गुरुवार, मई 27, 2010

तुम्हे देख के ऐसा लगता है

तुम्हे देख के ऐसा लगता है





इक आंसू की बूँद जो छलकी नही


नयनों तक आई प लुढकी नही


जीती भी रही मरती भी रही


फिर आँखों-ही-आँखों में सूख चली.




तुम्हे देख के ऐसा लगता है




गंगा के जैसी दिखती हो तुम


पावन सबको करती आई


पर तुमको सबने मैला किया


तुम रह गयी अपनी परछाईं.




तुम्हे देख के ऐसा लगता है




जैसे  राधा खड़ी हो यमुना तट


रोती भी नही, हंसती भी नही


सुध-बुध बिसरा कर तन-मन की


निर्मोही की बाट अगोरे है.




तुम्हे देख के ऐसा लगता है




जैसे बादल का इक छोटा टुकड़ा


आकाश के कोने में तन्हा


छुप-छुप के रोया करता है


हर ग़म को छुपाये फिरता है.




तुम्हे देख के ऐसा लगता है




जैसे कोई बिन माँ का बच्चा


हँसना भी भूला, रोना भी


उसे भूख-प्यास का भी पता नही


आकाश निहारा करता है.




तुम्हे देख के ऐसा लगता है




जैसे कोई कली मुरझाई-सी


खिलने से पहले लील गई जिसको


इस जग़ की निठुराई


कोमलता का करुणांत हुआ.




तुम्हे देख के ऐसा लगता है




जैसे इक अभिमन्यु हो रण में


आशा सारी नैराश्य भरी


फिर भी रथ-चक्र उठाता है


लड़ता जाता अंतिम पल तक.




तुम्हे देख के ऐसा लगता है




जैसे कोई दिया अंधियारों में


कोई साथी नही कोई संगी नही ,


तूफ़ान के झोंके हैं चहुदिश,


फिर भी मुस्काकर जलता है






तुम्हे देख के ऐसा लगता है.



मंगलवार, मई 11, 2010

तुममे देखा, हम ही हम है

हंसी ओंठ पर आँखें नम है!


हंसकर रोने का मौसम है!!



सारी यादों को पछाड़ कर!

सबसे ऊपर तेरा ग़म है!!



खुदा सुखी है इस दुनिया से!

दुखी बचे तो केवल हम है!!



ताल ठोककर खड़े है हम भी!

देखे दुनिया में कितना दम है!!



इश्क के पागलपन का ये आलम!

तुममे देखा, हम ही हम है!!

हंसी होंठ पर आँखें नम है

कैफ़ी आज़मी का एक मार्मिक शेर याद आ रहा है-
"आज सोचा तो आंसू भर आये
  मुद्दतों   हो गयी मुस्कराएँ."

सचमुच, जीवन की आपाधापी ने आदमी के होंठों से हंसी छीन ली है. हंसी- जो जिन्दगी की सबसे मूल्यवान नेमत है, आज दुर्लभतम हो गयी है. स्वच्छ धवल मुस्कान, कहकहे, मुक्त अट्टहास  शायद ही कहीं दिखते हैं. बड़ों की दुनिया इतनी क्रूर, इतनी जालिम, इतनी बेरहम हो गयी है कि प्रकृति ने उससे हंसी छीन ली है.  हंसी  बची है अगर कहीं  तो मासूम बच्चों के पास बची है. बड़ों कि दुनिया में तो हंसी भी बाजार का उत्पाद बन गयी है. मुस्कराने के लिए भी अब विशेष ब्रांड के टूथपेस्ट , ब्रश  , क्रीम  और मोउथ  -फ्रेशनरों कि जरुरत है. हंसी हास्य  क्लबों के यहाँ मानों गिरवी रख दी गयी है.

आधुनिक युग का मानव हँसे भी तो कैसे हँसे ? आज की इस तेज रफ़्तार दुनिया में उसके पास जीने की  भी फुर्सत नही रह  गयी है शायद! आदमी आदमी ना रहकर मशीन होता जा रहा है, संवेदन शून्य रोबोट  होता जा रहा है.  हंस सकता है वो जो अपनी शर्तों पर एक भरी-पूरी जिन्दगी जीता हो, जो औरों  के दुःख-दर्द मिटाने का प्रयास करता हो, जो जिन्दादिली से जिन्दगी कि हर परिस्थिति का सामना करता हो और दुर्भाग्यवश ऐसे लोग दुनिया से बड़ी तेजी से विलुप्त होते जा रहे हैं.

