मंगलवार, मार्च 30, 2010

स्वर्णमृग

पूरा जग ही माया है


कोई पार ना पाया है



रूप के पीछे हम भी, तुम भी

इसने जग भरमाया है



जूते घिसे, घिस गए तलवे

कुछ भी हाथ ना आया है



जिसके पीछे अबतक थे हम

देखा केवल साया है



अन्दर क्या है देखा किसने

दिखती केवल काया है



जब भी हमने देखा उसको

देखा वो शरमाया है



देखा आज जिसे फूल सा खिला

देखा कल कुम्हलाया है



उसको जब भी हँसते देखा

खुद को बेखुद पाया है



हरदम मेरे साथ चला कोई

देखा उसका साया है



खुद को जब भी तन्हा पाया

उसको पास ही पाया है



चाहे जितनी कड़ी धूप हो

सर पे उसका साया है



चाहूँ भी तो छूट ना सकता

ऐसा फांस फंसाया है



आई मन में उसकी ही छवि

जब भी कोई याद आया है



खोया है हम ने सब कुछ


तब जाकर खुद को पाया है



उसकी आँखों में जो झाँका

अपना अक्स ही पाया है



दोराहे पर ठिठका खड़ा हूँ

वक़्त कहाँ हमें लाया है



याद साथ तेरी, कलम हाथ मेरे

जीवन पन्नों पर छितराया है



रहो जहाँ भी, रहो खुश सदा

दिल ने ये फ़रमाया है



अब मैं हूँ और कलम संग है


शब्द मेरा सरमाया है.

(24 अप्रैल 2003 )

शनिवार, मार्च 27, 2010

Ek Sher Apna, Ek Paraya-3

एक अरसे के बाद फिर से मन किया है की उस्तादों के रदीफ़-काफिये की कसौटी पर फिर से जोर-आजमाइश की जाई. तो लीजिए, मीर साहेब का एक शेर और उसी की तुक-ताल में मेरा प्रयास प्रस्तुत है.( 28 Jan 2010)



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इश्क हमारा आह ना पूछो क्या-क्या रंग बदलता है!


खून हुआ दिल दाग हुआ फिर दर्द हुआ फिर गम है अब!!


---मीर---




दुनिया की इस अंधी दौड़ में सब कुछ तो हासिल है हमें!


फिर भी बैठ के सोचा करते,क्या ज्यादा,क्या कम है अब!!


---keshvendra---
 
 
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तुम नही पास, कोई पास नहीं!


अब मुझे जिन्दगी की आस नहीं!!



साँस लेने में दर्द होता है!

अब हवा जिन्दगी की रास नहीं!!

-------जिगर बरेलवी----



इस निगोड़ी जाम से जो बुझ जाये!

ऐसी ओछी हमारी प्यास नही!!



मेरी खुद्दारी को ललकारो नही!

ये किसी के पैरों तले की घास नहीं!!

------केशवेन्द्र------
 

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दिल धड़कने से खफा है और आँखें नम नहीं!

पीछे मुडके देखने की यह सजा कुछ कम नहीं!!

-----शहरयार------


तेरे हुश्न की खुशबू से जुट जायेंगे भँवरे कई नए!

देखना उस भीड़ में सब होंगे, होंगे हम नहीं !!

---केशवेन्द्र---
 


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इस सफ़र में बस मेरी तन्हाई मेरे साथ थी!


हर कदम क्यों खौफ मुझको भीड़ में खोने का था!!
***शहरयार***




जो नही था और हो सकता नहीं था मैं कभी!


बार-बार मुझको गुमाँ, क्यूँ वही होने का था!!


***केशवेन्द्र***
 


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उनसे मिलकर भी तड़पते हैं उनसे मिलने को


पास जितने भी ज़ियादा हैं उतने कम हैं आज


- Gulab Khandelwal

चहकती-बहकती जितनी खुशियाँ थी मेरे हिस्से


खुशियों का लिबास ओढ़े उतने गम हैं आज.

--केशवेन्द्र--



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ये इल्म का सौदा, ये रिसाले, ये किताबें


इक शख़्स की यादों को भुलाने के लिए हैं



- जां निसार अख्तर



हमने मांगी ज़ेहन से कुछ बहानों की 'थपकियाँ '

जो सीने में क़ैद आरजुओं को सुलाने के लिए हैं

- Taru


औरों के गम उधार लेते फिरने का पूछो ना सबब हमसे

ये अपनी बंजर पड़ी आँखों को फिर से रुलाने के लिए हैं.

