रविवार, जुलाई 11, 2010

किसी सोये हुए को कस के झिंझोड़ा नहीं करते

यूँ बैचैन होके न आने वालों की बाट अगोरा नही करते


रूठा बालम जो लौट आये तो यूँ मुंह मोड़ा नही करते.



किसी भी हाल में ना मानने की जिद हो जिसकी

वैसे इन्सान से कभी भी निहोरा नही करते.



कोई प्यारा सा सपना बेरहमी से टूट जाता है

किसी सोये हुए को कस के झिंझोड़ा नहीं करते.



कि जिन बातों से अपनी शर्म के परदे उघरते हो

वैसी बातों का शहर भर में ढिंढोरा नही करते.



बदन और रूह जैसे जुड़ चुका हो जब कोई जोड़ा

किन्हीं पंचायतों के कहने से उनका बिछोड़ा नही करते.

1 टिप्पणी:

Udan Tashtari ने कहा…

लोक भाषा से शब्दों के लेकर उम्दा रचना. बधाई.