गुरुवार, दिसंबर 31, 2009

बीती हुई यादों से नए साल का स्वागत-स्मृतियाँ 2009

         स्मृतियाँ  -                    

ओस की बूंदों से भी स्निग्ध
मोतियों से भी ज्यादा चमकीली
शहद से भी ज्यादा मीठी
आंसुओं  से भी ज्यादा नमकीन
नवपल्लवों  से भी ज्यादा रक्तिम
सुनहरी सुबह से भी ज्यादा सुहानी

जीवन क्या है इन स्मृतियाँ के समुच्चय के सिवा

नववर्ष में इन सुन्दर स्मृतियाँ का साथ रहे
और यह नववर्ष कुछ इस तरह बीते
की हर खूबसूरत स्वप्न सच हो उठे
तन-मन-जीवन में प्रेम की मिठास घुल जाये
स्मृतियाँ और भी सुखद, और सुहानी
और सुनहरी हो उठे.

बुधवार, दिसंबर 30, 2009

स्वामी प्रेम डूबे-युधिष्ठिर संवाद

यक्ष-युधिष्ठिर संवाद की समाप्ति पर युधिष्ठिर ने यक्ष से अपनी एक व्यक्तिगत जिज्ञासा रखी-
"हे महाज्ञानी यक्ष, मानव चिरकाल से जानता आया है कि प्रेम सारे दुखों के मूल में है, सारे साहित्य का सार यही है कि प्रेम का वियोग पक्ष ही प्रबल है, फिर भी सब-कुछ जानते हुए भी मानव इस प्रेम कि दलदल में डूबने को क्यूँ आतुर हो उठता है?

यक्ष  ने पहले अपनी दाढ़ी खुजाई, फिर सर पर जो थोड़े-मोड़े बाल बचे थे उनको खुजाया और फिर एकाएक उनको सारे बदन में खुजली होने लगी. पूरे जीवन में इतना खुजाने वाला सवाल उन्हें आजतक नही मिला था. अंत में थक-हार कर अपनी असमर्थता जाहिर करते हुए यक्ष ने कहा-
"हे धर्मराज युधिष्ठिर, प्रेम के सन्दर्भ में मेरा ज्ञान बड़ा ही सीमित है. मानव प्रेम के जिस भावनात्मक पहलू को लेकर आंसुओं का समंदर बहा देते है, उससे हमारा पाला नही पड़ता. हम यक्ष गण तो स्वछंद  विहार और भोग-विलास में विश्वास रखते है. हमें तो कभी-कभी यह देख कर घोर आश्चर्य होता है कि मानव एक नारी के पीछे इस तरह उन्मत्त और पागल कैसे हो उठता है,जबकि भूलोक पर नारियों की कोई कमी नहीं. मेरी व्यक्तिगत राय में इस तरह का प्रेम बेवकूफी के सिवा कुछ नही. हाँ, अगर आप इस प्रश्न में इतने ही ज्यादा उत्सुक है तो मैं आपको स्वामी प्रेम डूबे का पता देता हूँ. स्वामीजी ने प्रेम का गहन अध्ययन-मनन-विश्लेषण करके प्रेम के चार आर्य सत्यों का प्रतिपादन किया है. वो शायद आपकी शंका का समाधान कर सके.

युधिष्ठिर ने ख़ुशी-ख़ुशी यक्ष से स्वामी प्रेम डूबे का पता लिया और फिर जा पहुंचे उनके पास. वैसे भी अज्ञातवास  चल रहा था और उनके पास समय-ही-समय था. स्वामीजी ने युधिष्ठिर का स्वागत करते हुए कहा कि अहोभाग्य हमारा कि प्रेम से दस कोस दूर भागनेवाला धर्म आज प्रेम कि कुटिया में पधारा.  युधिष्ठिर ने उन्हें अपने आने का उद्देश्य बताया. स्वामीजी के चेहरे पर मंद-मंद मुस्कान बिखरी और वे युधिष्ठिर को अपनी आलीशान महलनुमा कुटिया के साधना कक्ष में ले गए. फिर अपने आसन पर आँख मूंद कर बैठे उन्होंने स्वामीनुमा धीर-गंभीर आवाज में युधिष्ठिर से पूछा-
"कहो वत्स, मैं कहाँ से तुम्हारी शंका के समाधान कि शुरुआत करूं."
युधिष्ठिर ने विनीत स्वर में कहा-"हे स्वामी महाराज, मैं आपके मुखारविंद से प्रेम के चार ध्रुव सत्य और उनकी व्याख्या चाहूँगा.

स्वामीजी का चेहरा थोड़ा खिला, लम्बी-सी दाढ़ी थोड़ी हिली, मूछें फडकी और फिर मंद गति से होठों ने खुलते हुए प्रेम के ध्रुव सत्य और उनकी व्याख्या पर प्रवचन शुरू किया.

स्वामीजी उवाचे-हे युधिष्ठिर, प्रेम का पहला ध्रुव सत्य बड़ा सीधा-सरल है. वह यह है कि-
"प्रेम मानव जीवन का ध्रुव सत्य है. प्रेम करना इंसान की विवशता है. मानव मन प्रेम करने के लिए ही बना है. तुमने देवताओं या यक्षों को अपवादस्वरूप ही प्रेम करते देखा होगा, वे भोग-विलास और काम-क्रीडा का सुख-भोग करने को बने है. मानव में भी कुछ लोग उनका अनुकरण करने कि कोशिश करते है, पर उनका मन सदैव असंतुष्ट, दुखी और छटपटाता हुआ रहता है.
                                          फिर मानवों में भी बहुत से लोग प्रेम से भागने या बचने कि कोशिश करते है, लेकिन प्रेम उन्हें कहाँ छोड़ने वाला है. कहीं-ना-कहीं उन्हें धर ही दबोचता है. कभी-कभी तो उन्हें अहसास तक नही होता कि वे कितने खतरनाक तरीके से प्रेम के पंजे में फंसे है.

फिर स्वामी जी ने उदहारण देते हुए कहा, युधिष्ठिर अपने पास से ही श्री कृष्ण जी का उदाहरण ले लो. सोचो, भगवन विष्णु का अवतार होते हुए भी मानव का तन धारण करने के कारण वे प्रेम की भूल-भुलैयां में फंसे हुए है. कभी राधा, कभी रुक्मिणी तो कभी गोपियाँ. अब इससे आप स्पष्टरूप में समझ सकते है कि मानव तन धारण करने पर प्रेम से निस्तार नही है.
युधिष्ठिर ने अर्जुन के प्रेम-प्रसंगों के बरे में मन-ही-मन सोचते हुए सहमति  में सर डुलाया.


फिर स्वामीजी ने अल्पविराम लेते हुए युधिष्ठिर के चेहरे को एक बार निहारा और वहां संतुष्टि की गदगद मुद्रा को देख अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए बोले-
"हे धर्मराज, प्रेम का दूसरा ध्रुव सत्य यह है कि  प्रेम करने से दुःख कि प्राप्ति होती है.
युधिष्ठिर अकचकाए से बोल पड़े-"महाराज, यह बात तो मुझे बड़ी उलटी प्रतीत होती है. आदमी सुख पाने को प्रेम करता है, अगर इसमें दुःख मिले तो आदमी प्रेम ही क्यूँ करे ?"
                                                            
                                                         स्वामीजी ने मुस्कुराते हुए अपनी बात आगे बढ़ाई-" हे युधिष्ठिर, यह सच है कि मानव सुख कि तलाश में प्रेम करता है पर, यह भी उतना ही सच है कि प्रेम में जो भी सुख है वो प्रेम की तलाश में ही है, प्रेम की प्राप्ति के बाद नही. जिस प्रेम के पौधे पर संयोग के फूल आते है, वह बस एक ऋतु का पौधा होता है. वहीँ जिस प्रेम के पौधे में वियोग के फूल आते है उसमे हर साल पीले उदास फूल आते रहते हैं.
                                                    
                                                              स्वामीजी अपनी बात को स्पष्ट करते हुए आगे बोले-"प्रेम का दुःख मानव के हर दुःख के मूल में है. प्रेम में सफल व्यक्ति इस बात से दुखी रहते हैं कि उनका प्रेम पहले जैसा नही रहा, वहीँ प्रेम में असफल व्यक्ति अपनी असफलता से दुखी और निराश रहते हैं. प्रेम में दुखी व्यक्ति अनुपयोगी, अनुत्पादक और असामाजिक हो जाते हैं. सारे साहित्यकार और दार्शनिक इसी श्रेणी के प्राणी होते हैं.
युधिष्ठिर ने अपनी आपत्ति प्रकट कि,"महाराज, सारे साहित्यकारों-दार्शनिकों को इस प्रेम-दुखी श्रेणी में रखना कहाँ तक उचित है?"
                                                       
                                                        स्वामीजी ने कहा," युधिष्ठिर, पूरे भूलोक का साहित्य पलट कर देख लो- प्रेम में दुखी आत्माओं का क्रंदन सर्वत्र दिखेगा. और दर्शन क्या है, प्रेम में दुखी आत्माओं द्वारा वैकल्पिक दुनिया और वैकल्पिक सत्य की खोज का खोखला प्रयास और अपने दुःख को उदात्त दिखने कि कोशिश के सिवा."
 इस आवेशपूर्ण वक्तृता के बाद स्वामीजी ने अपने वाक अंगों को थोड़ा आराम देने कि सोची और अपने गले को सहलाने लगे.


चिर जिज्ञासु युधिष्ठिर ने स्वामी जी के विराम को भंग करते हुए पूछा,'और महाराज, प्रेम का तीसरा ध्रुव सत्य क्या है?
स्वामीजी ने क्षणिक अवकाश के बाद बोलना शुरू किया-"हे युधिष्ठिर, प्रेम का यही तीसरा ध्रुव सत्य है जो प्रेम के सारे खतरों के बावजूद प्रेम को महत्ता को स्थापित करता है. यह सत्य इस प्रकार है की  प्रेम का दुःख ज्ञान कि तलाश को प्रेरित करता है और यही ज्ञान मनुष्य को सारे दुखों से मुक्ति दिलाता है. "

फिर युधिष्ठिर को समझाते  हुए स्वामीजी बोले-" वत्स, प्रेम एक उन्माद या नशे कि तरह होता है. जबतक इसका सुरूर चढ़ा है, तबतक तो आदमी बदमस्त रहता है, पर नशा उतरने पर व्यर्थताबोध का अहसास बड़ा तीव्र और मारक होता है. यह बोध व्यक्ति को अपने अन्दर झाँकने को, खुद को खोजने को प्रेरित करता है. प्रेम की बहिर्मुखी यात्रा पर निकला व्यक्ति ठोकर खाकर मुड़ता है और फिर ज्ञान कि अंतर्यात्रा शुरू हो जाती है. इस अंतर्यात्रा से अर्जित ज्ञान व्यक्ति को बताता है कि उसने जो प्रेम किया था वह वाकई में अपने को जानने कि दिशा में पहला और अनिवार्य कदम था. और इस बोध के साथ व्यक्ति प्रेम और जीवन  के सारे सुखद-दुखद अनुभवों से ऊपर उठ समदर्शी अवस्था में पहुँच जाता है.

स्वामीजी ने युधिष्ठिर के चेहरे की ओर देखा. युधिष्ठिर के चेहरे पर अभी वैसा ही भाव था जैसा प्राथमिक पाठशाला के बच्चे के चेहरे पर वेड-वेदांत का प्रवचन सुन कर आये. स्वामीजी ने अपनी बात को उदाहरण से स्पष्ट करते हुए कहा,"युधिष्ठिर, सती द्वारा अपने पति शिव के अपमान से क्षुब्ध हो कर अपने पिता दक्ष के हवन कुंड में अपनी जान दे देने के बाद महादेव शिव कि अवस्था को याद करो. पागल और उन्मत्त की तरह दुःख के असीम, अथाह,अनंत सागर में डूबे सती के शव को अपने कन्धों पर लिए प्रलयातुर महादेव की छवि प्रेम के दुःख से दुखी आत्मा का सबसे सच्चा उदाहरण है. पर प्रेम के इस दुःख ने शिव के अंतर्ज्ञान और समदर्शीपन को और बढाया ही. इस दुःख से उबर कर उन्होंने फिर पार्वती जी से प्रेम और शादी की. इस उदाहरण से बिलकुल स्पष्ट है कि प्रेम का दुःख लघुकाल  में दुःख देने वाला पर दीर्घकाल में ज्ञान फल  की प्राप्ति के रूप में सुख देने वाला होता है.

धर्मराज युधिष्ठिर काफी देर तक स्वामी  प्रेम डूबे के इन गूढ़ वचनों  की जुगाली करते रहे. स्वामीजी की बातें पहले तो उन्हें चौंका रही थी पर जैसे ही जुगाली कर-कर के वे इन बातों को हजम करने में सफल होते थे, उन्हें लगता था कि प्रेम के सारे रहस्य उनके सामने खुलते जा रहे हैं.  चंचल उत्सुकता के साथ युधिष्ठिर ने स्वामीजी को देखते  हुए मानों नयनों कि मूक भाषा में प्रेम के चौथे ध्रुव सत्य पर आने का आग्रह किया.