**केशवेन्द्र**




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नींदें तो टूटती हैं कई बार रात में


इक ख्वाब है जो फ़िर भी कभी टूटता नहीं

---अशोक मिजाज----



दुनिया तो मतलबी है, रूठती है बात-बात पर

एक तू है, हमसे रूठ कर भी कभी रूठता नही

----केशवेन्द्र-----

 

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ढूंढता है खुलूस लोगों में


ये जो नादान मुझमें रहता है



ग़म किसी का हो ग़म समझता हूँ

अब भी इंसान मुझमें रहता है



हसरतें, आरजू, लगन, चाहत

ग़म का सामान मुझमें रहता है

===ज़फर रज़ा===



प्रार्थनाएँ सुनता हूँ बहरों कि तरह


लगता है भगवान मुझमें रहता है.


----केशवेन्द्र-----
 
 
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शुक्रवार, मार्च 26, 2010

एक शेर अपना एक पराया-२

साथियों, लो फिर से मैं आप लोगों की सेवा में हाजिर हूँ एक शेर अपना, एक पराया की दूसरी कड़ी लेकर. प्रयास कैसा लगा बताना मत भूलियेगा. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा.



 
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जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा


कुरेदते हो जो राख जुस्तजू निहाँ क्या है
.....ग़ालिब........


खरोंचे जो दिल पे लगते है कभी नही भरते


जो खोजते हो जिस्म पे निशाँ तो वहाँ क्या है
....केशवेन्द्र.......



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घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर ले


किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये

=====निदा फाजली=====



कांटे में फंस के तड़पती हुई मछली बोली

ऐ खुदा! इस तरह ना किसी को फंसाया जाये.

------keshav------
 
 
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पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है


कोई बतलाये कि हम बतलाये क्या...... ग़ालिब



जो उनने पूछा कि कितना प्यार करते हो

तबसे हैं इस सोच में कि जतलाये क्या


हम हनुमान नही इसका ही जरा गम है

वरना कहते कि दिल चीर के दिखाए क्या.... केशवेन्द्र
 

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मुद्दतों से न हमें तेरी याद आई है


और हम भूल गए है तुझे ऐसा भी नही....Firak



इस इश्क की भूलभुलैयाँ में सब कुछ लुटा बैठे

दिल भी गया हमारा और पास में पैसा भी नही....Keshav
 


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ना हो जब दिल ही सीने में


तो फिर मुह में जुबाँ क्यूँ हो

-कमलेश्वर के उपन्यास 'कितने पाकिस्तान' से


ना हो जब पाँव के नीचे की जमीं

तो फिर सर के ऊपर का आसमां क्यूँ हो




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ग़ुरबत में हो अगर हम, रहता है दिल वतन में!


समझो वहीँ हैं हम भी, है दिल जहाँ हमारा !!
--- Iqbaal----



क्या हुआ गर छिन गयी पावों के नीचे की जमीं

अब भी सर के ऊपर है नीला आसमाँ हमारा

-Keshvendra


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हम तो समझे थे कि हम भूल गए हैं उन को ।


क्या हुआ आज, यह किस बात पे रोना आया ?

-साहिर लुधियानवी


पास लेटी थी तुम मेरे पर मीलों के थे फासले

आज तन्हाई में उसी रात पे रोना आया.

-केशवेन्द्र
 



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आँख से दूर न हो दिल से उतर जायेगा


वक़्त का क्या है गुज़रता है गुज़र जायेगा


- Ahmed Faraz


दिल से चाहो जो बात वो हकीकत बनती है

ठान ले पूरे मन से जो तू वो कर जायेगा

-Keshvendra

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सब मेरे चाहने वाले हैं मेरा कोई नहीं


मैं भी इस देश में उर्दू की तरह रहता हूँ.


----निदा फाजली---



साजिशें किसकी, खता किसने की, सजा मुझको


मैं भी चुप हो के सारे रंजों-ग़म को सहता हूँ.

-केशव




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गुनगुनाता हुआ दिल चाहिए जीने के लिए


इस निजा-ऐ-सहर-ओ-शाम में क्या रक्खा है



हुस्न फनकार की एक छेड़ है इश्क-ऐ-नादाँ

बेवफाई के इस इलज़ाम में क्या रक्खा है



देखना यह है की वो दिल में मकीं है कि नहीं

चाहे जिस नाम से हो नाम में क्या रक्खा है.

