शुक्रवार, जून 25, 2010

आम की ख्वाहिश लिए बबूल बोता आदमी

कपड़ों के हिसाब से फिट होता आदमी


खुद की अर्थी, खुद के कांधे ढ़ोता आदमी.



मरियल रिक्शेवाले का कचूमर निकालते

गालियाँ बकता जा रहा था मोटा आदमी.



जितने खरे आदमियों के उठाये हैं मुखौटे

हंस के अन्दर से निकला है खोटा आदमी.



देखो जिधर भी, मिल जायेगा  तुम्हें उधर

आम की ख्वाहिश लिए बबूल बोता आदमी.



हर आँख से हर आंसू पोछे कैसे कोई भला


जिधर देखो उधर मिलेगा कोई रोता आदमी.



चेहरे के जंगल में भावनाएं लुप्तप्राय हैं

रोबोटों सा दिखने लगा है मशीन होता आदमी.



इतनी अँधेरी रात में भी कोई दिया जल रहा


नींद में मुस्कराया है सपने संजोता आदमी.

6 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

कपड़ों के हिसाब से फिट होता आदमी
खुद की अर्थी, खुद के कांधे ढ़ोता आदमी.


-क्या बात है, बहुत खूब!!

Sunil Kumar ने कहा…

आम आदमी की सच्चाई को दर्शाती एक सुंदर रचना , बधाई

KESHVENDRA ने कहा…

Dhany bhagya hamare ki Udantashtari ek lambe arse ke bad hamare yahan bhi padhari. rachna ko pasand karne ka shukriya.

KESHVENDRA ने कहा…

Sunil ji, bahut-bahut shukriya.

Umesh ने कहा…

"हंस के अन्दर से निकला है खोटा आदमी" बहुत अच्छी पंक्तियां हैं केशवेन्द्र। बधाई। तुमने मुझे भी ब्लोगर बना दिया। मेरे ब्लोग को http://umeshkschauhan.blogspot.com पर फालो कर सकते हो।

singhsdm ने कहा…

यूँ तो सब कुछ उन्वान से ही स्पष्ट था.......मगर कुछ शेर इस ग़ज़ल के ऐसे हैं जो मौजू होने के साथ अपने कहाँ और चिंतन का भी अलम पुरजोर तरीके से उठाये हुए हैं......!
कपड़ों के हिसाब से फिट होता आदमी
खुद की अर्थी, खुद के कांधे ढ़ोता आदमी.
क्या बात है केशव भी......
देखो जिधर भी, मिल जायेगा तुम्हें उधर
आम की ख्वाहिश लिए बबूल बोता आदमी.
यह हुआ हासिले ग़ज़ल शेर.....!

चेहरे के जंगल में भावनाएं लुप्तप्राय हैं
रोबोटों सा दिखने लगा है मशीन होता आदमी.
अद्भुत बिम्व खींच दिया दोस्त ...... बधाई !