रविवार, जून 05, 2011

बादलों के घेरे में

कृष्णा सोबती जी मेरी सबसे प्रिय लेखिकाओं में एक हैं और उनके सारे रचना संसार में “बादलों के घेरे” मेरी सबसे प्रिय कहानी है. इस कहानी में प्यार की जो करुण कथा है, वो पाठकों के मन में मानों धुंध भरी उदासी बन कर बस जाती है. इस कहानी को पढते हुए मन में जो भावनाएँ उमड़ी थी, उन्हें इससे पहले भी इक बार कविता में ढाला था पर वो कहीं गुम गई है. फिर से इस कहानी को हाल में पढते हुए इसे गीत में ढलने की कोशिश की है. यह रचना कृष्णा सोबती जी और उनके लेखन को समर्पित है. प्रयास कैसा रहा, इसे जानने की उत्कंठा रहेगी..

बादलों के घेरे में

दिख गया चेहरा तेरा फिर बादलों के घेरे में |
रौशनी चमकी, हुई गुम, फिर से इन्हीं अंधेरों में ||

घिर रही यादों की घटा मन की पहाड़ी घाटियों में,
और रह-रह कर हैं आंसू छलके पड़ते चेहरे पर,
यादों की है रील फिरती मन के पटल पर बार-बार,
तुम-ही-तुम बस याद आते, ओ मेरे पहले प्यार |

दिख गया चेहरा तेरा फिर बादलों के घेरे में |
रौशनी चमकी, हुई गुम, फिर से इन्हीं अंधेरों में ||

दरस पा कर के तुम्हारा, चाहना जागी थी मन में,
इक सुमधुर हृदय थी, थी मगर अभिशप्त तन में;
एक डोर खींचती थी, एक जकडन रोकती थी,
और यूँ आयी उतर थी मन्नो मेरे जीवन में |

दिख गया चेहरा तेरा फिर बादलों के घेरे में |
रौशनी चमकी, हुई गुम, फिर से इन्हीं अंधेरों में ||

इक डोर से खिंचता चला आया था मैं पास तेरे,
क्लांत तुम लेती थी और बैठा था मैं साथ तेरे;
हाथ तुमने बढाकर मेरी ओर, फिर खींचा था वापस,
मैं अभागा, कायरमन , छू पाता जो काश हाथ तेरे |

दिख गया चेहरा तेरा फिर बादलों के घेरे में |
रौशनी चमकी, हुई गुम, फिर से इन्हीं अंधेरों में ||

आज हूँ क्षयग्रस्त मैं भी, सोचता उस रात को,
एक पल में घटनेवाली, छोटी सी बड़ी बात को;
कितनी विवश, कितनी करुण, कातर थी कितनी वो घड़ी,
मन की चाह पे मन का भय, जीता था उस रात को |

दिख गया चेहरा तेरा फिर बादलों के घेरे में |
रौशनी चमकी, हुई गुम, फिर से इन्हीं अंधेरों में ||

वापसी अनमनी थी, फिर-फिर मुड़े थे पाँव मेरे,
चाह ने पाई विजय थी, विकल थे मन-प्राण मेरे,
आ गया था पास तेरे, और मिलन अपना हुआ था,
और फिर, मैं रौशनी में आ गया, छोड़ कर तुमको अँधेरे|


दिख गया चेहरा तेरा फिर बादलों के घेरे में |
रौशनी चमकी, हुई गुम, फिर से इन्हीं अंधेरों में ||

बादलों को देखते ही घिरती है यादों की घटा,
झील की पगडंडियों के आस-पास वो घूमना,
विवश-सी तुमने था टेका मत्था भाग्य के सामने,
मैंने चाहा था घेरना, पर तुमने था किया मना |

दिख गया चेहरा तेरा फिर बादलों के घेरे में |
रौशनी चमकी, हुई गुम, फिर से इन्हीं अंधेरों में ||

एक महीने रहा घूमता नैनी-भुवाली बार-बार,
विदा लेनी तय थी लेकिन मन ना होता था तैयार;
सिसकियाँ सुनते हुए पग मुड़ें ना, चलते रहे,
नियति के हाथों गया था प्यार मेरा हाय हार !

दिख गया चेहरा तेरा फिर बादलों के घेरे में |
रौशनी चमकी, हुई गुम, फिर से इन्हीं अंधेरों में ||

फिर हुई शादी, भुला बैठा मैं दुनिया वो पुरानी,
सुख भरा था वर्तमान, अतीत था बस इक कहानी;
फिर बुआ से जाना, मन्नो का सदा को चला जाना,
अपने हाथों से बुनी जर्सी, रख गयी थी वो निशानी.

दिख गया चेहरा तेरा फिर बादलों के घेरे में |
रौशनी चमकी, हुई गुम, फिर से इन्हीं अंधेरों में ||

लौट कर आया, मगर मन्नो नहीं फिर मन से उतरी,
साल भर बीमार रह कर पहुंचा मैं फिर से भुवाली,
वही कॉटेज, वही सब कुछ, पर वहां मन्नो नहीं थी,
यादों में मीरा नहीं, मन्नो ही हर पल संग में थी |

दिख गया चेहरा तेरा फिर बादलों के घेरे में |
रौशनी चमकी, हुई गुम, फिर से इन्हीं अंधेरों में ||

यहाँ तन्हाई में अपनी जब मन बहुत बैचैन होता,
याद आ जाता वो मन्नो का विवश, घुट-घुट के रोना,
अपनी कायरता को रोता, उसकी लाचारी को रोता,
देखता बादल में उसको, जागी आँखों से मैं सोता |

बादलों के इन्हीं घेरों में मैं इक दिन जा समाऊंगा |
मन्नो को शायद कहीं इन बादलों में ही पाउँगा ||