शनिवार, अक्तूबर 17, 2009

जला सको तो जलाओ दिल का दिया

रात कितनी काली है

कितनी खाली-खाली है.


रौशनी गुमती जाती जिन्दगी से

और तुम कहते हो दीवाली है.


जब कोई दिया यहाँ बुझता है

किसी कोने से बजती ताली है.


धन की देवी की ये तो पूजा है

पैसे वाले की ये दीवाली है.


चंद लोगों के हिस्से ऐश आयी सारी है

कितने लोगों के पेट आजकी रात खाली हैं.


रौशनी बढती जाती रोज है बाहर

और भीतर की दुनिया हुई स्याह काली है.


जला सको तो जलाओ दिल का दिया

तभी लगेगा की आज भी दीवाली है.

1 टिप्पणी:

Rewa Smriti ने कहा…

चंद लोगों के हिस्से ऐश आयी सारी है
कितने लोगों के पेट आजकी रात खाली हैं.

Kafi achhi lagi aapki kavita. Vyastatavash bus tipanni nahi kar pa rahi thee.

Kash log is vishay per soch kuch karne ki koshish karte, yahan to her ek dhapati ki ghar dhanteras ki barati hai!