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जिन्दगी, तेरी कमी खलती है

जिंदगी अपनी राह चलती है । तमन्नाएं  यूं ही बस मचलती है ॥  आस से प्यास कभी बुझती नहीं ।  उम्रभर मृगमरीचिकाएं  छलती हैं ॥  दौर ऐसे बहोत आते हैं जहाँ ।  जिंदगी, तेरी कमी खलती है ॥  काश ऐसा अगर हुआ होता ।  सोचकर, हसरतें हाथ मलती  हैं ॥  बस में जो है, कसर नहीं रक्खी ।  क्या करे गर, होनी टाले नहीं टलती है ॥  लाख कोशिश से भी जहां दाल नहीं गलती है ।  वहां भी उम्मीद की एक लौ जरूर जलती है ॥  खुदा धरती का हाल देख सोच पड़े ।  क्या इंसान बनाना बड़ी गलती है ॥  देर हो सकती है, अंधेर नहीं  ।  दुआएं सच्चे दिल की जरूर फलती हैं ॥  पाखी घर लौट रहे, चलो 'केशव' ।  कि सुरमई स्याह शाम ढ़लती है ॥ 

एक बलात्कारी दिन

    एक बलात्कारी दिन, आया, आके बीत गया | रोया ख़बरें सुन-सुन कर, मन मानों रीत गया ||   बच्चियों तक को न बख्शा इन वहशी दरिंदों ने | खुदा शायद हार गया, शैतान जीत गया ||   छीन ली कुछ मासूमों की मुस्कान सदा के लिये | खिलखिलाहटें थमीं और जीवन-संगीत गया ||   सत्ता के कानों पे जूं तक नहीं रेंगी | औरत का कोई नहीं, ऐसा परतीत गया ||   जनता का गुस्सा भी क्षणिक-सा उबाल है | नारे लगे, कैंडल जले और लावा रीत गया ||   ---केशवेन्द्र---

ग़ज़ल - आजतक कदर न की पैसे की

  आजतक कदर न की पैसे की | और कहता रहा-तेरी ऐसे की, तैसे की ||   दुनिया देख-देख के सर धुनती है | क्या करे समझ का मुझ जैसे की ||   बीन बजा-बजा के लोग हार गए | समझ में आए तब ना कुछ भैंसे की ||   दुनिया जलती है बहुत, मेहनत देखती है नहीं | पूछती फिरती है, ‘इतनी तरक्की कैसे की’ ?   मुस्कानें बांटीं, गम बटोरे और चलते रहे | जिन्दगी हमने अपनी गुजर-बसर ऐसे की ||

जरा पतझड़ में डरा होता हूँ

सूख जाता हूँ, हरा होता हूँ ! जरा पतझड़ में डरा होता हूँ !! जब तलक कोपलें नयी नहीं आ जाती हैं ! तन से जिन्दा, मगर, मन से मरा होता हूँ !! दौड़ती-नाचती फिरती हुई दुनिया के बीच ! मैं अपनी जगह पर ही ठहरा होता हूँ !! बीते कल में चिड़ियों की चीं-चीं सुख देती थी ! आजकल मोटरों की पीं-पीं से बहरा होता हूँ !! दाना चुगने को जाती है चिड़िया तो दुआ करता हूँ ! और फिर उसके लौटने तक, बैचैन मैं जरा होता हूँ !! चिलचिलाती धूप में मेरी छाँव सुकून देती है ! मैं झुलसाती धूप में हरियाली का आसरा होता हूँ !! एक दिन मुझे भी ले डूबेगा लोभ इन्सां का! पेड़ों पे कुल्हाड़ियाँ चलती देख, मैं अधमरा होता हूँ!! किसी को छाँव, घर किसी को, किसी को लकड़ी ! खुश हूँ कि, मैं कितनों का सहारा होता हूँ !! जड़ें तलाशती फिरती हैं पानी पथरायी मिट्टी में ! धरती के सीने से चिपक, मैं और गहरा होता हूँ !! लाख पतझड़ करे कोशिश मुझे सुखाने की ! बसंत आते ही मैं, मुसकरा के हरा होता हूँ !!