----आनंद नारायण मुल्ला--------


पढना हो तो पढ़ लिक्खा है नजरों ने जो दिल पर

छोडो भी, कागज पर लिखे पैगाम में क्या रक्खा है

-केशवेन्द्र---

मंगलवार, मार्च 23, 2010

तूने चोट दी है ऐसे, जैसे डंक हो बिच्छू के

खुशबू का एक झोंका, आया है तुझको छू के!



आँखों से एक आंसू, छलका, गिरा है चू के !!



झगडे के बाद बीबी-मियां, बैठे हैं गुमसुम से !

याद आ रहे दिन प्रेम भरे, उनको हैं शुरू के!!



कैसा सुकून मिलता है, कहने में नही आता!


बुजुर्गों की दुआ लेते हुए, उनके पाँव छू के!!



छूटी है पाठशाला, मगर अब भी ये लगता है!

सर पर बने हुए है हाथ, अब भी मेरे गुरू के !!



सीने में कितना दर्द है, ये मुझको ही है मालूम!


तूने चोट दी है ऐसे, जैसे डंक हो बिच्छू के!!



कुछ रिश्ते नही बदलते, बदलने के ज़माने से !

पर मोटर बोटों के आते ही, दिन लदते हैं चप्पू के!!



पप्पू को दुनिया वालों ने घोंचू भले हो माना!


आई है खबर इस बार, टॉप होने के पप्पू के!!

शुक्रवार, मार्च 19, 2010

तेरी.. नहीं है, तेरी कमी

रिश्तों में है बर्फ जमी!
तेरी.. नहीं है, तेरी कमी!!



दुनिया तो निकली अक्लमंद!

बुद्धू ठहरे एक हमी!!



धरती सूखी जाती है!

आँखों में छुप गयी सारी नमी!!



खंडहरों में जीते हैं!

इक दिन बन जायेंगे ममी!!



दिल ना डोले इन्सां का !

तब डोला करती है ये जमी!!



बाजारू इस दुनिया में!

हैं रिश्ते सारे बने डमी!!



जाने क्या है होने वाला!

साँसें है सहमी-सहमी!!



बिकने कुछ दिल आये हैं!
बाजार में है गहमा-गहमी!!




रात में देखा सपना बुरा!

चीख पड़ा-"मम्मी-मम्मी"!!

शुक्रवार, मार्च 05, 2010

छाई इक धुंध- सी उदासी है

सब तो है पर कमी जरा-सी है!

जिन्दगी लगता है कि बासी है!!





तेरी यादों के सर्द मौसम पर!

छाई इक धुंध- सी उदासी है!!



जिस्म की बात छोडो जाने दो!

रूह तक मेरी कब से प्यासी है!!



कान कब से मेरे तरस से गए!

तुम से मिलती नही शाबासी है!!



साथ तुम थी तो लगता था,ये दुनिया!

जन्नत तो नहीं है पर वहां-सी है!!



तू खफा मुझसे, कोई बात नही!

शुक्र है, यादें तेरी, मेहरबां-सी है!!



हाल अब तो है ये अपना कि!

जुबां होते हुए हालत बेजुबां-सी है!!

गुरुवार, मार्च 04, 2010

एक शेर अपना एक पराया-1

साथियों, बहुत दिनों से मेरे मन में यह ख्याल था कि ग़ज़ल के दुनिया के नामचीन शायरों के पसंदीदा शेरों कि तर्ज़ पर शेर लिखूं...और उसी को मूर्त रूप दिया मैंने ऑरकुट कि कम्युनिटी महकार-ऐ शफक के माध्यम से. तो लीजिए उनमे से कुछ चुने हुए अपने-पराये शेर आपकी नज़र है-


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धूप में निकलो, घटाओं में नहाकर देखो

जिन्दगी क्या है, किताबों को हटाकर देखो.
----निदा फाजली-----

मन के अरमानों को बाहर भी कभी आने दो
दिल के सैलाब में दुनिया को बहाकर देखो. -
------मेरा लिखा शेर----


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तुमको देखा तो ये ख्याल आया

जिन्दगी धूप तुम घना साया
- जावेद अख्तर

दिल की हसरत कि दिल में घुट के रही
तुम न रूठी, ना मैं मना पाया.
---केशवेन्द्र-----

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मुझे खबर थी की वो मेरा नही पराया था

प' धडकनों ने उसी को खुदा बनाया था.

