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"एक शेर अपना, एक पराया" में राहत इंदौरी साहब के शेरों के साथ उन्हें भावभीनी विदाई

"एक शेर अपना, एक पराया" की शृंखला में मैंने कई शायरों के शेरों को लेकर उनपर कुछ अपने शेर कहने की कोशिश की थी |  कल राहत इंदौरी साहब के कोरोना से जूझकर असामयिक देहांत के बाद उनको विदा देने के लिए शेरों से ज्यादा अच्छे कोई फूल मुझे न सूझे  | अपने बागी और तल्ख़ तेवरों से समाज और शासन को सच का आईना दिखाने वाले इस महान शायर में गज़ब की सादगी और साफगोई थी | भले ही राहत इंदौरी साहब हमारे बीच अब न हों, उनकी शायरी उनकी यादों को जिन्दा रखेगी |  पेश है राहत साहब की याद को संजोता "एक शेर अपना, एक पराया" का यह स्तम्भ |  १. लगेगी आग तो आएँगे घर कई ज़द में |     यहाँ पे सिर्फ हमारा मकान थोड़ी है ||     मैं जानता हूँ दुश्मन भी कम नहीं लेकिन |      हमारी तरह हथेली पे जान थोड़ी है ||     सभी का खून है  शामिल  यहाँ की मिट्टी में |     किसी के बाप का हिन्दुस्तान थोड़ी है ||     --राहत इंदौरी ---- हमारी  सरहदों को लांघने की ना  करो ज़ुर्रत |  जान से जाओगे, गलवन में...

मन का टुकड़ा मनका बनाकर

मन का टुकड़ा मनका बनाकर मनबसिया का ध्यान करूं | प्रेम की राह बहुत ही जटिल है ; चल- चल कर आसान करूं | (१५ जुलाई २०१७, रात्रि  )

जिन्दगी, तेरी कमी खलती है

जिंदगी अपनी राह चलती है । तमन्नाएं  यूं ही बस मचलती है ॥  आस से प्यास कभी बुझती नहीं ।  उम्रभर मृगमरीचिकाएं  छलती हैं ॥  दौर ऐसे बहोत आते हैं जहाँ ।  जिंदगी, तेरी कमी खलती है ॥  काश ऐसा अगर हुआ होता ।  सोचकर, हसरतें हाथ मलती  हैं ॥  बस में जो है, कसर नहीं रक्खी ।  क्या करे गर, होनी टाले नहीं टलती है ॥  लाख कोशिश से भी जहां दाल नहीं गलती है ।  वहां भी उम्मीद की एक लौ जरूर जलती है ॥  खुदा धरती का हाल देख सोच पड़े ।  क्या इंसान बनाना बड़ी गलती है ॥  देर हो सकती है, अंधेर नहीं  ।  दुआएं सच्चे दिल की जरूर फलती हैं ॥  पाखी घर लौट रहे, चलो 'केशव' ।  कि सुरमई स्याह शाम ढ़लती है ॥ 

"एक शेर अपना, एक पराया" में दुष्यंत कुमार के शेरों का काफिला

इस पोस्ट में मैं हिंदी ग़ज़ल को एक नए मुकाम पर पहुचने वाले और आपातकाल की तानाशाही के खिलाफ जनता को झकझोरने वाले  शायर दुष्यंत कुमार के कुछ पसंदीदा शेर और उनकी तर्ज़ पर लिखे अपने शेर पेश करूँगा. पेशकश कैसी लगी. यह आपसे जानने की प्रतीक्षा रहेगी. १. मैं बहुत कुछ सोचता रहता हूँ, पर कुछ कहता नही, बोलना भी है मना, सच बोलना तो दरकिनार. ---दुष्यंत कुमार---- घृणा से मुझे घूर कर पूछा वो पूछा ख्वाहिश आखिरी हँसते हुए उसकी तरफ देखा, कहा मैंने, 'सिर्फ प्यार'. ----केशवेन्द्र कुमार----       २. सिर्फ शायर देखता है कहकहों की असलियत हर किसी के पास तो ऐसी नजर होगी नहीं. ---दुष्यंत कुमार--- इश्क में सीखा है हमने फैलना आकाश-सा आशिक तो हैं हम भी तेरे, होंगे मगर जोगी नहीं. ---केशवेन्द्र कुमार----       ३. जियें तो अपने बगीचे में गुलमोहर के तले मरे तो गैर की गलियों में गुलमोहर के लिए ----दुष्यंत कुमार---- आँख में जम गया है अँधेरा परत-दर-परत और कितना इंतजार बाकी है सहर के लिए. ----केशवेन्द्र----       ४...

