मंगलवार, फ़रवरी 15, 2011

नशा शराब का ज्यादा है या कि साकी का

नशा शराब का ज्यादा है या कि साकी का !
छुपी कशिश का असर ज्यादा या बेबाकी का !!

बहुत सी ठोकरें खायी, मगर अभी तक भी !
दिल-ए-नादाँ ने सीखा सबक ना चालाकी का !!

पूस की रात कितनी आयी-गयी मगर हल्कू !
समझ ना पाया अब तक हिसाब बाकी का !!

देवता और शैतान दोनों का ही ये पहनावा है !
समझ में आता नहीं कैरक्टर यारों खाकी का !!

समय के साथ दिल की दुनिया बदल गयी कितनी !
गया बचपन के साथ शौक ताजिये की झांकी का !!

अपनी ऐय्याशियों के बीच जरा देखो इधर !
कितने लोगों के लिए जिन्दगी मायने है फाकी का !!

3 टिप्‍पणियां:

आशुतोष ने कहा…

बहुत सी ठोकरें खायी, मगर अभी तक भी !
दिल-ए-नादाँ ने सीखा सबक ना चालाकी का !!

wah bhavawyakti ki aachi panktiyan..
aasha hai aage bhi milti rahengi..
badhaiyan...

Umesh ने कहा…

बहुत बढ़िया रचना है केशवेन्द्र। बहुत दिनों बाद तुम्हे पढ़ने का मौका मिला।

KESHVENDRA ने कहा…

Ashutosh ji, rachna ko pasand karne ke liye aabhar.

Chauhan sir, Bahut-Bahut shukriya. Aap ki hausla-afjai se likhne ka utsah duna ho jata hai.