रविवार, अगस्त 07, 2011

जिंदगी से क्या गिला

जिंदगी से क्या गिला |
जो मिला है, सो मिला ||

दुःख से मुरझाया था मन |
आज देखो फिर खिला ||

राजे-महराजे गए |
खंडहर बचा है अब किला ||

उतरा नशा अब जिंदगी का |
आके तू, जरा सा पिला ||

मुर्दों से फिरते हैं लोग यहाँ |
कुछ भी कर, तू उन्हें जिला ||

मैं छोड़ आऊंगा सारा जहां |
तू होगी, ये दिलासा तो दिला ||

प्यार-रिश्तों का जहाँ |
पल भर में गया है ज्यूँ बिला ||


तेरी आँख में आंसू नही |
तेरा ह्रदय है या है शिला ||

ताश के पत्तों की ढेरी है दुनिया ये |
तू जरा सा इसको दे हिला ||

गम ना कर कीचड़ का तू |
बस, कुछ कमल तू दे खिला ||

(१९-०८-२०१०)

6 टिप्‍पणियां:

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

जिंदगी से क्या गिला |
जो मिला है, सो मिला ||

बहुत सुंदर....

Vandana Singh ने कहा…

sir ji ..behad khoobsoorat ....ise milta julta matla jahan me kai din se chal rha tha .....padhkar laga jaise yhi sab likhna chaha tha ....padhkar bahut accha laga ....:)

संजय भास्कर ने कहा…

भावपूर्ण रचना अभिव्यक्ति
मित्रता दिवस की हार्दिक शुभकामनाये

वाणी गीत ने कहा…

जिंदगी से जो मिला , क्या कम मिला ...
सुन्दर अभिव्यक्ति !

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

टिप्पणी में देखिए मरे चार दोहे-
अपना भारतवर्ष है, गाँधी जी का देश।
सत्य-अहिंसा का यहाँ, बना रहे परिवेश।१।

शासन में जब बढ़ गया, ज्यादा भ्रष्टाचार।
तब अन्ना ने ले लिया, गाँधी का अवतार।२।

गांधी टोपी देखकर, सहम गये सरदार।
अन्ना के आगे झुकी, अभिमानी सरकार।३।

साम-दाम औ’ दण्ड की, हुई करारी हार।
सत्याग्रह के सामने, डाल दिये हथियार।४।

Divya sirvi ने कहा…

Nice line sir.