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ओ माँ! तुम सुन रही हो ना!

ओ माँ! मेरी आवाज सुनो मैं तुम्हारी बगिया में अन्खुवाता बिरवा हूँ मत तोड़ने दो इसे किसी नादान को मत रौंदने दो इसे किसी हैवान को. ओ माँ! पुरुष बेटे के जन्म पर खुशियाँ मनाता है तुम क्यों नही खुशियाँ मनाती बेटियों के जन्म पर क्या इतनी कमजोर हो तुम की मेरे दुनिया में आने से पुरुषों की इस दुनिया में खुद को असुरक्षित महसूस करती हो? ओ माँ! भूलती क्यों हो यह बात की गर्भ में तुम भी रही होगी एक दिन पुरुषों के दवाब से झुककर तुम्हारी माँ ने यदि गर्भ में ही तुम्हारी हत्या होने दी होती, तो क्या होता? सृष्टि की आदिमाता ने यदि लड़कियों की भ्रूण-हत्या होने दी होती तो शायद मानव जाति कब की लुप्त हो चुकी होती. ओ माँ! जबतक मैं सुदूर अनंत में थी मैंने कुछ नही माँगा मगर, अब जब मैं तुम्हारे गर्भ में हूँ धरा पर जन्म लेना हक़ है मेरा मेरे इस हक़ के लिए तुम्हे लड़ना होगा उनसे जो स्रष्टा नही हैं मगर संहार में लगे हैं. ओ माँ! लड़की जनने की आशंका से क्यूँ मुरझाई हो तुम? क्या खुद पर विश्वास नही, या मुझ पर विश्वास नहीं? पुरुष बेटों पर गर्व करता है तुम बेटियों पर गर्व करना सी...