एक शेर अपना-एक पराया-"गुलज़ार साहेब" के शेरों के साथ

साथियों, इस कड़ी में मैं गुलज़ार साहब के लिखे कुछ पसंदीदा शेरों को लेकर उनकी तर्ज़ पर अपने शेर कहने की कोशिश कर रहा हूँ. शेर गुलज़ार साहब के गीतों-नज्मों-गजलों के प्यारे से संग्रह "यार जुलाहे" से लिए गए हैं. १. हाथ छूटें भी तो रिश्ते नही तोड़ा करते वक़्त की शाख़ से लम्हे नही तोड़ा करते ----गुलज़ार---- कोई प्यारा सा सपना बेरहमी से टूट जाता है किसी सोए हुए को कस के नहीं झिंझोड़ा करते. -----केशवेन्द्र----       २. आप के बाद ये महसूस हुआ है हम को जीना मुश्किल नहीं और मरना भी दुश्वार नहीं ----गुलज़ार--- कहते रहे रोज तुम्हे तुमसे प्यार करते हैं और दिल जानता था हमको तुमसे प्यार नहीं ------केशवेन्द्र-----       ३. जिन्दगी यूँ हुई बसर तन्हा काफिला साथ चला और सफ़र तन्हा अपने साये से चौक जाते हैं उम्र गुजरी है इस कदर तन्हा ---गुलज़ार--- सड़कें NH बनी जब से, है मुंह फेर लिया किनारे गुमसुम खड़े हैं शज़र तन्हा छू के लौट आई है किनारों को लहर लौटी है देखो मगर किस कदर तन्हा. ----केशवेन्द्र---- ४..दर्द हल्का है साँस भारी...

एक शेर अपना एक पराया- 4

दोस्तों, फिर से आपकी सेवा में हाजिर है इस श्रंखला की चौथी कड़ी. उम्मीद है की ये पेशकश आपको पसंद आ रही है. आप की समालोचनाओं का इंतजार रहेगा. ज़ख्म खिले तो बात बने फूलों का खिल जाना क्या   ग़म की दौलत है तो है दुनिया को दिखलाना क्या *****ज़फर रज़ा**** अश्क़ जो उमड़े आँखों में रुकना क्या बह जाना क्या ###केशवेन्द्र#### ********** खिलखिलाता है जो आज के दौर में इक अजूबे से क्या कम वो इंसान है मीर, तुलसी, ज़फ़र, जोश, मीरा, कबीर दिल ही ग़ालिब है और दिल ही रसखान है   ढूंढ़ता फिर रहा फूल पर तितलियां शहर में वो नया है या नादान है ****NEERAJ GOSWAMI***** हम को ग़म भी मिले तो नही ग़म कोई तुमको खुशियाँ मिले ये ही अरमान है. -------Keshvendra------ ********* कुछ लोग इस शहर में हमसे भी हैं खफा हर एक से अपनी भी तबियत नही मिलती. -------निदा फाजली------- आईने सच दिखाते हैं या झूठ, नहीं मालूम मगर जो आईने में है उससे अपनी सूरत नहीं मिलती. ---केशवेन्द्र---- *********** कभी पाबन्दियों से छुट के भी दम घुटने लगता है दरो-दी...

