शनिवार, नवंबर 26, 2011

जीवन का ये ही अफसाना

२६-११-२०११
जीवन का ये ही अफसाना |
राग नया है, साज पुराना ||

जीवन की गति परिचित सी है,
पथ सारे जाने-पहचाने,
पंख मिले हैं हम सब को,
पर भूल गए है पर फैलाना |

जीवन का ये ही अफसाना |
राग नया है, साज पुराना ||

रिश्तों के सोते सूखे हैं,
घर-अपने पीछे छूटे हैं ,
पैसे की दीमक ने शुरू किया है,
घर की दीवारों को खाना |

जीवन का ये ही अफसाना |
राग नया है, साज पुराना ||

माँ –बाबूजी अब गाँवों में,
बेटे शहरों के बाशिंदे;
मोबाइल पर ही अब तो
चलता है रिश्तों का निभाना |

जीवन का ये ही अफसाना |
राग नया है, साज पुराना ||

पिज्जा से अब भूख मिटे है
और पेप्सी से प्यास,
शायद बच्चे भूल ना जाये
कैसा होता माँ का खाना |

जीवन का ये ही अफसाना |
राग नया है, साज पुराना ||

फेसबुकी इस दुनिया में अब
मिलना भी आभासी है,
जीने को मुल्तवी करते, करके
‘फुर्सत नहीं है’ का बहाना |

जीवन का ये ही अफसाना |
राग नया है, साज पुराना ||

बुधवार, नवंबर 02, 2011

इटली आया नहीं, फ्रांस गया नहीं-केबीसी के पंच कोटि विजेता सुशील कुमार की स्वर्णिम सफलता

इटली आया नहीं, फ्रांस गया नहीं-केबीसी के पंच कोटि विजेता सुशील कुमार

बिहार के मोतिहारी के रहनेवाले सुशील कुमार ने एक मिसाल पेश की है भारत के संघर्षरत युवाओं के सामने. महात्मा गाँधी की कर्मभूमि चम्पारण से सम्बन्ध रखनेवाले और महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में कम्प्युटर ऑपरेटर की नौकरी करनेवाले यह युवक भारत के युवाओं के लिए एक प्रेरणा बनकर उभरा है.
हालाँकि कहनेवाले यह कह सकते हैं कि यह सफलता लौटरी में मिली सफलताओं जैसी ही है और ऐसे मौके हर किसी को नहीं मिलते. मगर, इस शख्श ने इस सफलता के लिए ११ सालों तक इंतजार किया है और इस मंच तक पहुचने के लिए हर संभव प्रयास उसने किये. अपने परिवार को सहारा देने के लिए स्कूली बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने तक का काम किया. इसलिए उनकी इस सफलता को उनके संघर्ष के आईने में देखते हुए उसे समुचित सम्मान दिए जाने की जरुरत है.
सुशील ने जिस हिसाब से इस खेल को खेला और जितने रिस्क लिए, वो भी काबिल-ए-तारीफ है. १ करोड़ के प्रश्न तक वो बस एक लाइफ लाइन प्रयोग कर पहुचे. उन्होंने अच्छे रिस्क भी लिए और किस्मत भी उनपर मेहरबान रही. कई बार उन्होंने अपने इन्ट्यूशन के सहारे बड़ा रिस्क लेते हुए सवालों के जवाब दिए.
मजेदार सवालों में एक करोड़ का सवाल था कि लाल बहादुर शास्त्री जी ने ललिता जी से अपनी शादी के समय खादी के कुछ कपडें के अलावा दहेज में और क्या लिया. इस सवाल का जवाब सुशील ने एक्सपर्ट राय के आधार पर ‘चरखा” आप्शन लॉक कर कर दिया. शायद इस उदाहरण से दहेज के पीछे भागती हमारी युवा पीढ़ी को कुछ प्रेरणा मिले.
सबसे मजेदार किस्सा तो पांच करोड़ के सवाल का रहा. सवाल था कि १८६८ में निकोबार द्वीप को ब्रिटेन के हाथों बेचने के साथ किस औपनिवेशिक शक्ति का भारत से अंत हो गया. आप्शन थे बेल्जियम, डेनमार्क, इटली और फ्रांस. सुशील का जुमला कि – “इटली आया नही, फ्रांस गया नहीं” श्रोताओं को लोटपोट करता रहा. फोन अ फ्रेंड से भी जब बात ना बनी तो अल्टीमेट रिस्क लेते हुए सुशील ने डबल डिप आप्शन लिया. इस आप्शन में अगर वे दो बार में भी सही जवाब नही दे पाते तो सीधे १ करोड़ से नीचे गिरकर १ लाख ६० हजार पर आ जाते. वाकई, उनके इस रिस्क लेने की हिम्मत को नमन.
अगर सुशील कुमार को केंद्र सरकार मनरेगा के पोस्टर बॉय के तौर पर प्रयोग करे तो यह प्रौढ़ शिक्षा को बढ़ावा देने में और कामगार जनता को अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने की प्रेरणा देने में काफी सहायक सिद्ध हो सकती है. सुशील कुमार की सपनीली सफलता की इस कहानी से ढेर सारे संघर्षशील युवा प्रेरित हो, इसी दुआ के साथ मैं एक बार फिर सुशील जी को तहे दिल से शुभकामनाएँ देता हूँ.
---केशवेंद्र कुमार---