तू मेरा आईना है, मैं तेरी परछाईं हूँ

तू मेरा आईना है, मैं तेरी परछाईं हूँ / तू कभी मुझमें, कभी तुझमें मैं समाई हूँ // तू मेरे दिल के कितने पास-पास रहता है / तुझसे ये पूछने बड़ी दूर से मैं आई हूँ // न छोड़ने कि कसमें खा के जिसको पकड़ा था / वही मैं यार कि छूटी हुई कलाई हूँ // उसे खबर न हुई जिसके लिए फफ़क के बही / यारों, मैं इस जहाँ कि सबसे बेबस रुलाई हूँ // खुशियों के लिबास से आंसूओं के तन,दर्द के बदन को ढके / मैं किसी गुमनाम शायर की सबसे करुण रुबाई हूँ //

क्या कभी साहिर को भूली अमृता

जिन्दगी में आ गयी है रिक्तता मन में फैली कैसी है ये तिक्तता. प्रेम में इस कदर अँधा हो गया दुनिया से है हो गयी अनभिज्ञता. जी रहा हूँ अतीत में मैं इस कदर की देखता हूँ भविष्य, दिखती शून्यता. शिथिल तन में मन हुआ है बदहवास खुशमिजाजी में हुई है न्यूनता. एक दोराहे पे आ ठिठका खड़ा हूँ एक तरफ है प्रेम दूजे पूर्णता. जिन्दगी में आ गया इमरोज, फिर भी क्या कभी साहिर को भूली अमृता?

किसी सोये हुए को कस के झिंझोड़ा नहीं करते

यूँ बैचैन होके न आने वालों की बाट अगोरा नही करते रूठा बालम जो लौट आये तो यूँ मुंह मोड़ा नही करते. किसी भी हाल में ना मानने की जिद हो जिसकी वैसे इन्सान से कभी भी निहोरा नही करते. कोई प्यारा सा सपना बेरहमी से टूट जाता है किसी सोये हुए को कस के झिंझोड़ा नहीं करते. कि जिन बातों से अपनी शर्म के परदे उघरते हो वैसी बातों का शहर भर में ढिंढोरा नही करते. बदन और रूह जैसे जुड़ चुका हो जब कोई जोड़ा किन्हीं पंचायतों के कहने से उनका बिछोड़ा नही करते.

आम की ख्वाहिश लिए बबूल बोता आदमी

कपड़ों के हिसाब से फिट होता आदमी खुद की अर्थी, खुद के कांधे ढ़ोता आदमी. मरियल रिक्शेवाले का कचूमर निकालते गालियाँ बकता जा रहा था मोटा आदमी. जितने खरे आदमियों के उठाये हैं मुखौटे हंस के अन्दर से निकला है खोटा आदमी. देखो जिधर भी, मिल जायेगा  तुम्हें उधर आम की ख्वाहिश लिए बबूल बोता आदमी. हर आँख से हर आंसू पोछे कैसे कोई भला जिधर देखो उधर मिलेगा कोई रोता आदमी . चेहरे के जंगल में भावनाएं लुप्तप्राय हैं रोबोटों सा दिखने लगा है मशीन होता आदमी. इतनी अँधेरी रात में भी कोई दिया जल रहा नींद में मुस्कराया है सपने संजोता आदमी .

जब कबीर सा कोई फक्कड़ लिखे ग़ज़ल

बहुत दिनों से लिख नहीं पाया कोई भी ग़ज़ल तन्हाई में लिख ना डालूं कोई रोई-सी ग़ज़ल दुनिया की तेज धूप में कुम्हलाये अहसासों के पौधे आह! कितनी मेहनत से मैंने बोई थी ग़ज़ल जब कबीर सा कोई फक्कड़ लिखे ग़ज़ल दिल की भूख मिटाती है वो लोई-सी ग़ज़ल दुनिया की गंदगी ने हर बार दिक दिया चाहा तो था लिखना गंगाज़ल से धोई-सी ग़ज़ल चाहा था ऐसी ग़ज़लें हों, झकझोर डाले दुनिया को अफ़सोस की अब तक लिखी सब सोई-सी ग़ज़ल

