सोमवार, अप्रैल 22, 2013

एक बलात्कारी दिन


 

 
एक बलात्कारी दिन, आया, आके बीत गया |

रोया ख़बरें सुन-सुन कर, मन मानों रीत गया ||

 

बच्चियों तक को न बख्शा इन वहशी दरिंदों ने |

खुदा शायद हार गया, शैतान जीत गया ||

 

छीन ली कुछ मासूमों की मुस्कान सदा के लिये |

खिलखिलाहटें थमीं और जीवन-संगीत गया ||

 

सत्ता के कानों पे जूं तक नहीं रेंगी |

औरत का कोई नहीं, ऐसा परतीत गया ||

 

जनता का गुस्सा भी क्षणिक-सा उबाल है |

नारे लगे, कैंडल जले और लावा रीत गया ||

 

---केशवेन्द्र---

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