हंसी बड़ी संक्रामक होती है. आपके आस-पास परिवार, समाज और देश-दुनिया में यदि हंसी-ख़ुशी का माहौल होगा तो जाहिरन  आपके होठों पर भी हंसी होगी. मगर कैसे हंस सकता है कोई जब वह दुखों कि आग में घिरा हो, बेरोजगारी के दंश से अन्दर-ही-अन्दर घुटता हो, व्यस्था और समाज की जड़ता और रूढ़िवादिता को देख कर छटपटाता हो? कैसे हंस सकता है कोई जब किसान-मजदुर भूख और गरीबी के कारण आत्महत्या कर रहे हों, जब गोधरा और गुजरात जैसी घटनाएँ होती हो, जब नक्सली और आतंकवादी हिंसा में निर्दोष लोगों कीड़ों-मकोड़ों कि तरह मरते हों, जब ईमानदार आवाजों को शैतानी हाथ हमेशा  के लिए खामोश कर देते हों, जब अफगानिस्तान, इराक और पाकिस्तान में सैकड़ों-हजारों निर्दोष लोग रोज मरे जाते हों, जब भूख के मारे दुनिया के कोने-कोने के बच्चे रोते हो,, जब हंसती-खेलती गुडिया सी बच्चियों की इज्ज़त  लूटी  जाती हो, मानवता जब ज़ार-ज़ार रो रही हो, तब मानव के होठों पर हंसी आ भी सकती है कैसे भला? कबीर याद आते हैं ऐसे में-

"सुखिया सब संसार है, खावै और सोवै
 दुखिया दस कबीर है, जागे और रोवै.

आजकल के ज़माने में समाज-देश-दुनिया की दुर्दशा से द्रवित हो कर रोनेवाले लोग बहुत ही कम रह  गए हैं. बाकी दुनिया खुशहाल होने का दिखावा करती है मगर उसके द्वारा ओढ़ी हर मुस्कराहट एक मुखौटा, इक छलावा है. उसकी हंसी बड़ी खोखली है क्योंकि वह सिर्फ बाह्य  अभिव्यक्ति है, आन्तरिक नही. वर्तमान दुनिया में आदमी के हर्ष-विषाद  की मात्रा भी बाजार निर्धारित कर रहा है. बाजारू सभ्यता का बोझ कंधे पर पड़ते ही बच्चे अपनी कुदरती मुस्कान भूल जाते हैं और सीखते हैं एक औपचारिक मुखमुद्रा बनाना जिसे हंसी कहना हंसी का अपमान है. ओढ़ी हुई मुस्कराहट हमें अन्दर से और उदास कर जाती है.

एक सच्चा और ईमानदार इन्सान उस भ्रष्ट व्यवस्था में कैसे मुस्करा सकता है जहाँ जनता भूखों मरती हो, हताश निराश हो और नौकरशाह तथा नेतागण  भोग-विलास में तल्लीन हों? रघुवीर सहाय ने अपनी कविता 'हंसो, हंसो, जल्दी हंसो' में ऐसी ही स्थिति पर लिखा था-

'हंसो, पर अपने पर ना हँसना क्योंकि उसकी कड़वाहट
पकड़ ली जाएगी और तुम मारे जाओगे

बेहतर है की जब कोई बात करो तब हंसों
ताकि किसी बात का कोई मतलब ना रहे
और ऐसे मौकों पर हंसो जो की अनिवार्य हों
जैसे गरीब पर किसी ताकतवर की मार
जहाँ कोई कुछ नही कर सकता उस गरीब के सिवाय
और वह भी अक्सर हँसता है."

खैर, दुनिया में ढेरों ग़म है, खुशियों के मौके कम हैं. पल-दो-पल जो मिले हमको, उसमें तो हम मुस्कुरा ले, कुछ हंस ले कुछ हंसा ले.   हमें फिर से प्रकृति के सान्निध्य में जाकर हँसना सीखना  होगा, बच्चों से थोड़ी-सी मुस्कुराहटें उधार लेनी होंगी, पूरी दुनिया में प्रेम-स्नेह-भाईचारे की लौ जलानी होगी, हर आँख के आंसू पोंछने  होंगे, हर होंठ पर हंसी लाने का प्रयास करना  होगा और देखते-देखते हमारी खुद की जिन्दगी खुशियों से भर उठेगी . आओ, साथियों, ग़म के कालकूट को पी हम बाकी  दुनिया को खुशियों का अमृतकलश सौंपे. पूरी दुनिया खिलखिलाएगी, ठहाके लगाएगी, मंद-मंद मुस्काएगी और उस मुस्कान में हमारा भी साझा होगा. पूरी दुनिया मुस्कान की रौशनी से चमक-दमक उठेगी. अपनी हाल में ही लिखी एक त्रिवेणी से इस पोस्ट को विराम देना चाहूँगा-  आप भी हँसते और हँसाते रहे.