मंजिल मिलती है तो सफ़र खोता है

ऐसा ही दस्तूरे जमाना होता है मंजिल मिलती है तो सफ़र खोता है. एक और एटम  बम पर हो खर्च करोड़ों और दूसरी और भूख से शिशु रोता है. नेताओं में अद्भुत भाईचारा होता है एक लगाता कालिख है, दूजा धोता है. हाथ लगेगी सिर्फ  हताशा ,मिलेंगे ग़म कोरे सपनों की फसलें जो बोता है. संतुष्टि के मोती हासिल होते हैं उनको ही खतरों के सागर  में लगाते जो गोता हैं. नेताओं-अफसरों आओ फसल काट लो मर-मर के खेतों को मैंने जोता है. आँखें बरसी, पानी की जब बूँद ना बरसी, टूट पड़ा ,खेतों को जिसने मर-मर कर जोता है. जीवन के हर दर्शन को रट कर के भी जीवन को जो ना समझे वो तोता है.

तुममे देखा, हम ही हम है

हंसी ओंठ पर आँखें नम है! हंसकर रोने का मौसम है!! सारी यादों को पछाड़ कर! सबसे ऊपर तेरा ग़म है!! खुदा सुखी है इस दुनिया से! दुखी बचे तो केवल हम है!! ताल ठोककर खड़े है हम भी! देखे दुनिया में कितना दम है!! इश्क के पागलपन का ये आलम! तुममे देखा, हम ही हम है!!

ऐसी भी क्या कमी दिखी, मौला इस दीवाने में

एक ही चर्चा छेड़ा करते हैं अपने हर गाने में ! दर्द मिला मुझे ज्यादा तेरे आने में या जाने में !! एक ही तेरा ग़म था जिसको कहते रहे अफ़सानों में! इक अपना जो बिछड़ा उसको ढूंढा हर बेगाने में !! ग़म-ही-ग़म पाकर अब रब से पूछा करते हरदम हम! ऐसी भी क्या कमी दिखी, मौला इस दीवाने में !! चैन से हम मर भी ना पाए, ओ संगदिल, तू ये तो बता! काहे इतनी देर लगा दी, जालिम तूने आने में!! खुद को पाना हो या खुदा को, इश्क की आग में जलके देख! शमा के इश्क़ में जलते-जलते यही कहा परवाने ने!! दिल की रस्साकस्सी में ना मालूम था ऐसा होगा! दिल की रस्सी ही टूट गयी इक-दूजे को आजमाने में!! तुमको खोने की चिंता में जीते जी कई बार मरा! पर खो डाला तुझको मैंने शायद तुझको पाने में!!

दिल फिर से उम्मीदों की फसल बो गया है

साथियों, आपकी खिदमत में पेश है मेरी शुरुआती गजलों में एक ग़ज़ल. वर्ष 2004  में जब मैंने ग़ज़ल विधा पार हाथ आजमाने की शुरुआत की थी, तो उस समय की लिखी हुई ये छठे नंबर की ग़ज़ल है. ग़ज़ल में मामूली सा संसोधन किया है और कुछ नए शेर आज की रात में जोड़े हैं. शेर संख्या 3-8  नए हैं, आज के लिखे हुए हैं. बाकी शेर पुराने हैं और मार्च 2004 के लिखे हुए हैं. आपसे मिला हूँ कुछ इस कदर , जिन्दगी का चैन खो गया है सब कुछ तो है चैन से, बस दिल जरा बैचैन हो गया है. (१) वो जो फूल है गुलाब का, काँटों के संग खुश था और झरते-झरते विरह में दो बूँद आंसू रो गया है. (२) माँ के हाथ नींद में भी झूले को हैं झुला रहे   लोरी सुनते-सुनते बच्चा सो गया है . (3) अब गिले-शिकवा मिटा के, उसको लगा लो गले जो आंसुओं  से दिल के दाग-धब्बे  धो गया है. (4) कचरे से कुछ बीन कर खाते हुए भिखारी ने कहा भला  हो ऊपरवाले  का कि पेट में कुछ तो गया है. (5) लौट कर वो आ ना सका, राहे सारी बंद थी लक्ष्मण रेखा पार कर के जो गया है. ...

