मंगलवार, मई 10, 2011

अँधेरे में इक दिया जलाता हूँ

अँधेरे में इक दिया जलाता हूँ |
मैं रौशनी के लिए खुद को मिटाता हूँ ||

जहां सारी उम्मीदें हताश हो आयी |
वहां मैं, दुआ बन के काम आता हूँ ||

ग़मों से मुरझाई हुई इस दुनिया में |
खुशी की कोई खबर लाता हूँ ||

सूख पतझड़ से गया हो जो चमन |
वहां मैं बन के बहार छाता हूँ ||

चंद आँखों में नींद क्या सपने न बचे |
वक्त बदलेगा, उन्हें ढाढस दिलाता हूँ ||

रोज फुटपाथ पर गुमशुदा ख्वाब मिलते हैं |
मैं खोये ख्वाबों को आँखों से मिलाता हूँ ||

बच्चों-जैसे चाँद मांग बैठती है ये दुनिया |
इसे मैं रंग-बिरंगे भुलावों से बहलाता हूँ ||

Saturday, May 07, 2011

6 टिप्‍पणियां:

Kailash C Sharma ने कहा…

चंद आँखों में नींद क्या सपने न बचे |
वक्त बदलेगा, उन्हें ढाढस दिलाता हूँ ||

बहुत सार्थक सोच..सुन्दर भावपूर्ण रचना..

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

रोज फुटपाथ पर गुमशुदा ख्वाब मिलते हैं |
मैं खोये ख्वाबों को आँखों से मिलाता हूँ ||

बहुत खूब ...अच्छी गज़ल

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 17 - 05 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

http://charchamanch.blogspot.com/

M VERMA ने कहा…

बेहतरीन गज़ल

दिगम्बर नासवा ने कहा…

सूख पतझड़ से गया हो जो चमन
वहां मैं बन के बहार छाता हूँ ....

बहुत खूब शेर हैं इस ग़ज़ल के .... लाजवाब ...

सुरेन्द्र सिंह " झंझट " ने कहा…

har sher behtareen...
sundar kriti.