गुरुवार, अक्तूबर 13, 2011

जाना जगजीत का

जगजीत के जाने से गज़लों की दुनिया में जो सूनापन छाया है, उसके लिए यही कह सकते हैं कि जिंदगी की धूप से राहत देनेवाला गज़लों का सबसे घना सायादार वृक्ष आज नही रहा. जगजीत आज जहां चले गए हैं, वहां से चिट्ठी या सन्देश तो नही आने वाला पर उनकी गज़लों के सुर अब भी हम तक पहुचते रहेंगे. जगजीत के होठों ने जिन गज़लों को छुआ, उन्हें अमर कर डाला. उनकी गज़लों ने ना जाने कितने लोगों को प्यार का पहला खत लिखना सिखाया तो कितने लोगों को उनके बचपन की कागज की कश्ती और बारिश के पानी की याद दिला दी. उनकी गज़लों ने लोगों को हंसाते-रुलाते जिंदगी के हर रंग से रूबरू करवाया. उनके जाने पर तो बस इतना ही कह सकते हैं-

"तुम ये कैसे जुदा हो गए
हर तरफ हर जगह हो गए."

मंगलवार, अगस्त 30, 2011

समंदर का गीत

समंदर आज भी वही गीत गाता है
जो उसने पहली बार गाया था
जब वो अस्तित्व में बस आया था |

समंदर की रेत के हर कण
और समंदर का हर जड़ -चेतन
मिलेंगे तुम्हें उसी आदिम गीत में मगन |

फिर इसमें अचरज क्यूँ हो कि
समंदर जब भी लहरों के सुर में गाता है
हर सुनने वाला गीतमुग्ध रह जाता है |

२१-७-२०११

रविवार, अगस्त 07, 2011

जिंदगी से क्या गिला

जिंदगी से क्या गिला |
जो मिला है, सो मिला ||

दुःख से मुरझाया था मन |
आज देखो फिर खिला ||

राजे-महराजे गए |
खंडहर बचा है अब किला ||

उतरा नशा अब जिंदगी का |
आके तू, जरा सा पिला ||

मुर्दों से फिरते हैं लोग यहाँ |
कुछ भी कर, तू उन्हें जिला ||

मैं छोड़ आऊंगा सारा जहां |
तू होगी, ये दिलासा तो दिला ||

प्यार-रिश्तों का जहाँ |
पल भर में गया है ज्यूँ बिला ||


तेरी आँख में आंसू नही |
तेरा ह्रदय है या है शिला ||

ताश के पत्तों की ढेरी है दुनिया ये |
तू जरा सा इसको दे हिला ||

गम ना कर कीचड़ का तू |
बस, कुछ कमल तू दे खिला ||

(१९-०८-२०१०)

रविवार, जुलाई 31, 2011

तीन त्रिवेणियाँ- दूसरी कड़ी

१.

ख्वाब इक खोया हुआ फुटपाथ पर


ख्वाब इक खोया हुआ फुटपाथ पर |
सर्द से कांपा किया था रात भर ||

आँख को क्या, चैन से सोई रही |

०७-५-२०११


२.मौत को जब करीब से देखा



झूठे ख्वाबों से हुई रुसवाई,
जिंदगी इक भरम नजर आई |

मौत को जब करीब से देखा |

०१-५-२०११

३.