--शायर का तो पता नहीं पर गाया है लता जी ने--

जिसे ना देखने को बंद की थी ये आँखें
बंद आँखों में वही ख्वाब बनके आया था.
-केशवेन्द्र-

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गम रहा जब तक की दम में दम रहा

दिल के जाने का निहायत गम रहा.
--------मीर--------

क्या कसक थी पता चल पाया नही
आँखें छलकी रही, ये दिल नम रहा.
====केशव====

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इश्क में और कुछ नही मिलता

सैकड़ों गम नसीब होते हैं
```मुहम्मद नूह नारवी```

दुःख की हो सकती नहीं कोई इक वजह
सबके अपने-अपने सलीब होते है.
~~~केशव~~~


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सीने में जलन, आँखों में तूफान सा क्यूँ है

इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूँ है
@@@शहरयार@@@@

माना की हक है जिन्दगी का परखे शौक से
पर जिन्दगी का हर कदम इम्तिहान सा क्यूँ है
**केशवेन्द्र**


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प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है

नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है

जिस्म की बात नही थी,हमको दिल तक जाना था
लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है.
##हस्ती मल हस्ती ####


झूठ को पंख मिले है, वो तो उड़ता फिरे फर-फर
सच को चल कर आने में वक़्त तो लगता है
$$$$केशवेन्द्र$$$$$$


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नींद की ओस से पलकों को भिगोये कैसे

जागना जिसका मुकद्दर हो वो सोये कैसे

रेत दामन में हो या दश्त में हो, बस रेत ही है
रेत में फासले-तमन्ना कोई बोए कैसे
-------शहरयार------

देख बरबादियों का मंजर जुबां खामोश हुई
आंसू तक सूख चुके सारे हम रोये कैसे
====केशवेन्द्र=====


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जख्मों को रफू कर ले, दिल शाद करे फिर से

ख्वाबों की कोई दुनिया, आबाद करे फिर से.
००० शहरयार 0000

थोडा-सा जी ले- मर ले, थोडा-सा हंस ले-गा ले
इससे पहले की कोई कोई आंधी बरबाद करे फिर से
oooकेशवेन्द्रooo


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काँटों के बीच से होकर फूलों को चूम आएगी

कि तितली के परों को कभी छिलते नही देखा.
----परवीन शाकिर-----


क्षितिज क्या है दोस्तों नजरों का धोखा है
मगर उसके सिवा धरती-गगन को कहीं मिलते नही देखा.
-----केशवेन्द्र----

दोस्तों, इस अपने-पराये शेरों कि दूसरी किश्त लेकर जल्द ही आपकी सेवा में हाजिर होंगे...तबतक के लिए विदा..

मंगलवार, मार्च 02, 2010

उदासी के रंगों की खोज

विश्व की एक और बड़ी खोज यात्रा पर निकला हूँ मैं

और यह खोज यात्रा एक छोटी-सी दिखने वाली चीज की है

दुनिया में लोगों ने खोजे हैं हर भावना के रंग

प्रेम के, शांति के, क्रांति के...भावनाओं की हर भ्रान्ति के

उदासी के सच्चे रंग किसी को भी मालूम नही.



इस खोज यात्रा में एक-एक कर मुझे करना था

उन सारे रंगों का विश्लेषण जिन्हें

जोड़ा जाता है उदासी या उदास होने से.



सबसे पहले मैं पहुंचा श्वेत रंग के पास

देखा तो वह मुझे अपनी धवलता में खिलखिलाता मिला

श्वेत को उदासी से कैसे कोई जोड़ सकता है भला.



खोज यात्रा आगे बढ़ी

पहुची धूसर मटमैले रंगों के पास

उनके पास से आई मिट्टी की सोंधी खुशबू

और कुछ नए कोपलों के तुतले चहकते बोल

धूसर मटमैला तो बड़ा ही खुशमिजाज रंग निकला.



यात्रा आगे बढती रही.

और इस बार मैं नीले रंगों के तट पर उतरा

बड़ा गुमान था कि नीले रंगों की विशाल दुनिया में

कोई तो उदासी का रंग मिलेगा, मगर

समंदर की खिलखिलाती नीली लहरें मुझे

फेन से भरी जीभ दिखा कर भाग गयी.

मैं उसकी इस शरारत पर मुस्कराकर

वहां से बढ़ चला.



यात्रा को बढ़ते चलना था, बढ़ते रहे हम

और इस बार काले रंग के पास जा पहुचे

शोक और मातम से जिसे जोडती आई है दुनिया

स्यापा करती हुए औरतों का रंग...