और फिर अपने गुरु-गंभीर स्वर में स्वामीजी बोले-'हे वत्स! प्रेम का चौथा ध्रुव सत्य जितना सरल दीखता है, उतना ही गूढ़ है. एक तरह से यह प्रेम के हर सच का सार-संक्षेप है. एक तरफ तो तुम्हे ऐसा महसूस होगा कि इसके भाष्य कि कोई जरुरत नही है वहीँ दूसरी तरफ यह भी लगेगा कि यह अभाष्येय  है. प्रेम का यह चौथा ध्रुव सत्य है कि- "प्रेम मुक्ति नही है, प्रेम में मुक्ति नही है पर प्रेम से मुक्ति भी नही है.

फिर अपनी बात को समझाते हुए स्वामीजी बोले, 'मुक्ति या मोक्ष कि जो तलाश हमारे धर्मं ग्रंथों में है, प्रेम वह नही है. प्रेम मोक्ष या निर्वाण कि तरह नही है जिसको पा लेने से जीवन की साध मिट जाये. बल्कि प्रेम तो और जीवन कि चाह को उसके सीमांत तक बढ़ा देता है.'

अपनी व्याख्या को आगे बढ़ाते हुए स्वामीजी बोले,' प्रेम करते हुए भी मुक्ति का अहसास नही है क्योंकि प्रेम सच्चा हो या झूठा उसमे छटपटाहट,तड़प, बैचैनी इतनी मात्रा में होते हैं कि प्रेमी प्रेम के सिवा और किसी भी कार्य को करने की हालत में नही रहता. प्रेम करना एक शाश्वत बैचैनी में जीना है.'

फिर, स्वामीजी प्रेम के चौथे ध्रुव सत्य की  आखिरी कड़ी को उठाते हुए बोले,"युधिष्ठिर, प्रेम मुक्ति मार्ग कि ना तो मंजिल है और ना ही उसका सफ़र; पर मानव कि नियति यह है कि उसे प्रेम से छुटकारा नही मिल सकता. उसे अपने इस जीवन में एक-ना-एक बार प्रेमपथ से गुजरना ही पड़ेगा. प्रेम से इंसान चाहे लाख दूर रहने कि कोशिश करे, पर किसी-ना-किसी रूप में प्रेम उसे अपने बंधन में बांधेगा जरुर. सच में देखो तो युधिष्ठिर, ये सृष्टि ही प्रेममयी है. प्रेमी-प्रेमिका का प्रेम ही व्यापक होकर सृष्टि के हर प्रेम में अपनी झलक दिखाता  है. मानव को तो छोडो, भगवान  तक प्रेम के भूखे हैं. अतएव मानव शरीर धारण कर कोई यह दावा नही कर सकता कि उसका दिल प्रेम-प्रूफ है. प्रेम मानव जीवन कि अटल नियति है, उससे कोई बच नही सकता."


युधिष्ठिर के मन में उठ रही सारी जिज्ञासाएं  स्वामी प्रेम डूबे के उत्तरों से शांत हो चुकी थी. ख़ुशी-ख़ुशी स्वामीजी की  चरणरज ले कर वे अपने अज्ञातवास निवास पहुचे. उसके बाद युधिष्ठिर ने द्रौपदी और सारे पांडवों को प्रेम के चार ध्रुव सत्य कि शिक्षा दी. जैसे, स्वामी प्रेम डूबे की इस प्रेममय शिक्षा के बाद पांडवों के दिन द्रौपदी के साथ बड़े प्रेम से कटे, वैसे ही इस कहानी के सभी पाठकों-श्रोताओं का जीवन प्रेममय गुजरे.

मंगलवार, दिसंबर 29, 2009

गुनगुनाते हुए तुमको इक ग़ज़ल की तरह

गुनगुनाते हुए तुमको इक ग़ज़ल की तरह
मैंने पाया है तुम्हे ख्वाबों की खुशबू की तरह

जब भी मैं घिरा हूँ तन्हाई के अंधेरों में
तेरी यादों को मैंने पाया है जुगनू की तरह

डूबते-उतराते तेरी आँखों में
तेरी आँखें दिखी है मुझको सागर की तरह

तुम जो हंसती हो तो मेरा दिल भी झूम उठता है
मैंने पाया है तेरी हंसी को फूलों की तरह

तेरे चेहरे को देखते नही भरता मन है
तेरा चेहरा है अँधेरे में रौशनी की तरह

तू-ही-तू है हर तरफ मेरी जिन्दगी में
अब तो तेरा होना है मेरे होने की तरह.

हाय-हाय री निंदिया

नींद भी इक नशा है जिसका असर कुछ कम नही
नींद में हो तो ज़माने भर का कोई गम नही

नींद की खातिर सहे क्या-क्या सितम हम ने नही
फिर भी दामन नींद का छोड़ा कभी हम ने नही

किनारे पर हाथ थामे और छोड़ दे मझधार में
लोग ऐसे बहुत इस दुनिया में उनमे हम नही

नींद की खातिर सही है जिल्लतें- दुश्वारियां
फिर भी यारी नींद से अपनी हुई कुछ कम नहीं

जिन्दगी की जरुरत भी, मौत की आहट भी नींद
नींद क्या है, क्या कहूं,इसे जानना मुमकिन नही

नींद है तो ख्वाब है और ख्वाबों  से है जिन्दगी
नींद ना हो तो किसी की जिन्दगी रौशन नही.

तन्हाई

जब कभी तन्हा-तन्हा होता हूँ
आंसू आते नहीं, पर रोता हूँ

सोचता हूँ कि यादों से जरा दूर रहूँ
फिर भी यादों के संग ही होता हूँ

याद आता है की पैरों में है जंजीर पड़ी
जब कभी उड़ने को मैं होता हूँ

रट रहा राम-राम, मरम जानता ही नहीं
प्रेम की रट लगाये मैं भी एक तोता हूँ.

जाने क्या गम है, दिल मेरा नम है
दुनिया क्या जाने, हँसता हूँ न रोता हूँ

भीड़ में खुद को ढूंढे फिरता हूँ
वहीँ तनहाइयों में खुद को मैं खोता हूँ.