फुर्सत नहीं है

वक्त दौड़ता जाता, जिंदगी थमी सी है|
आजकल हर किसी को वक्त की कमी सी है ||

जिससे मिलता हूँ, यही कहता है-फुर्सत नहीं है |
१६-७-२०११

शुक्रवार, जुलाई 29, 2011

तीन त्रिवेणियाँ


तेरी नजरों की छुअन

तुम जिन निगाहों से देखती हो मुझे
यूँ तो मैं लोहा हूँ मगर,
सोना बना देती है मुझे,तेरी नजरों की छुअन.

२२-५-२०१०


२.

इश्क में सीखा है हमने

इश्क में सीखा है हमने फैलना आकाश-सा
सूखी जमीं पे फैलती जाती सी नन्ही घास-सा.

जो समेत डाले खुद में, उस प्यार से दूरी भली.

९-७-२०१०


३.

मजबूरियां

हौसलों को हार, ना स्वीकार है
रौशनी को अंधेरों से कब प्यार है

मगर, सबके साथ हैं कुछ मजबूरियां चस्पां.
२९-३-२०११

शुक्रवार, जुलाई 15, 2011

रिश्ते

रिश्तों की डोर, कहाँ उलझी, कहाँ टूट गयी?
ना की परवा इसकी, तो जिंदगी हमसे रूठ गयी ||

रिश्तों के टूटे हुए धागों से घिरे बैठे हम |
सोचते हैं कि क्या इनकी मजबूती को लूट गयी ||

रिश्तों के जिस घर में सिर्फ दीवारें, दरवाजें नहीं |
जिंदगी ऐसे घर में अपनी झूठ-मूठ गयी ||

रिश्ते शतरंज की बिसात पर खड़े आमने-सामने |
शह और मात के फेर में प्यार की बाजी छूट गयी ||

रिश्ते दिल से निभाना भूली दुनिया, दोष किसे दें ?
ऐसे रिश्तों की गर्मी, हमें बर्फ-सी महसूस गयी ||

रविवार, जून 05, 2011

बादलों के घेरे में

कृष्णा सोबती जी मेरी सबसे प्रिय लेखिकाओं में एक हैं और उनके सारे रचना संसार में “बादलों के घेरे” मेरी सबसे प्रिय कहानी है. इस कहानी में प्यार की जो करुण कथा है, वो पाठकों के मन में मानों धुंध भरी उदासी बन कर बस जाती है. इस कहानी को पढते हुए मन में जो भावनाएँ उमड़ी थी, उन्हें इससे पहले भी इक बार कविता में ढाला था पर वो कहीं गुम गई है. फिर से इस कहानी को हाल में पढते हुए इसे गीत में ढलने की कोशिश की है. यह रचना कृष्णा सोबती जी और उनके लेखन को समर्पित है. प्रयास कैसा रहा, इसे जानने की उत्कंठा रहेगी..

बादलों के घेरे में

दिख गया चेहरा तेरा फिर बादलों के घेरे में |
रौशनी चमकी, हुई गुम, फिर से इन्हीं अंधेरों में ||

घिर रही यादों की घटा मन की पहाड़ी घाटियों में,
और रह-रह कर हैं आंसू छलके पड़ते चेहरे पर,
यादों की है रील फिरती मन के पटल पर बार-बार,
तुम-ही-तुम बस याद आते, ओ मेरे पहले प्यार |

दिख गया चेहरा तेरा फिर बादलों के घेरे में |
रौशनी चमकी, हुई गुम, फिर से इन्हीं अंधेरों में ||

दरस पा कर के तुम्हारा, चाहना जागी थी मन में,
इक सुमधुर हृदय थी, थी मगर अभिशप्त तन में;
एक डोर खींचती थी, एक जकडन रोकती थी,
और यूँ आयी उतर थी मन्नो मेरे जीवन में |

दिख गया चेहरा तेरा फिर बादलों के घेरे में |
रौशनी चमकी, हुई गुम, फिर से इन्हीं अंधेरों में ||

इक डोर से खिंचता चला आया था मैं पास तेरे,
क्लांत तुम लेती थी और बैठा था मैं साथ तेरे;
हाथ तुमने बढाकर मेरी ओर, फिर खींचा था वापस,
मैं अभागा, कायरमन , छू पाता जो काश हाथ तेरे |