जिन्दगी से जी अभी तक भरा नही

जिन्दगी से जी अभी तक भरा नही मायने ये है के मैं अब तक मरा नही जिस शाख से पतझड़ में पत्ते न झड़े वो शाख बसंत में था हरा नही दुनिया दुश्वार कर देगी जीना अगर कहते रहे तुम जरा हाँ, जरा नही. ईमानवालों की बातें ना सुनो कहते हैं, ईमानदारी में कुछ धरा नही खुद को जिन्दा समझ तभी तक 'केशव' जबतक कि दिल किसी से डरा नही

इक सोते हुए शहर में जागता हुआ मैं

इक सोते हुए शहर में जागता हुआ मैं! खुद के पीछे तो कभी खुद से भागता हुआ मैं!! हर इक जगह तलाशा पर मालूम ना चला! की किस जगह पे आकर के लापता हुआ मैं!! चाहा बहुत है पर अब तक चाहत फ़क़त चाहत ही है! कि देखूं किसी को खुद को चाहता हुआ मैं!! इन आँधियों को मेरे घोंसले से न जाने कितना प्यार है! इन आँधियों पे हूँ हंस रहा तिनके बटोरता हुआ मैं!! लोग सारे सो चुके, रोशनियाँ अधजागी हैं और! विरहा की आग में जल रहा तेरी बाट अगोरता हुआ मैं!!

स्वर्णमृग

पूरा जग ही माया है कोई पार ना पाया है रूप के पीछे हम भी, तुम भी इसने जग भरमाया है जूते घिसे, घिस गए तलवे कुछ भी हाथ ना आया है जिसके पीछे अबतक थे हम देखा केवल साया है अन्दर क्या है देखा किसने दिखती केवल काया है जब भी हमने देखा उसको देखा वो शरमाया है देखा आज जिसे फूल सा खिला देखा कल कुम्हलाया है उसको जब भी हँसते देखा खुद को बेखुद पाया है हरदम मेरे साथ चला कोई देखा उसका साया है खुद को जब भी तन्हा पाया उसको पास ही पाया है चाहे जितनी कड़ी धूप हो सर पे उसका साया है चाहूँ भी तो छूट ना सकता ऐसा फांस फंसाया है आई मन में उसकी ही छवि जब भी कोई याद आया है खोया है हम ने सब कुछ तब जाकर खुद को पाया है उसकी आँखों में जो झाँका अपना अक्स ही पाया है दोराहे पर ठिठका खड़ा हूँ वक़्त कहाँ हमें लाया है याद साथ तेरी, कलम हाथ मेरे जीवन पन्नों पर छितराया है रहो जहाँ भी, रहो खुश सदा दिल ने ये फ़रमाया है अब मैं हूँ और कलम संग है शब्द मेरा सरमाया है. (24 अप्रैल 2003 )

