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कितनी भाषाओँ से कितनी बार

कितनी भाषाओँ से कितनी बार गुजरते हुए मैंने जाना है की हर भाषा संजोये होती है एक अलग इतिहास, संस्कृति और सभ्यता की हर भाषा में उसके बोलने वालों की हर ख़ुशी और गम का सारा हिसाब-किताब मौजूद होता है. हर वो भाषा जो और भाषाओँ को मानती है बहन और नही रखती उनकी प्रगति से कोई डाह-द्वेष उनको आकर छलती है कोई साम्राज्यवादी भाषा कहती है की अब इस भाषा में नए समय को व्यक्त नही कर सकते, पर चिंता क्यूँ है, मैं हूँ ना! और धीरे-धीरे इक भाषा दूसरी भाषा को अपनी गुलामी करने को मजबूर करती है उनको छोड़ देती है उन लोगों के लिए जिनके मुख से अपना बोला जाना उसे नागवार है आखिर मजदूरों, भिखारियों, आदिवासियों, बेघरों, वेश्याओं, यतीमों, अनपढों या एक शब्द में कहे तो हाशिये पर जीने वालों के लिए भी तो कोई भाषा होनी चाहिए ना? कितनी भाषाओँ से कितनी बार गुजरते हुए महसूसा है मैंने कितनी ममता होती है हर एक भाषा में कितनी आतुर स्नेहकुलता से अपनाती है वो हर उस बच्चे को जो उसकी गोदी में आ पहुंचा है बाहें पसारे, बच्चा- जिसे अभी तक तुतलाना तक नही आता नयी भाषा में. कितनी भाषाओँ से कितनी बार गुजरते हुए म...