रविवार, दिसंबर 27, 2009

नए साल के भारत से

नए साल के भारत से है  उम्मीदे नयी-नयी
झारखण्ड का भ्रष्ट नाच ना हो फिर से कभी
फिर से किसी रुचिका को ना जान गवानी पड़े
और ना कोई अपराधी पा जाये सत्ता की कुर्सी

रीढविहीन प्रजातंत्र को उसकी बैकबोन मिल जाये
नेताओं-अफसरों में थोड़ी नैतिकता आ जाये
बेचारी निरीह जनता की निरीहता गुम जाये
देश को प्रेरित कर सकने वाले कुछ नेता सामने आये

आतंकवाद और नक्सलवाद का तांडव नृत्य थमे
भाषा और क्षेत्रीयता के झगडे अब तो जरा कमे
कूटनीति में भारत फिर से चाले अच्छी चले
दुनिया के मसलो में भारत की तूती बोले   

ग्राफ गरीबी का तेजी से नीचे आता जाये
हर हाथ को काम और हर मुंह दाना पाए
शिक्षा का स्तर तेजी से ऊपर चढ़ता जाये
भारत और इंडिया की खाई पाटी जाये .

दुआ यही है की भारत का ना आशावाद मरे
इतने सालों से आशा पर जिन्दा हैं कितने मुर्दे.

रविवार, दिसंबर 06, 2009

बलात्कार के विरुद्ध

साथियों, इस साल के आखिरी महीनों ने हमारे देश की तथाकथित नैतिकता की पूरी तरह पोल खोल कर रख दी है. आंध्र के राज्यपाल नारायण दत्त तिवारी हाल में मीडिया में छाया  सेक्स स्कैंडल हो या फिर हरयाणा में आज से दो दशकों पहले इक किशोरी का शोषण कर के उसे आत्महत्या पर मजबूर कर देने के आरोप में फंसे  हरयाणा के पूर्व पुलिस प्रमुख राठौर का मामला हो,साफ दीखता है कि बाड़ ने ही खेत को खाना शुरू कर दिया है. बच्चियों,किशोरियों और महिलाओं के शोषण का यह जो चक्रव्यूह फैला हुआ है उसके खिलाफ हर एक को उठ खड़े होने कि जरुरत है. देश में जो यह बलात्कारी मानसिकता फैलती जा रही है, उससे हर महिला आज अपने को असुरक्षित महसूस कर रही है.  आपके विचारों का इंतजार रहेगा कि इस परिस्थिति में हम लोग क्या बदलाव ला सकते है.



मुझे शर्म है की मैं एक ऐसे समाज का हिस्सा हूँ
जिसमे कोई भी लड़की खुद  को सुरक्षित नही महसूसती
घर के बाहर की बेशर्म दुनिया में ही नही
नैतिकता के पर्दों से ढके घर में भी.

न जाने कैसा कुंठित नैतिक समाज है हमारा
जिसमे साठ साला व्यक्ति की काम वासना भड़क उठती है
छः साल की अकेली लड़की को देखकर.
जिस समाज में हर मनुष्य भूखे भेडिये की तरह है
शिकार की तलाश में लार टपकाता.

इक ऐसा समाज जिसमे बस और ट्रेनों में
सफ़र करती औरतों ही नहीं बच्चियों तक  को पता है
कि कितना जुगुप्षा जनक हो सकता है मानवीय स्पर्श
की कितनी भूखी और कामुक हो सकती है आँखें
कितनी अश्लील हो सकती है मुद्राएँ
कितने गलीज और घिनौनी हो सकती है भाषा.

इक ऐसे समाज का हिस्सा हूँ मैं
जिसमे हर मिनट खरीदी-बेची जा रही होती है
कोई मासूम बच्ची किसी भेडिये के हाथों,
एक ऐसा समाज जिसके चौराहों पर
रेड लाइट मिले या न मिले पर
पर जिसमें जरुर मिल जायेगा रेड लाइट एरिया.

ऐसा महान समाज है हमारा
जिसमे सेक्स एजुकेशन की बात सुन
सोयी नैतिकताओं के प्रेत  जाग उठते है.
पर जिसके लोग अपने घरों में ब्लू फिल्मे देखने में
या सिनेमा हॉल  के सुबह की शो की शोभा बढ़ाने में
या नेट पर सुखद पोर्न का आनंद लेने में नही हिचकते.
कहते है गर्व से की भाई खजुराहो हो या
काम सूत्र , सब तो हमारी सभ्यता की ही देन है.

वर्जनाओं, कुंठाओं की चारदीवारों से घिरे
मनोरोगियों से भरे इस समाज में
लड़की होकर पैदा होना गुनाह है शायद.
जिस्म को छेदती भूखी निगाहों के इस युग में
लड़की होने का मतलब हर पल घुट कर मरना है.

सोच सकते हो तो सोच कर देखो किसी
बलात्कार की मासूम शिकार की व्यथा
तन, मन और आत्मा अनजान हो उठते है एक-दूजे से
 टुकड़े-टुकड़े हो जाता है  अस्तित्व
अपने शरीर से, अपनी लाचारी से, अपने आप से
घिन आती है, बोझ हो उठता है जीना.
मरना आसान लगता है, मुश्किल लगता है जीना.

हर एक बलात्कार के बाद
विश्वास घटता जाता है ईश्वर से
इंसानियत से, इंसान की अच्छाई से,
लगता है की ऐसे इंसान से तो पशु भले
मन में बर्बरता जागने लगती है
पंजे कसमसाने लगते है गला घोंट डालने को
उन हैवानों का जो मानवता को कलंकित कर रहे हैं
अपने पाशविक कृत्यों से.

मुझे उस सुसमय का इंतजार है जब खबरे आयेंगी की
लड़की ने बलात्कार का प्रयास करने वाले की जान ली.
बलात्कारी को दी गयी सरे आम  फांसी.
तबतक के लिए हमारा जेहाद जारी रहे-
बलात्कार के विरुद्ध.

निठारी

बच्चों!
किसी पर भरोसा न करना
सीखना होगा तुम्हे,
अगर तुम चाहते हो अपनी रक्षा.
भेडिये हर तरफ है इंसानों के भेष में.
सीखो हर बड़े पर अविश्वास करना,
पता नही उनमे कौन हो शैतान,
खूनी, बलात्कारी, नरपिशाच.

बच्चों!
अब बड़े बचपन से ही
तुम्हे छोड़ना होगा अपना बचपना,
अपनी मासूमियत, अपना भोलापन.
बड़ों की इस खतरनाक दुनिया में
जीने के लिए निहायत जरुरी है
बचपन से ही तुम्हारा बड़ा होना.