Ek Sher Apna, Ek Paraya-3

एक अरसे के बाद फिर से मन किया है की उस्तादों के रदीफ़-काफिये की कसौटी पर फिर से जोर-आजमाइश की जाई. तो लीजिए, मीर साहेब का एक शेर और उसी की तुक-ताल में मेरा प्रयास प्रस्तुत है.( 28 Jan 2010) ******** इश्क हमारा आह ना पूछो क्या-क्या रंग बदलता है! खून हुआ दिल दाग हुआ फिर दर्द हुआ फिर गम है अब!! ---मीर--- दुनिया की इस अंधी दौड़ में सब कुछ तो हासिल है हमें! फिर भी बैठ के सोचा करते,क्या ज्यादा,क्या कम है अब!! ---keshvendra---     ********   तुम नही पास, कोई पास नहीं! अब मुझे जिन्दगी की आस नहीं!! साँस लेने में दर्द होता है! अब हवा जिन्दगी की रास नहीं!! -------जिगर बरेलवी---- इस निगोड़ी जाम से जो बुझ जाये! ऐसी ओछी हमारी प्यास नही!! मेरी खुद्दारी को ललकारो नही! ये किसी के पैरों तले की घास नहीं!! ------केशवेन्द्र------   *********   दिल धड़कने से खफा है और आँखें नम नहीं! पीछे मुडके देखने की यह सजा कुछ कम नहीं!! -----शहरयार------ तेरे हुश्न की खुशबू से जुट जायेंगे भँवरे कई नए! देखना उस भीड़ में सब होंगे, होंग...

एक शेर अपना एक पराया-२

साथियों, लो फिर से मैं आप लोगों की सेवा में हाजिर हूँ एक शेर अपना, एक पराया की दूसरी कड़ी लेकर. प्रयास कैसा लगा बताना मत भूलियेगा. आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतजार रहेगा.   ********* जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा कुरेदते हो जो राख जुस्तजू निहाँ क्या है .....ग़ालिब........ खरोंचे जो दिल पे लगते है कभी नही भरते जो खोजते हो जिस्म पे निशाँ तो वहाँ क्या है ....केशवेन्द्र....... ******* घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर ले किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाये =====निदा फाजली===== कांटे में फंस के तड़पती हुई मछली बोली ऐ खुदा! इस तरह ना किसी को फंसाया जाये. ------keshav------     ******** पूछते हैं वो कि ग़ालिब कौन है कोई बतलाये कि हम बतलाये क्या...... ग़ालिब जो उनने पूछा कि कितना प्यार करते हो तबसे हैं इस सोच में कि जतलाये क्या हम हनुमान नही इसका ही जरा गम है वरना कहते कि दिल चीर के दिखाए क्या.... केशवेन्द्र   *********     मुद्दतों से न हमें तेरी याद आई है और हम भूल गए है तुझे ऐसा भी नही....Firak ...

तूने चोट दी है ऐसे, जैसे डंक हो बिच्छू के

खुशबू का एक झोंका, आया है तुझको छू के! आँखों से एक आंसू, छलका, गिरा है चू के !! झगडे के बाद बीबी-मियां, बैठे हैं गुमसुम से ! याद आ रहे दिन प्रेम भरे, उनको हैं शुरू के!! कैसा सुकून मिलता है, कहने में नही आता! बुजुर्गों की दुआ लेते हुए, उनके पाँव छू के!! छूटी है पाठशाला, मगर अब भी ये लगता है! सर पर बने हुए है हाथ, अब भी मेरे गुरू के !! सीने में कितना दर्द है, ये मुझको ही है मालूम! तूने चोट दी है ऐसे, जैसे डंक हो बिच्छू के!! कुछ रिश्ते नही बदलते, बदलने के ज़माने से ! पर मोटर बोटों के आते ही, दिन लदते हैं चप्पू के!! पप्पू को दुनिया वालों ने घोंचू भले हो माना! आई है खबर इस बार, टॉप होने के पप्पू के!!

तेरी.. नहीं है, तेरी कमी

रिश्तों में है बर्फ जमी! तेरी.. नहीं है, तेरी कमी!! दुनिया तो निकली अक्लमंद! बुद्धू ठहरे एक हमी!! धरती सूखी जाती है! आँखों में छुप गयी सारी नमी!! खंडहरों में जीते हैं! इक दिन बन जायेंगे ममी!! दिल ना डोले इन्सां का ! तब डोला करती है ये जमी!! बाजारू इस दुनिया में! हैं रिश्ते सारे बने डमी!! जाने क्या है होने वाला! साँसें है सहमी-सहमी!! बिकने कुछ दिल आये हैं! बाजार में है गहमा-गहमी!! रात में देखा सपना बुरा! चीख पड़ा-"मम्मी-मम्मी"!!