दिख गया चेहरा तेरा फिर बादलों के घेरे में |
रौशनी चमकी, हुई गुम, फिर से इन्हीं अंधेरों में ||

आज हूँ क्षयग्रस्त मैं भी, सोचता उस रात को,
एक पल में घटनेवाली, छोटी सी बड़ी बात को;
कितनी विवश, कितनी करुण, कातर थी कितनी वो घड़ी,
मन की चाह पे मन का भय, जीता था उस रात को |

दिख गया चेहरा तेरा फिर बादलों के घेरे में |
रौशनी चमकी, हुई गुम, फिर से इन्हीं अंधेरों में ||

वापसी अनमनी थी, फिर-फिर मुड़े थे पाँव मेरे,
चाह ने पाई विजय थी, विकल थे मन-प्राण मेरे,
आ गया था पास तेरे, और मिलन अपना हुआ था,
और फिर, मैं रौशनी में आ गया, छोड़ कर तुमको अँधेरे|


दिख गया चेहरा तेरा फिर बादलों के घेरे में |
रौशनी चमकी, हुई गुम, फिर से इन्हीं अंधेरों में ||

बादलों को देखते ही घिरती है यादों की घटा,
झील की पगडंडियों के आस-पास वो घूमना,
विवश-सी तुमने था टेका मत्था भाग्य के सामने,
मैंने चाहा था घेरना, पर तुमने था किया मना |

दिख गया चेहरा तेरा फिर बादलों के घेरे में |
रौशनी चमकी, हुई गुम, फिर से इन्हीं अंधेरों में ||

एक महीने रहा घूमता नैनी-भुवाली बार-बार,
विदा लेनी तय थी लेकिन मन ना होता था तैयार;
सिसकियाँ सुनते हुए पग मुड़ें ना, चलते रहे,
नियति के हाथों गया था प्यार मेरा हाय हार !

दिख गया चेहरा तेरा फिर बादलों के घेरे में |
रौशनी चमकी, हुई गुम, फिर से इन्हीं अंधेरों में ||

फिर हुई शादी, भुला बैठा मैं दुनिया वो पुरानी,
सुख भरा था वर्तमान, अतीत था बस इक कहानी;
फिर बुआ से जाना, मन्नो का सदा को चला जाना,
अपने हाथों से बुनी जर्सी, रख गयी थी वो निशानी.

दिख गया चेहरा तेरा फिर बादलों के घेरे में |
रौशनी चमकी, हुई गुम, फिर से इन्हीं अंधेरों में ||

लौट कर आया, मगर मन्नो नहीं फिर मन से उतरी,
साल भर बीमार रह कर पहुंचा मैं फिर से भुवाली,
वही कॉटेज, वही सब कुछ, पर वहां मन्नो नहीं थी,
यादों में मीरा नहीं, मन्नो ही हर पल संग में थी |

दिख गया चेहरा तेरा फिर बादलों के घेरे में |
रौशनी चमकी, हुई गुम, फिर से इन्हीं अंधेरों में ||

यहाँ तन्हाई में अपनी जब मन बहुत बैचैन होता,
याद आ जाता वो मन्नो का विवश, घुट-घुट के रोना,
अपनी कायरता को रोता, उसकी लाचारी को रोता,
देखता बादल में उसको, जागी आँखों से मैं सोता |

बादलों के इन्हीं घेरों में मैं इक दिन जा समाऊंगा |
मन्नो को शायद कहीं इन बादलों में ही पाउँगा ||

