रविवार, मई 15, 2011

ख्वाब इक खोया हुआ फुटपाथ पर

ख्वाब इक खोया हुआ फुटपाथ पर |
सर्द से कांपा किया था रात भर ||

आँख को क्या, महलों में सोई रही |
ख्वाब तड़पा, आँख को, रात भर ||

आँख भर आयी बेचारे ख्वाब की |
मिल गई इस सच से जो उसकी नजर ||

ख्वाब जाड़ें में ठिठुर कर भी ना मरा |
गर्मियों में, छाँव ढूंढ छुपाया सर ||

आंसुओं से भी भीगा ना था, इतना वो |
बारिशों में ख्वाब भीगा इस कदर ||

ख्वाब अब फुटपाथों का बाशिंदा है |
देख महलों को फेर लेता है नजर ||

ख्वाब का ये हाल सब कोई देखते हैं |
और चल देते हैं आँखों में आंसू भर ||

ख्वाब अब भी है भटकता रात- दिन |
ढूंढता अपने लिए आँखों का घर ||

ख्वाब से आँख की दूरी अब है बहुत |
नींद आँखों में आती नहीं रात भर ||


०७/०५/११

मंगलवार, मई 10, 2011

अँधेरे में इक दिया जलाता हूँ

अँधेरे में इक दिया जलाता हूँ |
मैं रौशनी के लिए खुद को मिटाता हूँ ||

जहां सारी उम्मीदें हताश हो आयी |
वहां मैं, दुआ बन के काम आता हूँ ||

ग़मों से मुरझाई हुई इस दुनिया में |
खुशी की कोई खबर लाता हूँ ||

सूख पतझड़ से गया हो जो चमन |
वहां मैं बन के बहार छाता हूँ ||

चंद आँखों में नींद क्या सपने न बचे |
वक्त बदलेगा, उन्हें ढाढस दिलाता हूँ ||

रोज फुटपाथ पर गुमशुदा ख्वाब मिलते हैं |
मैं खोये ख्वाबों को आँखों से मिलाता हूँ ||

बच्चों-जैसे चाँद मांग बैठती है ये दुनिया |
इसे मैं रंग-बिरंगे भुलावों से बहलाता हूँ ||

Saturday, May 07, 2011