मंगलवार, नवंबर 17, 2009

मेरे ऑरकुट प्रोफाइल की शीर्ष पंक्तियाँ

***
लापता मेरी आँख का आंसू
तेरी आँखों में मैंने जब देखा
होठों में कैद कर लिया,
फिर गुमने ना दिया.
(दिसम्बर २००९)

***
सागर जैसी गहरी आँखों में नीली उदासी रहती है जो
आंसू की लहरों में ढलके गालों के तट पर बहती है. 
       (15 नवम्बर  2009)

***
वक़्त की शाख से कुछ फूल हमने तोड़े थे
तेरे जुड़े में लगाने को....
मगर कभी तुम ने वक़्त न दिया..
कभी वक़्त ने बेरहमी की.
         (नवम्बर 2009 )

***
मिटटी के दीयों से नही जायेगा अँधेरा
दिल का दिया जला सको तो रौशन रात हो.
        (17 अक्टूबर 2009 )

***
सारी दुनिया की सुधि पाई, पर मेरे भाई!
क्या सीखा गर प्रेम की पीड़ा समझ न आयी?
         (25 सितम्बर 2009 )

***
खुशियाँ लुटाता रहा, खुशियाँ मैं पाता रहा
खुशियाँ बटोरने में लग गया मैं जब से
खुशियाँ मुझसे भागती फिर रही है तब से.
       (05 जुलाई 2009 )

***
छलकी हुई आँखों को तेरे होठों ने जब छू लिया
वे आंसू, आंसू न रहे, मोती बने, लुढ़क पड़े.
     (०१ मार्च २००९)

***
अपने हाथों से बनाया है मुकद्दर अपना
अपने ही हाथों मिटा डालू तो मलाल नहीं.
       (17 मई  2009 )

***
जिन्दगी जब कभी आसान हुई
मैंने कुछ मुश्किलें उधार ली.
      (२२ फरवरी  2009 )

***
जिन्दगी इक अंतहीन तलाश है
तृप्ति चुल्लू-भर, समंदर प्यास है.

***
गुम गया हूँ आजकल यारों मैं कुछ इस कदर
की दिल से पूछा हूँ कहाँ, उसने कहा-पता नही?
      (15 नवम्बर 2009)
 

शनिवार, अक्तूबर 17, 2009

जला सको तो जलाओ दिल का दिया

रात कितनी काली है

कितनी खाली-खाली है.


रौशनी गुमती जाती जिन्दगी से

और तुम कहते हो दीवाली है.


जब कोई दिया यहाँ बुझता है

किसी कोने से बजती ताली है.


धन की देवी की ये तो पूजा है

पैसे वाले की ये दीवाली है.


चंद लोगों के हिस्से ऐश आयी सारी है

कितने लोगों के पेट आजकी रात खाली हैं.


रौशनी बढती जाती रोज है बाहर

और भीतर की दुनिया हुई स्याह काली है.


जला सको तो जलाओ दिल का दिया

तभी लगेगा की आज भी दीवाली है.

भारत बनाम इंडिया

संविधान कहता है हमारे देश को

इंडिया that is भारत

पर हम उस भारत के बाशिंदे हैं

जो इंडिया नहीं.




इंडिया और भारत के बीच की खाई

बहुत लम्बी है, चौडी है, बहुत गहरी है;

पर कौन सुने-

सरकार तो सरकार, जनता तक बहरी है.




भारत भूख से रोता है, ठण्ड से मरता है,

भारत डाल फंदा गले में आत्महत्या करता है;

भारत काम की तलाश में फिरता है मारा-मारा,

भारत हर तरफ से दुरदुराया जाता है बेचारा.




भारत गांवों में, स्लमों में बसता है,

भारत जहाँ भी हो, उसकी हालत खस्ता है;

इंडिया उसे देख नाक-भौं सिकोड़ता है,

घृणा से थूक उसपे, मुंह अपना मोड़ता है.




इंडिया की भाषा अंग्रेजी है, कल्चर विदेशी है,

इंडियन यहाँ का नही, अमरीका का देशी है;

इंडिया का पेट भरा है, पर उसकी भूख बड़ी है,

वहीँ भारत को हर वक़्त दो जून की रोटी की पड़ी है.




भारत इंडिया में खुद को अजनबी पाता है,

इंडिया का भारत से बस शोषक-शोषित का नाता है;

भारत का यह जीवट है की भारत अब तक जिन्दा है,

पर, अब भारत अपने भारत होने पर शर्मिंदा है.

बुधवार, सितंबर 23, 2009

ईश्वर,खुदा और GOD की भाषा (लघुकथा)

खुदा को उर्दू के सिवा कुछ न आता था, ईश्वर संस्कृत तो जानते ही थे, हिंदी भी धीरे-धीरे सीख गए थे और God तो अंग्रेजी छोड़ कुछ बोलते-सुनते ही न थे. पर प्रॉब्लम महसूस हो रही थी सबको धीरे-धीरे.

धरती पर धार्मिक एकता बढ़ रही थी, खुदा, God और भगवान के बन्दे एक हो रहे थे, आपस में घुल-मिल रहे थे.एक दिन उपरवालों ने भी सोचा की हम देवता लोगों को भी आपस में घुलना-मिलना चाहिए. सो एक दिन उपरवालों की मीटिंग शुरू हुई. अध्यक्षता का जिम्मा God को सौपा गया. सभा की शुरुआत हुई. God बोले-
"Good morning to all of You."
थोडा-सा भगवान को समझ में आया, थोडा खुदा से discuss कर के क्लिअर किया की कोई गाली-वाली तो नही दी गई है. God ने छोटी सी स्पीच दी, खुद बोले, खुद समझे.

ईश्वर की बारी आयी, वसुधैव कुटुम्बकम का नारा लगाया. धाराप्रवाह संस्कृतनिष्ठ हिंदी शुरू हुई. God परेशान, खुदा हैरान, खुदा थोडा-बहुत समझे.

खुदा आये, खुदाई की चर्चा शुरू हुई. ईश्वर को लगा की धरती पर कहीं खुदाई करवानी है, बैठे-बैठे ही बोले- हो जायेगा भाई, परेशान न हो. God बेचारे मुह ताकते हुए बैठे रहे.

सब समझ रहे थे की वो कुछ नही समझ रहे हैं, पर जता नही रहे थे. नारद जी भी उपस्थित थे सभा में, धरती पर मानवों के बीच घूम-घूम कर काफी शातिर हो चुके थे. उन्हें मानवों के प्रतिनिधि के रूप में विशेष तौर पर बुलाया गया था.वे उठे, अपनी करताल बजाते हुए मंच पर आये और फिर अपना भाषण शुरू किया-

"Dear God, प्यारे भगवान और सबसे आला खुदा! फिर उन्होंने संस्कृतमिश्रित हिंदी, अरबी-फारसी मिश्रित उर्दू और ब्रिटिश-अमेरिकी अंग्रेजी के मिले-जुले रूप में तीनों को संबोधित किया. God, ईश्वर और खुदा, तीनो के चेहरे खिले pade थे. वे ध्यानमग्न हो कर भाषिक सहिष्णुता पर नारद का भाषण सुन रहे थे. अपने भाषण के अंत में नारद जी बोले-

"धरती पर मानवों ने जगह-जगह अन्य भाषा-भाषी लोगों के लिए भाषा ट्रेनिंग सेंटर बनाये हैं. मुझे भी इन सेंटरों में पढने-पढाने का अच्छा-खासा अनुभव हुआ है . यदि आप लोग चाहे तो (तीनों के चेहरे को शातिर निगाहों से भाँपते हुए) मैं आपलोगों के लिए Language Learning Centre चला सकता हूँ.

