रविवार, मार्च 13, 2011

जिंदगी भूलभुलैया तो है जरुर मगर

बाहर की गर्मी गिला देती है |
भीतर की गर्मी जिला देती है ||

इश्क के जाम की, मुझको नहीं तमन्ना है|
साकी अनजान है, आकर के पिला देती है||

जब कभी दिल की कली मुरझाती है|
प्रेम की बारिश, उसे फिरसे खिला देती है||

मैं तो करता हूँ उससे इश्क बेइंतहा|
फिर वो क्यूँ बेमुरव्वती का सिला देती है ||

जब कभी जिंदगी मुरझाती है |
उसकी मुस्कान जिला देती है ||

गैरों की सैकड़ों ठोकरों की परवा नहीं |
अपनों की एक ठोकर भी हिला देती है ||

जिंदगी भूलभुलैया तो है जरुर मगर |
भूले-बिछुड़ों को किसी मोड़ मिला देती है ||

(१३ अप्रैल २००४ को लिखित )

3 टिप्‍पणियां:

आशुतोष ने कहा…

गैरों की सैकड़ों ठोकरों की परवा नहीं |
अपनों की एक ठोकर भी हिला देती है ||.................
सत्य वचन कहा आप ने अपनों की एक ठोकर भी हिला देती है...
बधाइयाँ..

smita ने कहा…

speechless.....

smita ने कहा…

"'इश्क के जाम की, मुझको नहीं तमन्ना है|
साकी अनजान है, आकर के पिला देती है||

जब कभी दिल की कली मुरझाती है|
प्रेम की बारिश, उसे फिरसे खिला देती है||"'

" these are superb lines..."