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प्रेम पंखुरियां

प्रेम नही होता जग में तो कितना अच्छा होता | ऐसे ही बिन बात के ना कोई  हँसता, ना कोई  रोता || प्रेम किये दुःख होत है, यह जानत हर कोय | फिर भी प्रेम के चंगुल से बांच सका ना कोय || प्रेम घृणा में, घृणा प्रेम में ऐसे आवृत्त है | प्रेम से घृणा,घृणा से प्रेम- एक ही वृत्त है || प्यार करना है सरल, मुश्किल निभाना है | प्रेम पथ में ना है मंजिल, ना ठिकाना है || प्रेम को जो ना जाने,वो हैं पीटे ढिंढोरा | प्रेम के पंडित अक्सर ही खामोश देखे हैं  || प्रेम पंथ है अति कठिन, नट की रस्सी जान  | एक चूक भी गर हुई, ना बच पाए प्राण || आभासी दुनिया के बाशिंदे क्या बूझेंगे प्यार | लाभ-हानि के गणित से परे, है प्रेम व्यवहार || प्रेम  भुला देता है सारी दुनियादारी | दुनियादारी को अक्सर प्रेम याद आता है ||

प्रेम का सच-झूठ

(मन्नू भंडारी जी और उनकी कहानी 'यही सच है' को समर्पित) प्रेम में हम कह नही सकते यही सच है और वह है झूठ बस यही कह सकते की या तो सभी सच है या सभी है झूठ. प्रेम पाखी के परों में एक पर है सुख असीम और दूजा पर है उसका वेदना निस्सीम. प्रेम का है एक पहलु सहज, साम्य,निर्विकार, और उसका दूजा पहलू वासना-तृष्णा का ज्वार. प्रेम सागर की सतह पर मन लहर बन डोलता बैचैन होकर वहीँ गहराई में उसकी मुक्त आत्मा शांत है सब अहम् खोकर. प्रेम का जो सच है सच वो जिन्दगी का भी प्रेम के जो संशय संशय वे जिंदगी के भी. प्रेम में पाना नही कुछ प्रेम में खोना नही कुछ प्रेम में बस प्रेम का विस्तार ही होता है सबकुछ.