खुदा, ईश्वर और God, तीनों के चेहरे इस प्रस्ताव पर गुब्बारों की भांति फूल उठे. अगले ही पल तीनों गुरु नारद के शरणागत थे. नारदजी गदगद हो मन-ही-मन अनुमान लगा रहे थे की तीनों से कितनी-कितनी फीस वसूली जा सकती है.

लेटेस्ट खबर है की नारद मुनि का लैंग्वेज लर्निंग कोर्स सुपर-डुपर हिट हो चूका है. ईश्वर आजकल कुरान पढ़ रहे हैं, God पुराण और अल्लाह बाइबल के अध्ययन में तल्लीन हैं. Dont Disturb Them, वे होशियार हो चुके हैं. अब उनके भक्तों की बारी है.

(July 2005 में )

सोमवार, सितंबर 21, 2009

ये दुनिया कैसी दुनिया है ?

इस दुनिया में फूल हुए कम कांटे ज्यादा हैं

फूल बचे हैं जो भी वो सब हारे-मांदे हैं |


अच्छे लोग बने हैं मानो प्राणी चिडियाघर के

और बुरे लोगों के हाथों पैने भाले हैं |


देखा है अच्छे लोगों को मैंने घुटते तिल-तिल

और बुरे लोगों के घर में खुशियाँ नाचे हैं


दुनिया बन गयी ऐसी जिसमें चांदी शैतानों की

और भले लोगों को उनकी जान के लाले हैं


कभी-कभी शक होता है क्या है कोई ऊपर में

या फिर उसकी आँखों पर मोटे-से ताले हैं


आश न खो दुनिया बदलेगी दिल ये कहता है.

देखे इस आशा पर कब तक हम जीनेवाले हैं

शुक्रवार, सितंबर 11, 2009

ओ माँ! तुम सुन रही हो ना!

ओ माँ!
मेरी आवाज सुनो
मैं तुम्हारी बगिया में
अन्खुवाता बिरवा हूँ
मत तोड़ने दो इसे किसी नादान को
मत रौंदने दो इसे किसी हैवान को.

ओ माँ!
पुरुष बेटे के जन्म पर
खुशियाँ मनाता है
तुम क्यों नही खुशियाँ मनाती
बेटियों के जन्म पर
क्या इतनी कमजोर हो तुम
की मेरे दुनिया में आने से
पुरुषों की इस दुनिया में
खुद को असुरक्षित महसूस करती हो?

ओ माँ!
भूलती क्यों हो यह बात
की गर्भ में तुम भी रही होगी एक दिन
पुरुषों के दवाब से झुककर
तुम्हारी माँ ने यदि गर्भ में ही
तुम्हारी हत्या होने दी होती,
तो क्या होता?
सृष्टि की आदिमाता ने यदि
लड़कियों की भ्रूण-हत्या होने दी होती
तो शायद मानव जाति कब की
लुप्त हो चुकी होती.

ओ माँ!
जबतक मैं सुदूर अनंत में थी
मैंने कुछ नही माँगा
मगर, अब जब मैं तुम्हारे गर्भ में हूँ
धरा पर जन्म लेना हक़ है मेरा
मेरे इस हक़ के लिए
तुम्हे लड़ना होगा उनसे
जो स्रष्टा नही हैं
मगर संहार में लगे हैं.

ओ माँ!
लड़की जनने की आशंका से
क्यूँ मुरझाई हो तुम?
क्या खुद पर विश्वास नही,
या मुझ पर विश्वास नहीं?
पुरुष बेटों पर गर्व करता है
तुम बेटियों पर गर्व करना सीखो माँ.

ओ माँ!
जिन्दगी पर सिर्फ बेटो का ही हक़ नही
बेटियों का भी हक़ है बराबर
जिन्दगी सिर्फ बेटों की ही बपौती नही
बेटियों की भी 'ममौती' है.

ओ माँ!
मैं दुनिया को देखना चाहती हूँ
मैं जिन्दगी को जीना चाहती हूँ
मैं उस समाज, उस मानसिकता
को बदलना चाहती हूँ
जो बेटियों की राह में
सिर्फ जिन्दगी-भर ही नहीं
वरन जिन्दगी के पहले भी,
जिन्दगी के बाद भी
नुकीले कांटे बिछाती रहती है.

ओ माँ!
हौसला रखो, विश्वास रखो
आशा रखो, उम्मीद रखो
और मुझे इस दुनिया में आने दो
मैं जन्मने से पहले नही मरना चाहती
तुम भी इस पाप में मूक सहमति
दे कर जीते जी न मरो.
अपनी आत्मा को, अपने अंश को
अपनी मुक्ति के इस मधुर गीत को
अपनी बेटी को न मरने दो.

ओ माँ!
तुम सुन रही हो ना?

(Written on 04 Feb 2004)

ईमान मर नहीं सकता

 आज के इस भयानक दौर में,
जहाँ ईमान की हर जुबान पर
खामोशी का ताला जडा है.
चाभी एक दुनाली में भरी
सामने धरी है ,

फ़िर भी मैं कायर न बनूँगा
अपनी आत्मा की निगाह में
फ़िर भी मैं, रत्ती भर न हिचकूंगा
चलने में ईमान कि इस राह पे।

मैं अपनी जुबान खोलूँगा
मैं भेद सारे खोलूँगा-
(बेईमानों- भ्रष्टाचारियों की
काली करतूतों के )
मैं चीख-चीख कर दुनिया भर में बोलूँगा-
ईमानदारी सर्वोत्तम नीति है।

मैं जानता हूँ कि परिणाम क्या होगा-
मेरी जुबान पर पड़ा खामोशी का ताला
बदल जाएगा फांसी के फंदे में
और फंदा कसता जायेगा-
भिंच जायेंगे जबड़े और मुट्ठियाँ
आँखें निष्फल क्रोध से उबलती
बाहर आ जाएँगी
प्राण फसेंगे, लोग हसेंगे
पर संकल्प और कसेंगे.