रविवार, मई 15, 2011

ख्वाब इक खोया हुआ फुटपाथ पर

ख्वाब इक खोया हुआ फुटपाथ पर |
सर्द से कांपा किया था रात भर ||

आँख को क्या, महलों में सोई रही |
ख्वाब तड़पा, आँख को, रात भर ||

आँख भर आयी बेचारे ख्वाब की |
मिल गई इस सच से जो उसकी नजर ||

ख्वाब जाड़ें में ठिठुर कर भी ना मरा |
गर्मियों में, छाँव ढूंढ छुपाया सर ||

आंसुओं से भी भीगा ना था, इतना वो |
बारिशों में ख्वाब भीगा इस कदर ||

ख्वाब अब फुटपाथों का बाशिंदा है |
देख महलों को फेर लेता है नजर ||

ख्वाब का ये हाल सब कोई देखते हैं |
और चल देते हैं आँखों में आंसू भर ||

ख्वाब अब भी है भटकता रात- दिन |
ढूंढता अपने लिए आँखों का घर ||

ख्वाब से आँख की दूरी अब है बहुत |
नींद आँखों में आती नहीं रात भर ||


०७/०५/११

मंगलवार, मई 10, 2011

अँधेरे में इक दिया जलाता हूँ

अँधेरे में इक दिया जलाता हूँ |
मैं रौशनी के लिए खुद को मिटाता हूँ ||

जहां सारी उम्मीदें हताश हो आयी |
वहां मैं, दुआ बन के काम आता हूँ ||

ग़मों से मुरझाई हुई इस दुनिया में |
खुशी की कोई खबर लाता हूँ ||

सूख पतझड़ से गया हो जो चमन |
वहां मैं बन के बहार छाता हूँ ||

चंद आँखों में नींद क्या सपने न बचे |
वक्त बदलेगा, उन्हें ढाढस दिलाता हूँ ||

रोज फुटपाथ पर गुमशुदा ख्वाब मिलते हैं |
मैं खोये ख्वाबों को आँखों से मिलाता हूँ ||

बच्चों-जैसे चाँद मांग बैठती है ये दुनिया |
इसे मैं रंग-बिरंगे भुलावों से बहलाता हूँ ||

Saturday, May 07, 2011

गुरुवार, अप्रैल 28, 2011

एक चिड़िया को फिर से मिला आशियाना

एक चिड़िया को फिर से मिला आशियाना |


एक चिड़िया जो टूट कर भी टूटी न थी
चिड़ा छोड़ चला उसे, फिर भी आस टूटी ना थी
जग से रूठ कर भी खुद से वो अभी रूठी ना थी
उसके सपनों ने फिर से सीखा चहचहाना |

एक चिड़िया को फिर से मिला आशियाना |


नन्ही चिड़िया ने सहे कितने जुल्मो-सितम
जीती रही खूंखार दुनिया में वो सहम-सहम
और उसपे, कि दुनिया ने नहीं किया कोई रहम
चिडियाँ जीती रही भूल कर के पंख फैलाना |


एक चिड़िया को फिर से मिला आशियाना


चिडियाँ जीती रही बरगद की कोटर तले
साँझ ढलती रही, आस का दीपक नही ढले
उसे अब भी था यकीं चिड़ा आएगा मगर
दुनिया ने छीना उससे उम्मीदों का ताना-बाना |


एक चिड़िया को फिर से मिला आशियाना |


कितना रोई चिड़ी जब हुआ, उसका चिड़ा पराया
रोती रही वो पर, आँखों से आंसू तक ना आया
चिड़िया बुत बनी, वो बन गयी अपनी ही छाया
दुनिया के कायदों ने छीना उसका मुस्कुराना |


एक चिड़िया को फिर से मिला आशियाना


चिड़िया घुटती रही, खुद में सिमटती रही
अपने पंखों को फ़ैलाने से बचती रही
थोड़ी-थोड़ी जिंदादिली उसकी रोज मरती रही
बरगद रो देता था सुन के उसका दर्द भरा गाना |


एक चिड़िया को फिर से मिला आशियाना


फिर से आया एक चिड़ा, चिड़ी उसको भा गई
अपनी धवल उदासी से उसका मन चुरा गई
पर चिड़ा परेशान, कैसे जीते उसका दिल
उसके इर्द-गिर्द शुरू किया उसने मंडराना |


एक चिड़िया को फिर से मिला आशियाना


चिड़िया प्रेममयी थी, पुकार अनसुनी न की
चिड़े को प्रेम में अपने, ना देख सकी वो दुखी
उसके प्रेम की परीक्षा उसने थोड़ी सी ली
कहा चिड़े को लेकर के आओ आबो-दाना |


एक चिड़िया को फिर से मिला आशियाना


चिड़ा था अनाड़ी, फिर भी था जोश से भरा
सुबह से शाम तक वो कड़ी मेहनत में जुटा
ना परवा धूप-बारिश की ना बिजली से डरा
उसकी लगन देख चिड़िया ने किया न कोई बहाना.


