रविवार, अप्रैल 28, 2013

हर चुप्पी में इक चीख छुपी होती है



हर चुप्पी में इक चीख छुपी होती है|

हर सन्नाटे में इक गूंज दबी होती है |

 

इन चीखों को, इन गूंजों को बिरले कोई ही सुनता है |

कुछ आवाजों की दस्तक बस, दिल के दरवाजे होती है|

 

जो सुनता है और गुनता है- बैचैनी में सर धुनता है |

जिसको सुनना था-वो बहरा, उसके कानों पर है पहरा |

 

फिर कोई भगतसिंह आता है, संग अपने धमाके लाता है |

बहरे कानों की यही दवा, ये सीख हमें दे जाता है |

 

इन चीखों को, इन गूंजों को, अपने दिल में घर करने दे |

सत्ता से जनता नहीं डरे, सत्ता को जनता से डरने दे |

 

सोमवार, अप्रैल 22, 2013

एक बलात्कारी दिन


 

 
एक बलात्कारी दिन, आया, आके बीत गया |

रोया ख़बरें सुन-सुन कर, मन मानों रीत गया ||

 

बच्चियों तक को न बख्शा इन वहशी दरिंदों ने |

खुदा शायद हार गया, शैतान जीत गया ||

 

छीन ली कुछ मासूमों की मुस्कान सदा के लिये |

खिलखिलाहटें थमीं और जीवन-संगीत गया ||

 

सत्ता के कानों पे जूं तक नहीं रेंगी |

औरत का कोई नहीं, ऐसा परतीत गया ||

 

जनता का गुस्सा भी क्षणिक-सा उबाल है |

नारे लगे, कैंडल जले और लावा रीत गया ||

 

---केशवेन्द्र---