देह मर जायेगा मगर
आत्मा चीखेगी, अनवरत, अविराम-
''ईमान झुक नहीं सकता,
ईमान मर नही सकता,
चाहे हालत जो भी हो जाये,
ईमान मर नही सकता,
ईमान मर नही सकता.
-2004 -

(स्वर्णिम चतुर्भुज योजना में भष्टाचार को उजागर करने पर जान से हाथ धोने वाले 'यथा नाम तथा गुण' सत्येन्द्र डूबे तथा ईमान की हर उस आवाज को समर्पित जिसने झुकना गवारा ना किया बेईमानी के आगे. )

मंगलवार, सितंबर 08, 2009

दुनिया को कह दो की गाँधी को अंग्रेजी नहीं आती

आजादी की पूर्वसंध्या में
एक महान मनीषी आत्मा ने
दुनिया के बहाने अपने देशवासियों को पैगाम दिया था
भाषिक गुलामी की केंचुले उतार फेंकने को
उनके देशवासी गुलामी की केंचुल निकालने की आधी-अधूरी कोशिश में,
आज तक अंग्रेजी की खूंटी से उल्टे टंगे हैं.
मामला क्या है?
केंचुल है कि उतरती ही नही
या कि केंचुल के अन्दर का प्राणी
केंचुल से बाहर आना ही नहीं चाहता.

गाँधी के लिए मातृभाषा माँ-जैसी थी
कहा था गाँधी ने की माँ जैसी भी हो
बच्चे को जीवनदायी अमृत माँ से ही मिलता है
पर हमारी बोतलबंद दूध पर पली पीढी को
माँ के दूध के स्वाद और मातृभाषा की मिठास का क्या पता
बोतलबंद दूध की तरह बोतलबंद भाषा भी
समा चुकी है हमारी नस-नस में
(क्षीण करती हुई हमारी जीवनीशक्ति को)

सुना है की दो सगे भाइयों को
विदेशी भाषा में बाते करते सुन मर्माहत हुए थे गाँधी
कहा था की जिस देश के लोग इस कदर मानसिक गुलाम हों
उस देश को आजादी मिलकर भी क्या खाक मिलेगी?
और आज हमारे आजाद भारतवर्ष में ये आलम है
की माँ-बाप अपने छोटे बच्चों के सामने
अपनी भाषा में नही अंग्रेजी में बातें करते हैं
ताकि अनायास ही सीख सके बच्चा फर्र-फर्र अंग्रेजी
अपनी भाषा में वो हकलाता हो तो भी कोई बात नही.

अंग्रेजी से कोई शिकायत नही थी तुम्हे गाँधी
काफी अच्छी अंग्रेजी आती थी तुम्हे
तुमने तो कही थी ये बात इसलिए
की लोग अंग्रेजी जाने पर अंग्रेज न बने
तुमने तो चाहा था गाँधी कि
सारा भारत अपनी-अपनी भाषाओँ में बात करे
और हिन्दुस्तानी सारी भाषाओँ के मोतियों को
धागे की तरह पिरो कर रखे एक माला में
पर किसने सुनी तुम्हारी गाँधी, किसने सुनी?
तुम्हारे विचारों की हत्या करने वाले हर शख्श ने यही कहा-
मैं तो गाँधी का पुजारी हूँ, मैंने गाँधी को नही मारा!

गाँधी, तुम कितना पीछे छूट गए हो
भारत कितना पीछे छूट गया है
इंडिया की हैरतंगेज रफ्तार तो देखो
तीन पीढियों में चाल-ढाल ही नही जुबान भी बदल गई है इसकी
गाँधी, तुम होते तो दीवारों से सर फोड़ लेते अपना
हम भी हैं की दीवारों पर सर पटक रहे हैं
उम्मीद है कि इस बार सर नही फूटेगा, दीवार टूटेगी
केंचुल जो अब तक अटकी पड़ी है, इस बार छूटेगी.
(गाँधी, नाउम्मीद न हो, भारत मरा नहीं, जिन्दा है!)

शुक्रवार, सितंबर 04, 2009

कितनी भाषाओँ से कितनी बार

कितनी भाषाओँ से कितनी बार
गुजरते हुए मैंने जाना है की
हर भाषा संजोये होती है
एक अलग इतिहास, संस्कृति और सभ्यता
की हर भाषा में उसके बोलने वालों की हर
ख़ुशी और गम का सारा हिसाब-किताब मौजूद होता है.

हर वो भाषा जो और भाषाओँ को मानती है बहन
और नही रखती उनकी प्रगति से कोई डाह-द्वेष
उनको आकर छलती है कोई साम्राज्यवादी भाषा
कहती है की अब इस भाषा में नए समय को
व्यक्त नही कर सकते, पर चिंता क्यूँ है, मैं हूँ ना!

और धीरे-धीरे इक भाषा दूसरी भाषा को
अपनी गुलामी करने को मजबूर करती है
उनको छोड़ देती है उन लोगों के लिए
जिनके मुख से अपना बोला जाना उसे नागवार है
आखिर मजदूरों, भिखारियों, आदिवासियों,
बेघरों, वेश्याओं, यतीमों, अनपढों या एक शब्द में कहे
तो हाशिये पर जीने वालों के लिए भी तो कोई
भाषा होनी चाहिए ना?

कितनी भाषाओँ से कितनी बार गुजरते हुए महसूसा है मैंने
कितनी ममता होती है हर एक भाषा में
कितनी आतुर स्नेहकुलता से अपनाती है
वो हर उस बच्चे को जो उसकी गोदी में
आ पहुंचा है बाहें पसारे, बच्चा-
जिसे अभी तक तुतलाना तक नही आता नयी भाषा में.

कितनी भाषाओँ से कितनी बार गुजरते हुए
मैंने महसूसा है की भाषा कभी भी
थोपकर नही सिखाई जा सकती,
जबतक अन्दर से प्रेम नही जागा हो,
भाषा जुबान पर भले चढ़े, दिल पर नही चढेगी.

कितनी भाषाओँ से कितनी बार गुजरते हुए
देखा है मैंने की सत्ता और बाजार ने
हर बार कोशिश की है, और अब भी कर रहे हैं
भाषा को अपना मोहरा बनाने की
पर भाषा है की हर बार आम आदमी के पक्ष में
खड़ी हो गयी इस बात की परवाह किये बिना
की कौन खडा है सामने.

कितनी भाषाओँ से कितनी बार गुजरते हुए
जाना है की संवाद चाहती है भाषाएँ
भाषाओँ को बोलनेवाले लोग
भाषाओँ में लिखने वाले साहित्यकार
एक-दुसरे से
पर भाषा की राजनीति करने वाले
नही चाहते ऐसा और खडा कर देते है
सगी बहन जैसी भाषाओँ को एक-दुसरे के विरूद्व
उनकी मर्जी के खिलाफ.