एक चिड़िया को फिर से मिला आशियाना


अपनी दुनिया में चिड़ा-चिड़ी खुशी से मगन
पंख अपने पसारे उड़ते फिरे गगन-गगन
कहते मानों हम से, प्रेम है एक अनवरत लगन
प्रेम सफर में लगा रहता है मिलना-खो जाना


एक चिड़िया को फिर से मिला आशियाना |

२७/०४/११ १९:५७:०४

मंगलवार, अप्रैल 26, 2011

शासन से अपना गिला भी क्या

शासन से अपना गिला भी क्या ?
व्यवस्था से हमें मिला भी क्या ?

भूख हमेशा आयी हमारे ही हिस्से ,
बदहाली का ऐसा सिलसिला भी क्या ?

भूख से एक बच्चे ने दम तोड़ दिया ,
सुनके फाइल तो दूर, पत्ता तक हिला भी क्या ?

कितने बगीचों को तुमने तबाह किया ,
मगर एक फूल तुमसे आजतक खिला भी क्या?

तुमको वोट दिया, तुमने चोट दी बदले में |
ये बताओ, बेमुरव्वती का ऐसा सिला भी क्या?

बेबसों की आह को कैद करके रख सके,
कहो मियां, है ऐसा कोई किला भी क्या?

एक जिन्दा है, एक है पत्थर मगर,
ठोकरें नियति है, नारी क्या शिला भी क्या?

मुद्दतें हो गयी हैं हमको तौबा किये,
आज दिल है, साकी सोच मत, पिला भी क्या.

शनिवार, अप्रैल 16, 2011

ईमान मर नहीं सकता

भ्रष्टाचार के खिलाफ अन्ना हजारे जी के वर्तमान संघर्ष और उसमें लोगों की सहभागिता देख बड़ा ही सुकून भरा अनुभव हुआ. वास्तव में, हमारे देश में बेलगाम होते हुए भ्रष्टाचार को अगर नहीं रोका गया, तो फिर इस महान देश की महानता अतीत की याद भर बन कर रह जायेगी. आज से ७ साल पहले बिहार मे स्वर्णिम चतुर्भुज योजना मे हो रहे व्यापक भ्रष्टाचार को उजागर करनेवाले ईमानदार इंजिनियर श्री सत्यदेव दुबे को उनकी ईमानदारी की कीमत अपनी जान से चुकानी पड़ी थी. उस प्रसंग मे एक कविता लिखी थी – ‘ईमान मर नहीं सकता’. यह कविता सत्येन्द्र डूबे तथा ईमान की हर उस आवाज को समर्पित है जिसने टूट जाना मंजूर किया पर बेईमानी के आगे झुकना नहीं.
उस कविता को एक बार फिर आप लोगों के समक्ष पेश कर रहा हूँ.

ईमान मर नहीं सकता

आज के इस भयानक दौर में,
जहाँ ईमान की हर जुबान पर
खामोशी का ताला जडा है और
चाभी एक दुनाली में भरी
सामने धरी है ;

फ़िर भी मैं कायर न बनूँगा,
अपनी आत्मा की निगाह में.
फ़िर भी मैं, रत्ती भर न हिचकूंगा
चलने में ईमान की इस राह पे।

मैं अपनी जुबान खोलूँगा
मैं भेद सारे खोलूँगा-
(बेईमानों- भ्रष्टाचारियों की
काली करतूतों के)
मैं चीख-चीख कर दुनिया भर में बोलूँगा-
ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है।

मैं जानता हूँ कि परिणाम क्या होगा-
मेरी जुबान पर पड़ा खामोशी का ताला
बदल जाएगा फांसी के फंदे में
और फंदा कसता जायेगा-
भिंच जायेंगे जबड़े और मुट्ठियाँ
आँखें निष्फल क्रोध से उबलती
बाहर आ जाएँगी
प्राण फसेंगे, लोग हसेंगे
पर संकल्प और कसेंगे.

देह मर जायेगा मगर
आत्मा चीखेगी, अनवरत, अविराम-
''ईमान झुक नहीं सकता,
ईमान मर नही सकता,
चाहे हालत जो भी हो जाये,
ईमान मर नहीं सकता,
ईमान मर नहीं सकता.”
-2004 -

शुक्रवार, अप्रैल 15, 2011

खुद से जो हूँ आजकल मैं भागता-सा फिर रहा

खुद से जो हूँ आजकल मैं भागता-सा फिर रहा |
है क्या वजह, क्या दे रहा हूँ खुद को मैं कोई सजा ||

शुतुरमुर्गी चाल है क्या खूब मैंने सीख ली |
देख कर उलझनों को सर रेत में छुपा लिया ||

