शुक्रवार, मार्च 15, 2013

ग़ज़ल - आजतक कदर न की पैसे की


 
आजतक कदर न की पैसे की |

और कहता रहा-तेरी ऐसे की, तैसे की ||

 

दुनिया देख-देख के सर धुनती है |

क्या करे समझ का मुझ जैसे की ||

 

बीन बजा-बजा के लोग हार गए |

समझ में आए तब ना कुछ भैंसे की ||

 

दुनिया जलती है बहुत, मेहनत देखती है नहीं |

पूछती फिरती है, ‘इतनी तरक्की कैसे की’ ?

 

मुस्कानें बांटीं, गम बटोरे और चलते रहे |

जिन्दगी हमने अपनी गुजर-बसर ऐसे की ||

समंदर का गीत

समंदर आज भी वही गीत गाता है
जो उसने पहली बार गाया था
जब वो अस्तित्व में बस आया था |

समंदर की रेत के हर कण
और समंदर का हर जड़ -चेतन
मिलेंगे तुम्हें उसी आदिम गीत में मगन |

फिर इसमें अचरज क्यूँ हो कि
समंदर जब भी लहरों के सुर में गाता है
हर सुनने वाला गीतमुग्ध रह जाता है |

२१-७-२०११