीखा सबक ना चालाकी का !! पूस की रात कितनी आयी-गयी मगर हल्कू ! समझ ना पाया अब तक हिसाब बाकी का !! देवता और शैतान दोनों का ही ये पहनावा है ! समझ में आता नहीं कैरक्टर यारों खाकी का !! समय के साथ दिल की दुनिया बदल गयी कितनी ! गया बचपन के साथ शौक ताजिये की झांकी का !! अपनी ऐय्याशियों के बीच जरा देखो इधर ! कितने लोगों के लिए जिन्दगी मायने है फाकी का !!

ये समय अब ना रहा मीर-ओ-ग़ालिब का

सीने में कितना दर्द है, कैसी ये आह है कितनी नाउम्मीदी, कितनी बेबस चाह है? तेरे साथ चल रहा प' तेरी आरजू नही कि जिसकी आरजू वो किसी और राह है मेरी छोटी खताओं को भी मिली है बड़ी सजा तेरे खून सौ भी माफ़ है, तू कहाँ का शाह है? ये समय अब ना रहा मीर-ओ-ग़ालिब का बाजारू शेरों  पे यहाँ अब मिलती वाह है. 'हे राम' कहा सच का जब छलनी हुआ सीना उसकी पुकार से भी करुण ये किसकी कराह है?

तेरी रूह के निशान निकलते हैं

झगड़ों में जब भी आगे आन-और-बान निकलते हैं! जंगल के घर-घर से तब तीर-कमान निकलते हैं!! खूबसूरत मुखौटे के पीछे! बदसूरत इंसान निकलते हैं!! तन का मुखौटा हटा के देखो! क्या भगवान निकलते है? दुनिया की आग में जलनेवाले! कुंदन के समान निकलते है!! बाबाओं के पास जाकर लोग ! और भी परेशान निकलते हैं!! जंगल में बस्ती मिलती है! शहर वीरान निकलते हैं!! मेरे  जिस्म के कतरे-कतरे से! तेरी रूह के निशान निकलते हैं!! तुम जब भी गुमी हो, तलाश में तेरी! मेरे जिस्म-और-जान निकलते हैं!!

मेरी परिन्दगी ख्वाब देखती है

मेरी परिन्दगी ख्वाब देखती है नीले आसमानों के! वहीँ तेरी दरिंदगी ख्वाब देखती है खूं में नहाने के!! क़त्ल करना है तो कर छोड़ना तो छोड़ कर तू जा! धमकियों के नही हैं, ना रहे दिन आजमाने के!! ये डींगे लम्बी-लम्बी हांककर बहलाओ ना हमको! नही अपने हुए तुम क्या हुए फिर तुम ज़माने के!! की दौलत हाथ तो आई मगर रिश्ते भुला बैठे! चलो फिर से चले हम खोज में खोये खजाने के!! नयी बीबी के पास आया है सरहद से कोई फौजी! बहाने ढूंढ़ता रहा छुट्टी भर वापस ना जाने के!! मजा तो इश्क में आता है बदले अंदाज़-ऐ-मोहब्बत से! चलो ढूंढे बहाने फिर नए इक-दूजे को सताने के!! भला करने गए लोगों की अब है खैरियत मुश्किल! नही ये वक़्त अब है ना रहे राहों से पत्थर हटाने के!! जो उम्र होती है खेलने-कूदने-हंसने-गाने की! उस उम्र में भूख सिखा देती है गुर कमाने के!!

बादलों के घेरे में

बादलों के घेरे में चेहरा तेरा दिखता है क्या बताऊँ और किसे गम भी जहाँ में बिकता है ख़ुशी-आशा आए-गए देखे मन में क्या अब टिकता है दूर तक पसरा अँधेरा मुझको तो अब दिखता है खुश रहो कहता सभी से दुनिया से ये ही रिश्ता है बिछुड़ना तेरा याद आये तो जख्म दिल का रिसता  है विरह की चक्की में देखो ह्रदय मेरा पिसता है प्रेम करके प्रेम ही पाए इंसां नही वो फ़रिश्ता है हमने तो देखा यारों प्रेम का गम से रिश्ता है. (कृष्ण सोबती की कहानी "बादलों के घेरे" को समर्पित)

मेरा कोई कारवां नही

मुझे जिन्दगी का मर्ज है जिसकी कोई दवा नही मैं जहां में तन्हा-तन्हा हूँ यहाँ कोई मेरा हमनवां नही मेरा दिल अभी भी है सीने में ये कोई दिल-ए-नातवां नही मैं अडिग हूँ अपनी जमीन पर मुझे हिला सके वो हवा नही लाखों हैं मेरे हमसफ़र पर मेरा कोई कारवां नही

बस दिल में तेरी वफ़ा रहे

जब तलक जिन्दा रहे हम जिन्दगी से खफा रहे मौत आये करीब तो बस दिल में तेरी वफ़ा रहे जिन्दगी कभी ठहरे नही ये ही मेरा फ़लसफ़ा रहे पलड़े बराबर रहे दोनों नाही नुकसां नाही नफा रहे दामन भले मेरा काला हो औरों के दामन सफा रहे मैं छोडूँ जब इस दुनिया को मुझपर ना कोई दफा रहे.

ग़जल-जिन्दगी से क्या गिला

अनमना-सा मन है, पीड़ा है अनकही तुमको क्या,करते रहो तुम अपनी बतकही भुला दिया था जिसको हमने बरसों पहले आज क्यूँ उसकी याद आँखों से आंसू बनके बही फिर से याद आई है अपनी इज़हार-ए-मोहब्बत और उसके होठों से निकली रुंधी-सी 'नहीं' उसको अपनी जिन्दगी से तो निकाल दिया मगर उसकी यादें दिल में घर करके रही जिन्दगी में जो मिला हंसकर के लिया ख़ुशी मिली  तो भी अच्छा,गम मिला तो भी सही.

इश्क का फ़लसफा

इश्क में मंजिल आसान नही होती काश की तुम इससे अनजान नही होती। इश्क तो भूलभुलैयाँ है देह और मन की किधर है प्रेम,किधर वासना,पहचान नही होती। इश्क तो फूल है कमल का जिसकी आभा पंक में वासना के रहके भी म्लान नही होती। पंख होंगे वासना के, इश्क के तो पाँव होते हैं तुम भी ये जान लो की इश्क में उड़ान नहीं होती। इश्क तो बंदगी है, सादगी में पलता है इश्क सच्चा है वही जिसमे झूठी शान नही होती। शमा के इश्क में जलता हुआ परवाना सुनो कहता है इश्क में जान जो देती हैं, वो नादान नहीं होती। इश्क का फ़लसफा समझा तुमने गर होता जान जाती की यूँही बुलबुलें कुर्बान नहीं होतीं.