मुकद्दर और रेत की ये खूबी क्या ही खूब है |
खुली मुट्ठी में टिकी, जो जकड़े उसने खो दिया ||

आँखें दुनिया से बंद कर मैं खुद में ही सिमटा रहा |
औरों को परवा नहीं, पर, मैं ना ऐसे में मैं रहा ||

खुद से खुद को ये नसीहत देना अब है लाजमी |
पीठ है अब तक दिखाई, अब दिखा, सीना तना |

मंगलवार, मार्च 15, 2011

सर पे माँ की दुआओं का छाता रहा

जिंदगी उलझती रही, मैं उसे सुलझाता रहा |
खुदा ने इश्क की दौलत थी बख्शी, लुटाता रहा ||

रोटी, कपडा, सर पे छत, नाकाफी थे इंसान को |
होश सँभालने से मरने तक वो बस, दौलत जुटाता रहा ||

खुशी के मोती छोड़, दौलत के कंकड़ चुनता रहा इंसान |
खुदा ऊपर से ये नादानी देख मुस्कुराता रहा ||

सफर में रहे हमसफ़र बन के सुख ओर दुःख |
एक आता रहा, एक जाता रहा ||

बददुआओं की तेजाबी बारिशें, कई बार बरसी |
शुक्र है, सर पे माँ की दुआओं का छाता रहा ||

सोमवार, मार्च 14, 2011

धर्म के नाम पर अनगिन हैं मरे लोग

साथियों, इधर हाल में धार्मिक हादसों में मरने वाले लोगों कि संख्या काफी बढ़ी है..धार्मिक उत्सवों में जुटी भारी भीड़ को आजकल ये पता नही होता कि कब किसको मोक्ष मिलने का नम्बर आ जाये. कभी मंदिर, कभी मस्जिद, कभी चर्च..उपरवाला भी हादसों की इस बढती तादात को देख चिंताकुल होगा, ऐसा मुझे लगता है. हाल में शबरीमला में मकरज्योति देखने को जुटी भीड़ ओर वहां भगदड़ में मरे सैकड़ों लोगों को देख एक गज़ल १५ जनवरी को लिखी थी..आज संयोग से मिली तो सोचा कि आप लोगों के सामने पेश कर दूँ. इस गज़ल में खुदा शब्द उपरवाले का प्रतीक है..उसे खुदा कहे, ईश्वर कहे या फिर God के नाम से पुकारे, इस गज़ल की फरयाद हर किसी से है

खुदा के खौफ से हरदम हैं डरे लोग |
धर्म के नाम पर अनगिन हैं मरे लोग ||

जिंदगी इंसान की, कितनी सस्ती हो गई |
कीड़े-मकोडों की जानिब हैं मरे लोग ||

खुदा के राज में भी अब जरा बदहाली है |
फिर भी खुदा से खैर की दुआ हैं करे लोग ||

बिना डुलाये हाथ-पाँव, खुदा कुछ नहीं देता |
फिर भी खुदा से भीख मांगते हैं फिरे लोग ||

खुदा भी दिन में दिया लेके ढूंढता है फिरे |
कितने दुर्लभ हैं हो गए, दुनिया में खरे लोग ||

कभी खुद से, कभी खुदा, कभी दुनिया से हैं गुस्सा |
पर करते हैं कुछ भी नहीं, आँखों में आंसू भरे लोग ||

रविवार, मार्च 13, 2011

जिंदगी भूलभुलैया तो है जरुर मगर

बाहर की गर्मी गिला देती है |
भीतर की गर्मी जिला देती है ||

इश्क के जाम की, मुझको नहीं तमन्ना है|
साकी अनजान है, आकर के पिला देती है||

जब कभी दिल की कली मुरझाती है|
प्रेम की बारिश, उसे फिरसे खिला देती है||

मैं तो करता हूँ उससे इश्क बेइंतहा|
फिर वो क्यूँ बेमुरव्वती का सिला देती है ||

जब कभी जिंदगी मुरझाती है |
उसकी मुस्कान जिला देती है ||

गैरों की सैकड़ों ठोकरों की परवा नहीं |
अपनों की एक ठोकर भी हिला देती है ||

जिंदगी भूलभुलैया तो है जरुर मगर |
भूले-बिछुड़ों को किसी मोड़ मिला देती है ||

(१३ अप्रैल २००४ को लिखित )

गुरुवार, फ़रवरी 24, 2011

जरा पतझड़ में डरा होता हूँ

सूख जाता हूँ, हरा होता हूँ !
जरा पतझड़ में डरा होता हूँ !!

