गुरुवार, मार्च 04, 2010

एक शेर अपना एक पराया-1

साथियों, बहुत दिनों से मेरे मन में यह ख्याल था कि ग़ज़ल के दुनिया के नामचीन शायरों के पसंदीदा शेरों कि तर्ज़ पर शेर लिखूं...और उसी को मूर्त रूप दिया मैंने ऑरकुट कि कम्युनिटी महकार-ऐ शफक के माध्यम से. तो लीजिए उनमे से कुछ चुने हुए अपने-पराये शेर आपकी नज़र है-


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धूप में निकलो, घटाओं में नहाकर देखो

जिन्दगी क्या है, किताबों को हटाकर देखो.
----निदा फाजली-----

मन के अरमानों को बाहर भी कभी आने दो
दिल के सैलाब में दुनिया को बहाकर देखो. -
------मेरा लिखा शेर----


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तुमको देखा तो ये ख्याल आया

जिन्दगी धूप तुम घना साया
- जावेद अख्तर

दिल की हसरत कि दिल में घुट के रही
तुम न रूठी, ना मैं मना पाया.
---केशवेन्द्र-----

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मुझे खबर थी की वो मेरा नही पराया था

प' धडकनों ने उसी को खुदा बनाया था.

--शायर का तो पता नहीं पर गाया है लता जी ने--

जिसे ना देखने को बंद की थी ये आँखें
बंद आँखों में वही ख्वाब बनके आया था.
-केशवेन्द्र-

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गम रहा जब तक की दम में दम रहा

दिल के जाने का निहायत गम रहा.
--------मीर--------

क्या कसक थी पता चल पाया नही
आँखें छलकी रही, ये दिल नम रहा.
====केशव====

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इश्क में और कुछ नही मिलता

सैकड़ों गम नसीब होते हैं
```मुहम्मद नूह नारवी```

दुःख की हो सकती नहीं कोई इक वजह
सबके अपने-अपने सलीब होते है.
~~~केशव~~~


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सीने में जलन, आँखों में तूफान सा क्यूँ है

इस शहर में हर शख्स परेशान सा क्यूँ है
@@@शहरयार@@@@

माना की हक है जिन्दगी का परखे शौक से
पर जिन्दगी का हर कदम इम्तिहान सा क्यूँ है
**केशवेन्द्र**


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प्यार का पहला ख़त लिखने में वक़्त तो लगता है

नए परिंदों को उड़ने में वक़्त तो लगता है

जिस्म की बात नही थी,हमको दिल तक जाना था
लम्बी दूरी तय करने में वक़्त तो लगता है.
##हस्ती मल हस्ती ####


झूठ को पंख मिले है, वो तो उड़ता फिरे फर-फर
सच को चल कर आने में वक़्त तो लगता है
$$$$केशवेन्द्र$$$$$$


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नींद की ओस से पलकों को भिगोये कैसे

जागना जिसका मुकद्दर हो वो सोये कैसे

रेत दामन में हो या दश्त में हो, बस रेत ही है
रेत में फासले-तमन्ना कोई बोए कैसे
-------शहरयार------

देख बरबादियों का मंजर जुबां खामोश हुई
आंसू तक सूख चुके सारे हम रोये कैसे
====केशवेन्द्र=====


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जख्मों को रफू कर ले, दिल शाद करे फिर से

ख्वाबों की कोई दुनिया, आबाद करे फिर से.
००० शहरयार 0000

थोडा-सा जी ले- मर ले, थोडा-सा हंस ले-गा ले
इससे पहले की कोई कोई आंधी बरबाद करे फिर से
oooकेशवेन्द्रooo


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काँटों के बीच से होकर फूलों को चूम आएगी

कि तितली के परों को कभी छिलते नही देखा.
----परवीन शाकिर-----


क्षितिज क्या है दोस्तों नजरों का धोखा है
मगर उसके सिवा धरती-गगन को कहीं मिलते नही देखा.
-----केशवेन्द्र----

दोस्तों, इस अपने-पराये शेरों कि दूसरी किश्त लेकर जल्द ही आपकी सेवा में हाजिर होंगे...तबतक के लिए विदा..

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