मंगलवार, मार्च 15, 2011

सर पे माँ की दुआओं का छाता रहा

जिंदगी उलझती रही, मैं उसे सुलझाता रहा |
खुदा ने इश्क की दौलत थी बख्शी, लुटाता रहा ||

रोटी, कपडा, सर पे छत, नाकाफी थे इंसान को |
होश सँभालने से मरने तक वो बस, दौलत जुटाता रहा ||

खुशी के मोती छोड़, दौलत के कंकड़ चुनता रहा इंसान |
खुदा ऊपर से ये नादानी देख मुस्कुराता रहा ||

सफर में रहे हमसफ़र बन के सुख ओर दुःख |
एक आता रहा, एक जाता रहा ||

बददुआओं की तेजाबी बारिशें, कई बार बरसी |
शुक्र है, सर पे माँ की दुआओं का छाता रहा ||

2 टिप्‍पणियां:

वीना ने कहा…

बददुआओं की तेजाबी बारिशें, कई बार बरसी |
शुक्र है, सर पे माँ की दुआओं का छाता रहा ||

पहली बार हूं आपके ब्लॉग पर लेकिन मन पढ़कर खुश हो गया...हर शेर लाजवाब...
फॉलो भी कर रही हूं ताकि रचनाएं मिलती रहें पढ़ने को...
आप भी आइए....

Cinemanthan ने कहा…

बददुआओं की तेजाबी बारिशें, कई बार बरसी |
शुक्र है, सर पे माँ की दुआओं का छाता रहा

बहुत खूब केश्वेन्द्र जी