भाषाओँ के साथ दिक्कत यही है
की हर भाषा में चीखता हुआ इन्सान
सबसे दूर तक सुना जाता है
और अच्छे इंसानों की खामोशी बस उन्ही तक
सिमट कर रह जाती है.
भाषा को बचाए रखने के लिए
भाषा में अच्छे इंसानों की चीख अब बहुत जरुरी है.

रविवार, अगस्त 16, 2009

इश्क का फ़लसफा

इश्क में मंजिल आसान नही होती
काश की तुम इससे अनजान नही होती।

इश्क तो भूलभुलैयाँ है देह और मन की
किधर है प्रेम,किधर वासना,पहचान नही होती।

इश्क तो फूल है कमल का जिसकी आभा
पंक में वासना के रहके भी म्लान नही होती।

पंख होंगे वासना के, इश्क के तो पाँव होते हैं
तुम भी ये जान लो की इश्क में उड़ान नहीं होती।

इश्क तो बंदगी है, सादगी में पलता है
इश्क सच्चा है वही जिसमे झूठी शान नही होती।

शमा के इश्क में जलता हुआ परवाना सुनो कहता है
इश्क में जान जो देती हैं, वो नादान नहीं होती।

इश्क का फ़लसफा समझा तुमने गर होता
जान जाती की यूँही बुलबुलें कुर्बान नहीं होतीं.

मंगलवार, अगस्त 04, 2009

उदासी- सी- उदासी

* जिस उदासी की कोई वजह ढूंढे न मिले
वो उदासी कितनी उदास होती है।

*खुशियों के पीछे भागता रहा तमाम उम्र
जब भी रुका देखा उदासी मेरे साथ थी।

*आँसुओं के एक समंदर में
लहरे गहरी उदासियों की
अवसाद के तट पर
सर पटक कर बार- बार
लौटती मझधार में।

*उदास सुबह ने कहा- उदास मत होना
उदास शाम ने कहा - उदास मत होना
उदास दुनिया ने कहा -उदास मत होना
मैंने हलके से मुस्का के कहा सबसे-
ओढी हुई खुशी से शालीन उदासी कहीं भली।

*लोग मुझसे पूछते हैं मेरी उदासी का सबब
मैं जरा मुस्कुरा के कहता हूँ-'कहाँ उदास हूँ मैं-
वो तो बस यूँ ही तबियत जरा नासाज सी है।
लोग सुनकर बड़ी अदा से सर डुलाते हैं,
मुझे लगता हैं मेरे चेहरे से मेरा राज भांप जाते हैं।

*तेरी चमकती उदास आँखें,
तू हंसेगा तो रो देंगी,
तेरे आंसुओं से धुलकर
तेरा चेहरा खिल उठेगा.

सोमवार, जुलाई 06, 2009

ममता का पेड़

ममता के पेड़ की छाया तले
मैंने जीवन गुजारा ग़मों से परे
मैंने सीखा लुटाना प्रेम सबों पर
मैंने सीखा लगाना स्नेहलेप ग़मों पर
मन में मेरे तमन्ना यही है बसी-
मैं भी ममता का पेड़ हो सकूँ एक दिन.

रविवार, जुलाई 05, 2009

इश्क करके देख

इश्क करके देख रूह आजाद होगी
इश्क करके देख रोशन ये कायनात होगी
इश्क करके देख खुशनुमा हयात होगी
इश्क करके देख, इश्क ही हर बात होगी.

प्रेम का सच-झूठ

(मन्नू भंडारी जी और उनकी कहानी 'यही सच है' को समर्पित)

प्रेम में हम कह नही सकते
यही सच है और वह है झूठ
बस यही कह सकते की या तो
सभी सच है या सभी है झूठ.

प्रेम पाखी के परों में
एक पर है सुख असीम
और दूजा पर है उसका
वेदना निस्सीम.

प्रेम का है एक पहलु
सहज, साम्य,निर्विकार,
और उसका दूजा पहलू
वासना-तृष्णा का ज्वार.

प्रेम सागर की सतह पर
मन लहर बन डोलता बैचैन होकर
वहीँ गहराई में उसकी
मुक्त आत्मा शांत है सब अहम् खोकर.

प्रेम का जो सच है
सच वो जिन्दगी का भी
प्रेम के जो संशय
संशय वे जिंदगी के भी.

प्रेम में पाना नही कुछ
प्रेम में खोना नही कुछ
प्रेम में बस प्रेम का विस्तार
ही होता है सबकुछ.

मज़बूरी का नाम महात्मा गाँधी

पता नही कब से मज़बूरी का
नाम महात्मा गाँधी है
हर मुश्किल में हर बेबस की
ढाल महात्मा गाँधी है.

अक्सर इस जुमले को सुनते-
सुनते मन में आता है -
गाँधी जी का मज़बूरी से
ऐसा भी क्या नाता है?

ऑफिस की दीवारों पर
गाँधी की फोटो टंगी-टंगी
बाबुओं का घूस मांगना
देखा करती घडी- घडी

चौराहों- मैदानों में
बापू की प्रतिमा खड़ी- खड़ी
नेताओं के झूठे वादे
सुनती विवश हो घडी-घडी

गाँधी का चरखा, गाँधी की
खड़ी आज अतीत हुई,
गाँधी के घर में ही देखो
गोडसे की जीत हुई.

गाँधी जी की हिन्दुस्तानी
पड़ी आज भी कोने में,
गाँधी के प्यारे गांवों में
कमी न आयी रोने में.

नोटों पर छप, छुपकर गाँधी
सब कुछ देखा करते हैं
हर कुकर्म का, अपराधों का
मन में लेखा करते हैं.

गाँधी भारत का बापू था,
इंडिया में उसका काम नही,
मज़बूरी के सिवा यहाँ होठों पर
गाँधी नाम नही.

इतना कुछ गुन-कह-सुन मैंने
बात गांठ यह बंधी है-
गाँधी होने की मज़बूरी का ही
नाम महात्मा गाँधी है.

शनिवार, जून 20, 2009

प्रेम अकेला कर देता है

प्रेम अकेला कर देता है
दिल में पीड़ा भर देता हैं
कुछ खोने का डर देता है
खामोशी को स्वर देता है
नयनो में जल भर देता है
दुनिया बदल कर धर देता है
प्रेम अकेला कर देता है।

केरल- चंद क्षणिकाएँ

*घर से इतनी दूर आया, मन था दुखी- दुखी
केरल की पहली बारिश में भीगा, हुआ सुखी

*भाषा नई -नई है, है परिवेश नया-नया
लोग मुखर हैं बहुत और मेरा मौन नया-नया
एक पुरानी चीज साथ जिसने ना छोड़ा है
बस एक तन्हाई है जिसने मुख ना मोड़ा है.