उसके चेहरे की उदासी मेरी आँखों ने पढ़ी

और मेरे चेहरे की उदासी भांप ली उसने,

हँस के अपनी उदासियाँ साझा कर ली हमने.

रविवार, मई 09, 2010

त्रिवेणी--3

साथियों, त्रिवेणी की तीसरी कड़ी आप लोगों की सेवा में हाजिर है. आशा है की आप सबों को पसंद आएगी.

@प्रेम में टूट कर भी


प्रेम में टूट कर भी

प्रेम को टूटने नहीं देते.

टूट कर प्रेम किया करने वाले.  
 
 
@विज्ञापन की दुनिया में


मम्मी की कहना मत सुनना

करना वही जो कहे टमी


विज्ञापन की दुनिया में रिश्ते सारे बने डमी.
 
 
 
@एक त्रिवेणी के दो चेहरे



1.

उसके चेहरे की उदासी मेरी आँखों ने पढ़ी

और मेरे चेहरे की उदासी भांप ली उसने,


और उस बच्ची के साथ मैं भी हंस पड़ा हौले-से.


2.

उसके चेहरे की उदासी मेरी आँखों ने पढ़ी

और मेरे चेहरे की उदासी भांप ली उसने,


हँस के अपनी उदासियाँ साझा कर ली हमने.  
 
 
@आँखें खुली हों

तुम जो कहते हो मेरे हमसफ़र बनोगे तुम

तुमको क्या खबर कि किस राह मैं चलूँगा?


चाहत पे भरोसा करो पर आँखें खुली हों.  


@ मेरी मज़बूरी भी, मजबूती भी


तुम्हारी पीड़ा से छलकी रहती है आँखें मेरी

दिल भरा सा रहता है, होंठों पे दुआ होती है


क्या कहूं, तुम मेरी मज़बूरी भी हो, मजबूती भी.
 
 
 
@ जिन्दगी से जी अभी भरा नही


रातें कितनी गुजारी जाग-जाग कर

और दिन गुजारे हैं भाग-भाग कर


फिर भी कमबख्त जिन्दगी से जी अभी भरा नही.
 
 
 
@ कृष्ण बेचारे दुविधा के मारे तन्हा-तन्हा रहते हैं


1.

एक और राधा के आंसू बहते हैं कुछ कहते नही

दूसरी और रुक्मिणी हरदम अपना हक़ जतलाती है.


कृष्ण बेचारे सोच रहे हैं जाए तो जाए किधर?


2.

एक और राधा के आंसू बहते हैं कुछ कहते नही

दूसरी और रुक्मिणी हरदम अपना हक़ जतलाती है.


कृष्ण बेचारे दुविधा के मारे तन्हा-तन्हा रहते हैं.
 
 
 
@ अंजाम


जिन्दगी सुलझाई है जब भी उलझनें हैं बढ़ गयी.

रिश्तों की हर डोर में अनबोली गांठें पड़ गयी.


अच्छा करने गए थे अंजाम देखो क्या निकला.
 
 
 
@ मेरी जुबां


ना तो शुद्ध हिंदी से लगाव है,

ना तो खालिस उर्दू का चाव है,


वो तो ठेठ हिन्दुस्तानी है जिसमें कहता हूँ अपनी बात मैं.

------केशवेन्द्र------

सोमवार, मई 03, 2010

ऐसी भी क्या कमी दिखी, मौला इस दीवाने में

एक ही चर्चा छेड़ा करते हैं अपने हर गाने में !


दर्द मिला मुझे ज्यादा तेरे आने में या जाने में !!



एक ही तेरा ग़म था जिसको कहते रहे अफ़सानों में!

इक अपना जो बिछड़ा उसको ढूंढा हर बेगाने में !!



ग़म-ही-ग़म पाकर अब रब से पूछा करते हरदम हम!

ऐसी भी क्या कमी दिखी, मौला इस दीवाने में !!



चैन से हम मर भी ना पाए, ओ संगदिल, तू ये तो बता!

काहे इतनी देर लगा दी, जालिम तूने आने में!!



खुद को पाना हो या खुदा को, इश्क की आग में जलके देख!

शमा के इश्क़ में जलते-जलते यही कहा परवाने ने!!



दिल की रस्साकस्सी में ना मालूम था ऐसा होगा!

दिल की रस्सी ही टूट गयी इक-दूजे को आजमाने में!!



तुमको खोने की चिंता में जीते जी कई बार मरा!

पर खो डाला तुझको मैंने शायद तुझको पाने में!!