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तुम्हे देख के ऐसा लगता है

तुम्हे देख के ऐसा लगता है इक आंसू की बूँद जो छलकी नही नयनों तक आई प लुढकी नही जीती भी रही मरती भी रही फिर आँखों-ही-आँखों में सूख चली. तुम्हे देख के ऐसा लगता है गंगा के जैसी दिखती हो तुम पावन सबको करती आई पर तुमको सबने मैला किया तुम रह गयी अपनी परछाईं. तुम्हे देख के ऐसा लगता है जैसे  राधा खड़ी हो यमुना तट रोती भी नही, हंसती भी नही सुध-बुध बिसरा कर तन-मन की निर्मोही की बाट अगोरे है. तुम्हे देख के ऐसा लगता है जैसे बादल का इक छोटा टुकड़ा आकाश के कोने में तन्हा छुप-छुप के रोया करता है हर ग़म को छुपाये फिरता है. तुम्हे देख के ऐसा लगता है जैसे कोई बिन माँ का बच्चा हँसना भी भूला, रोना भी उसे भूख-प्यास का भी पता नही आकाश निहारा करता है. तुम्हे देख के ऐसा लगता है जैसे कोई कली मुरझाई-सी खिलने से पहले लील गई जिसको इस जग़ की निठुराई कोमलता का करुणांत हुआ. तुम्हे देख के ऐसा लगता है जैसे इक अभिमन्यु हो रण में आशा सारी नैराश्य भरी फिर भी रथ-चक्र उठाता है लड़ता जाता अं...

स्वर्णमृग

पूरा जग ही माया है कोई पार ना पाया है रूप के पीछे हम भी, तुम भी इसने जग भरमाया है जूते घिसे, घिस गए तलवे कुछ भी हाथ ना आया है जिसके पीछे अबतक थे हम देखा केवल साया है अन्दर क्या है देखा किसने दिखती केवल काया है जब भी हमने देखा उसको देखा वो शरमाया है देखा आज जिसे फूल सा खिला देखा कल कुम्हलाया है उसको जब भी हँसते देखा खुद को बेखुद पाया है हरदम मेरे साथ चला कोई देखा उसका साया है खुद को जब भी तन्हा पाया उसको पास ही पाया है चाहे जितनी कड़ी धूप हो सर पे उसका साया है चाहूँ भी तो छूट ना सकता ऐसा फांस फंसाया है आई मन में उसकी ही छवि जब भी कोई याद आया है खोया है हम ने सब कुछ तब जाकर खुद को पाया है उसकी आँखों में जो झाँका अपना अक्स ही पाया है दोराहे पर ठिठका खड़ा हूँ वक़्त कहाँ हमें लाया है याद साथ तेरी, कलम हाथ मेरे जीवन पन्नों पर छितराया है रहो जहाँ भी, रहो खुश सदा दिल ने ये फ़रमाया है अब मैं हूँ और कलम संग है शब्द मेरा सरमाया है. (24 अप्रैल 2003 )