Ek Sher Apna, Ek Paraya-3

एक अरसे के बाद फिर से मन किया है की उस्तादों के रदीफ़-काफिये की कसौटी पर फिर से जोर-आजमाइश की जाई. तो लीजिए, मीर साहेब का एक शेर और उसी की तुक-ताल में मेरा प्रयास प्रस्तुत है.( 28 Jan 2010) ******** इश्क हमारा आह ना पूछो क्या-क्या रंग बदलता है! खून हुआ दिल दाग हुआ फिर दर्द हुआ फिर गम है अब!! ---मीर--- दुनिया की इस अंधी दौड़ में सब कुछ तो हासिल है हमें! फिर भी बैठ के सोचा करते,क्या ज्यादा,क्या कम है अब!! ---keshvendra---     ********   तुम नही पास, कोई पास नहीं! अब मुझे जिन्दगी की आस नहीं!! साँस लेने में दर्द होता है! अब हवा जिन्दगी की रास नहीं!! -------जिगर बरेलवी---- इस निगोड़ी जाम से जो बुझ जाये! ऐसी ओछी हमारी प्यास नही!! मेरी खुद्दारी को ललकारो नही! ये किसी के पैरों तले की घास नहीं!! ------केशवेन्द्र------   *********   दिल धड़कने से खफा है और आँखें नम नहीं! पीछे मुडके देखने की यह सजा कुछ कम नहीं!! -----शहरयार------ तेरे हुश्न की खुशबू से जुट जायेंगे भँवरे कई नए! देखना उस भीड़ में सब होंगे, होंग...

एक शेर अपना एक पराया-२

साथियों, लो फिर से मैं आप लोगों की सेवा में हाजिर हूँ एक शेर अपना, एक पराया की दूसरी कड़ी लेकर. प्रयास कैसा लगा बताना मत भूलियेगा. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा.   ********* जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा कुरेदते हो जो राख जुस्तजू निहाँ क्या है .....ग़ालिब........ खरोंचे जो दिल पे लगते है कभी नही भरते जो खोजते हो जिस्म पे निशाँ तो वहाँ क्या है ....केशवेन्द्र....... ******* घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर ले किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये =====निदा फाजली===== कांटे में फंस के तड़पती हुई मछली बोली ऐ खुदा! इस तरह ना किसी को फंसाया जाये. ------keshav------     ******** पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है कोई बतलाये कि हम बतलाये क्या...... ग़ालिब जो उनने पूछा कि कितना प्यार करते हो तबसे हैं इस सोच में कि जतलाये क्या हम हनुमान नही इसका ही जरा गम है वरना कहते कि दिल चीर के दिखाए क्या.... केशवेन्द्र   *********     मुद्दतों से न हमें तेरी याद आई है और हम भूल गए है तुझे ऐसा भी नही....Firak ...

एक शेर अपना एक पराया-1

साथियों, बहुत दिनों से मेरे मन में यह ख्याल था कि ग़ज़ल के दुनिया के नामचीन शायरों के पसंदीदा शेरों कि तर्ज़ पर शेर लिखूं...और उसी को मूर्त रूप दिया मैंने ऑरकुट कि कम्युनिटी महकार-ऐ शफक के माध्यम से. तो लीजिए उनमे से कुछ चुने हुए अपने-पराये शेर आपकी नज़र है- ****** धूप में निकलो, घटाओं में नहाकर देखो जिन्दगी क्या है, किताबों को हटाकर देखो. ----निदा फाजली----- मन के अरमानों को बाहर भी कभी आने दो दिल के सैलाब में दुनिया को बहाकर देखो. - ------मेरा लिखा शेर---- ****** तुमको देखा तो ये ख्याल आया जिन्दगी धूप तुम घना साया - जावेद अख्तर दिल की हसरत कि दिल में घुट के रही तुम न रूठी, ना मैं मना पाया. ---केशवेन्द्र----- ******* मुझे खबर थी की वो मेरा नही पराया था प' धडकनों ने उसी को खुदा बनाया था. --शायर का तो पता नहीं पर गाया है लता जी ने-- जिसे ना देखने को बंद की थी ये आँखें बंद आँखों में वही ख्वाब बनके आया था. -केशवेन्द्र- ****** गम रहा जब तक की दम में दम रहा दिल के जाने का निहायत गम रहा. --------मीर-------- क्या कसक थी पता चल पाया नही आँखें छलकी र...