शुक्रवार, जून 18, 2010

मंजिल मिलती है तो सफ़र खोता है

ऐसा ही दस्तूरे जमाना होता है
मंजिल मिलती है तो सफ़र खोता है.

एक और एटम  बम पर हो खर्च करोड़ों
और दूसरी और भूख से शिशु रोता है.

नेताओं में अद्भुत भाईचारा होता है
एक लगाता कालिख है, दूजा धोता है.

हाथ लगेगी सिर्फ  हताशा ,मिलेंगे ग़म
कोरे सपनों की फसलें जो बोता है.

संतुष्टि के मोती हासिल होते हैं उनको ही
खतरों के सागर  में लगाते जो गोता हैं.

नेताओं-अफसरों आओ फसल काट लो
मर-मर के खेतों को मैंने जोता है.

आँखें बरसी, पानी की जब बूँद ना बरसी,
टूट पड़ा ,खेतों को जिसने मर-मर कर जोता है.


जीवन के हर दर्शन को रट कर के भी
जीवन को जो ना समझे वो तोता है.

कोई टिप्पणी नहीं: