बुधवार, नवंबर 02, 2011

इटली आया नहीं, फ्रांस गया नहीं-केबीसी के पंच कोटि विजेता सुशील कुमार की स्वर्णिम सफलता

इटली आया नहीं, फ्रांस गया नहीं-केबीसी के पंच कोटि विजेता सुशील कुमार

बिहार के मोतिहारी के रहनेवाले सुशील कुमार ने एक मिसाल पेश की है भारत के संघर्षरत युवाओं के सामने. महात्मा गाँधी की कर्मभूमि चम्पारण से सम्बन्ध रखनेवाले और महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में कम्प्युटर ऑपरेटर की नौकरी करनेवाले यह युवक भारत के युवाओं के लिए एक प्रेरणा बनकर उभरा है.
हालाँकि कहनेवाले यह कह सकते हैं कि यह सफलता लौटरी में मिली सफलताओं जैसी ही है और ऐसे मौके हर किसी को नहीं मिलते. मगर, इस शख्श ने इस सफलता के लिए ११ सालों तक इंतजार किया है और इस मंच तक पहुचने के लिए हर संभव प्रयास उसने किये. अपने परिवार को सहारा देने के लिए स्कूली बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने तक का काम किया. इसलिए उनकी इस सफलता को उनके संघर्ष के आईने में देखते हुए उसे समुचित सम्मान दिए जाने की जरुरत है.
सुशील ने जिस हिसाब से इस खेल को खेला और जितने रिस्क लिए, वो भी काबिल-ए-तारीफ है. १ करोड़ के प्रश्न तक वो बस एक लाइफ लाइन प्रयोग कर पहुचे. उन्होंने अच्छे रिस्क भी लिए और किस्मत भी उनपर मेहरबान रही. कई बार उन्होंने अपने इन्ट्यूशन के सहारे बड़ा रिस्क लेते हुए सवालों के जवाब दिए.
मजेदार सवालों में एक करोड़ का सवाल था कि लाल बहादुर शास्त्री जी ने ललिता जी से अपनी शादी के समय खादी के कुछ कपडें के अलावा दहेज में और क्या लिया. इस सवाल का जवाब सुशील ने एक्सपर्ट राय के आधार पर ‘चरखा” आप्शन लॉक कर कर दिया. शायद इस उदाहरण से दहेज के पीछे भागती हमारी युवा पीढ़ी को कुछ प्रेरणा मिले.
सबसे मजेदार किस्सा तो पांच करोड़ के सवाल का रहा. सवाल था कि १८६८ में निकोबार द्वीप को ब्रिटेन के हाथों बेचने के साथ किस औपनिवेशिक शक्ति का भारत से अंत हो गया. आप्शन थे बेल्जियम, डेनमार्क, इटली और फ्रांस. सुशील का जुमला कि – “इटली आया नही, फ्रांस गया नहीं” श्रोताओं को लोटपोट करता रहा. फोन अ फ्रेंड से भी जब बात ना बनी तो अल्टीमेट रिस्क लेते हुए सुशील ने डबल डिप आप्शन लिया. इस आप्शन में अगर वे दो बार में भी सही जवाब नही दे पाते तो सीधे १ करोड़ से नीचे गिरकर १ लाख ६० हजार पर आ जाते. वाकई, उनके इस रिस्क लेने की हिम्मत को नमन.
अगर सुशील कुमार को केंद्र सरकार मनरेगा के पोस्टर बॉय के तौर पर प्रयोग करे तो यह प्रौढ़ शिक्षा को बढ़ावा देने में और कामगार जनता को अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा देने की प्रेरणा देने में काफी सहायक सिद्ध हो सकती है. सुशील कुमार की सपनीली सफलता की इस कहानी से ढेर सारे संघर्षशील युवा प्रेरित हो, इसी दुआ के साथ मैं एक बार फिर सुशील जी को तहे दिल से शुभकामनाएँ देता हूँ.
---केशवेंद्र कुमार---

1 टिप्पणी:

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

बहुत ख़ुशी की बात है ..सुशील यक़ीनन बधाई के पात्र हैं