जब तलक कोपलें नयी नहीं आ जाती हैं !
तन से जिन्दा, मगर, मन से मरा होता हूँ !!

दौड़ती-नाचती फिरती हुई दुनिया के बीच !
मैं अपनी जगह पर ही ठहरा होता हूँ !!

बीते कल में चिड़ियों की चीं-चीं सुख देती थी !
आजकल मोटरों की पीं-पीं से बहरा होता हूँ !!

दाना चुगने को जाती है चिड़िया तो दुआ करता हूँ !
और फिर उसके लौटने तक, बैचैन मैं जरा होता हूँ !!

चिलचिलाती धूप में मेरी छाँव सुकून देती है !
मैं झुलसाती धूप में हरियाली का आसरा होता हूँ !!

एक दिन मुझे भी ले डूबेगा लोभ इन्सां का!
पेड़ों पे कुल्हाड़ियाँ चलती देख, मैं अधमरा होता हूँ!!

किसी को छाँव, घर किसी को, किसी को लकड़ी !
खुश हूँ कि, मैं कितनों का सहारा होता हूँ !!

जड़ें तलाशती फिरती हैं पानी पथरायी मिट्टी में !
धरती के सीने से चिपक, मैं और गहरा होता हूँ !!

लाख पतझड़ करे कोशिश मुझे सुखाने की !
बसंत आते ही मैं, मुसकरा के हरा होता हूँ !!

बुधवार, फ़रवरी 23, 2011

अब तलक इश्क पे उम्मीद मेरी कायम है

हुस्न हरदम मिला पराया है मगर !
इश्क का अपने सर पे साया है मगर !!

तुम नही आते हो ख्वाबों तक में !
आंसू तेरी याद में आया है मगर !!

अब तलक इश्क पे उम्मीद मेरी कायम है !
इश्क की राह में धोखा बहुत खाया है मगर !!

इश्क की खातिर उठाया दुनिया का हर सलीब !
इश्क में खुद टूटे, इश्क को टूटने से बचाया है मगर !!

लो, आखिर इश्क की मंजिल पे आ ही पहुंचे हम !
इश्क की राहों में कदम कई बार लडखडाया है मगर !!

यार को देख कर चेहरे पे खिल उठी मुस्कान !
इस ख़ुशी की खातिर दिल दर्द से नहाया है मगर !!

मंगलवार, फ़रवरी 15, 2011

नशा शराब का ज्यादा है या कि साकी का

नशा शराब का ज्यादा है या कि साकी का !
छुपी कशिश का असर ज्यादा या बेबाकी का !!

बहुत सी ठोकरें खायी, मगर अभी तक भी !
दिल-ए-नादाँ ने सीखा सबक ना चालाकी का !!

पूस की रात कितनी आयी-गयी मगर हल्कू !
समझ ना पाया अब तक हिसाब बाकी का !!

देवता और शैतान दोनों का ही ये पहनावा है !
समझ में आता नहीं कैरक्टर यारों खाकी का !!

समय के साथ दिल की दुनिया बदल गयी कितनी !
गया बचपन के साथ शौक ताजिये की झांकी का !!

अपनी ऐय्याशियों के बीच जरा देखो इधर !
कितने लोगों के लिए जिन्दगी मायने है फाकी का !!

बुधवार, फ़रवरी 02, 2011

तू मेरा आईना है, मैं तेरी परछाईं हूँ

तू मेरा आईना है, मैं तेरी परछाईं हूँ /
तू कभी मुझमें, कभी तुझमें मैं समाई हूँ //

तू मेरे दिल के कितने पास-पास रहता है /
तुझसे ये पूछने बड़ी दूर से मैं आई हूँ //

न छोड़ने कि कसमें खा के जिसको पकड़ा था /
वही मैं यार कि छूटी हुई कलाई हूँ //

उसे खबर न हुई जिसके लिए फफ़क के बही /
यारों, मैं इस जहाँ कि सबसे बेबस रुलाई हूँ //

खुशियों के लिबास से आंसूओं के तन,दर्द के बदन को ढके /
मैं किसी गुमनाम शायर की सबसे करुण रुबाई हूँ //