शुक्रवार, मार्च 15, 2013

ग़ज़ल - आजतक कदर न की पैसे की


 
आजतक कदर न की पैसे की |

और कहता रहा-तेरी ऐसे की, तैसे की ||

 

दुनिया देख-देख के सर धुनती है |

क्या करे समझ का मुझ जैसे की ||

 

बीन बजा-बजा के लोग हार गए |

समझ में आए तब ना कुछ भैंसे की ||

 

दुनिया जलती है बहुत, मेहनत देखती है नहीं |

पूछती फिरती है, ‘इतनी तरक्की कैसे की’ ?

 

मुस्कानें बांटीं, गम बटोरे और चलते रहे |

जिन्दगी हमने अपनी गुजर-बसर ऐसे की ||

2 टिप्‍पणियां:

Rajendra Kumar ने कहा…

बहुत ही सुन्दर प्रस्तुति,आभार.

raj sha ने कहा…

कट गई, समझ ही नहीं आई
जिंदगी बसर, ऐसे वैसे जैसे तैसे की