शुक्रवार, अप्रैल 15, 2011

खुद से जो हूँ आजकल मैं भागता-सा फिर रहा

खुद से जो हूँ आजकल मैं भागता-सा फिर रहा |
है क्या वजह, क्या दे रहा हूँ खुद को मैं कोई सजा ||

शुतुरमुर्गी चाल है क्या खूब मैंने सीख ली |
देख कर उलझनों को सर रेत में छुपा लिया ||

मुकद्दर और रेत की ये खूबी क्या ही खूब है |
खुली मुट्ठी में टिकी, जो जकड़े उसने खो दिया ||

आँखें दुनिया से बंद कर मैं खुद में ही सिमटा रहा |
औरों को परवा नहीं, पर, मैं ना ऐसे में मैं रहा ||

खुद से खुद को ये नसीहत देना अब है लाजमी |
पीठ है अब तक दिखाई, अब दिखा, सीना तना |

11 टिप्‍पणियां:

आशुतोष ने कहा…

सुन्दर भावना जीवन को समते हुए आकर्षक कविता..

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

@ अब दिखा, सीना तना |
प्रेरणादायक!

KESHVENDRA ने कहा…

आशुतोष जी ओर अनुराग जी, आप दोनों का आभार रचना को पढ़ने और उसपर प्रत्रिक्रिया देने के लिए.

हरकीरत ' हीर' ने कहा…

शुतुरमुर्गी चाल है क्या खूब मैंने सीख ली |
देख कर उलझनों को सर रेत में छुपा लिया ||

क्या बात है ....
बिलकुल नया प्रयोग ....
बहुत खूब .....!!

Dr Varsha Singh ने कहा…

मुकद्दर और रेत की ये खूबी क्या ही खूब है |
खुली मुट्ठी में टिकी, जो जकड़े उसने खो दिया |

यथार्थ का सुन्दर वैचारिक प्रस्तुतिकरण...
हार्दिक शुभकामनायें।

सतीश सक्सेना ने कहा…

ईमानदारी से किया आत्म विवेचन....
शुभकामनायें !

वीना ने कहा…

मुकद्दर और रेत की ये खूबी क्या ही खूब है |
खुली मुट्ठी में टिकी, जो जकड़े उसने खो दिया |

बहुत सुंदर भावनाओं को समेटे हुए शब्द संयोजन...
बहुत खूब

संगीता स्वरुप ( गीत ) ने कहा…

चर्चा मंच के साप्ताहिक काव्य मंच पर आपकी प्रस्तुति मंगलवार 19 - 04 - 2011
को ली गयी है ..नीचे दिए लिंक पर कृपया अपनी प्रतिक्रिया दे कर अपने सुझावों से अवगत कराएँ ...शुक्रिया ..

http://charchamanch.blogspot.com/

Khare A ने कहा…

sudnar gazal janab,
badhai kabule

kumarmanish_25 ने कहा…

मुकद्दर और रेत की ये खूबी क्या ही खूब है |
खुली मुट्ठी में टिकी, जो जकड़े उसने खो दिया ||

Ati Sundar!!!

अनूप शुक्ल ने कहा…

बहुत खूब! खासकर आखिरी वाला शेर! :)