मगर कुछ कजरारी आँखों ने

मटकते हुए मुझे डाटा कि

काला रंग भी उदास होता है कहीं.

सहमत सा मैं आगे बढ़ चला.



रास्ते में कहीं पीली सरसों के फूल इतराते मिले

कहीं इन्द्रधनुषी तितलियाँ बलखाती मिली

कहीं चटक रंगों के फूल खिलखिलाते मिले

कहीं लोग उत्सव के रंगों में डूबते-उतराते मिले

कहीं बावरी हवाओं की धुन पर झूमते-थिरकते

हरियाले पेड़ों के झुण्ड मिले.



और फिर, धीरे-धीरे उदासी के कुछ रंग

नजरों के सामने आने शुरू हुए-

भूख-से रोते बच्चों की आँख के आंसूओं का रंग

अब तक मन को उदास किये है

सूखते तालाब में जमी काई का हरा-सावला रंग

याद दिलाता हुआ-

न जाने कितनी ठहरी जिंदगियों के उदास रंगों की.

किसी विधवा की सूनी मांग की उदास कालिमा..

ज्वालामुखी से निकलते इन्द्रधनुषी रंगों का कोलाज

जिसके खूबसूरत रंग न जाने कितनी जिंदगियों

के रंगों को हमेशा के लिए खामोश कर देंगे.





जान गया हूँ अब तो मैं की

हर चटक रंग की अपनी उदासियाँ होती है.

यूँ तो उदासी का कोई रंग नही होता

पर उदासी वह रंग है जिसके साथ

जिन्दगी का हर रंग उदास होता है.

Meri Triveniyan-2

Triveni- 2nd season

**प्यार कभी मुहताज नही

मैं शाहजहाँ नहीं और तू मुमताज नही
अपने प्रेम की निशानी कोई ताज नही

दिल कहता है-प्यार कभी मुहताज नही.

15 Febuary 2010 


**तेरा जूड़ा


किनारे की दो पतली चोटियाँ जैसे हो यमुना और सरस्वती

और बीच की चौड़ी चोटी जैसे हो चौड़ा पाट गंगा का.

 
मेरे लिए तो तेरा जूड़ा किसी त्रिवेणी से कम नही.
 
19 Febuary 2010
 
 
 
**दिल तो पत्थर नही था


दिल तो पत्थर नही था फिर भी तराशा था इसे

दिल हीरे-सा हो उठेगा ये आशा थी मुझे, मगर



दिल ने कई दिनों से धड़कना छोड़ दिया है.
 
20 Febuary 2010
 
 
 


**मुखौटा
.
एक मुखौटा लगा के यहाँ आये हो तुम


खुबसूरत है दिल तुम्हार मगर परदे में है.



और मैं हूँ की कोई राज सह सकता नही.
 
20 Febuary 2010
 
 
 
**शायर सभी निराले होते हैं


इस दुनिया के शायर सभी निराले होते हैं

दुनिया में हँसते रहते हैं घर में रोते हैं.



बीबी झाड़ू लिए मरम्मत उनकी करती है.
20 Febuary 2010




**99 के फेर में



सैकड़ों का इंतजार तो सबको होता है

99 के फेर में चाहे सचिन पड़े या कोई और,रोता है.



सैकड़ें जीत की गारंटी नहीं, ये और बात है.
 
21 Febuary 2010
 
 
 
**नींद और ख्वाब


जिन आँखों में नींद नही आती है

उन आँखों में ख्वाब कहाँ आयेंगे.



नींद और ख्वाब कभी भी बाजारू नहीं हो पाएंगे.
 
21 Febuary 2010




**उदासी में तो हर रंग उदास होता है.


सूनी-सूनी होली में कोई भी पास नही होता है

रंग छलकते हैं बाहर और भीतर, मन रोता है.



उदासी में तो हर रंग उदास होता है.
 
27 Febuary 2010
 
 
 
**होली का दिन है


उदासी के रंगों को चेहरे से मिटा दो

खुशियों के रंगों को चेहरे पे बसा लो



होली का दिन है, यूँ ही ज़ाया ना करो.
 
28 Febuary 2010
 
 
**रंग भरा चेहरा


उदासी धुलती है रंगों से या कि नहीं,

ये तो मालूम नहीं हमको, मगर



रंग भरा चेहरा उदासी को छुपा लेता है.

01 March 2010

Happy Holi friends.