शुक्रवार, जुलाई 29, 2011

तीन त्रिवेणियाँ


तेरी नजरों की छुअन

तुम जिन निगाहों से देखती हो मुझे
यूँ तो मैं लोहा हूँ मगर,
सोना बना देती है मुझे,तेरी नजरों की छुअन.

२२-५-२०१०


२.

इश्क में सीखा है हमने

इश्क में सीखा है हमने फैलना आकाश-सा
सूखी जमीं पे फैलती जाती सी नन्ही घास-सा.

जो समेत डाले खुद में, उस प्यार से दूरी भली.

९-७-२०१०


३.

मजबूरियां

हौसलों को हार, ना स्वीकार है
रौशनी को अंधेरों से कब प्यार है

मगर, सबके साथ हैं कुछ मजबूरियां चस्पां.
२९-३-२०११

3 टिप्‍पणियां:

रश्मि प्रभा... ने कहा…

हौसलों को हार, ना स्वीकार है
रौशनी को अंधेरों से कब प्यार है waah

वीना ने कहा…

बहुत खूब...

डॉ॰ मोनिका शर्मा ने कहा…

बेहतरीन अभिव्यक्ति..... सभी रचनाएँ प्रभावी बन पड़ी हैं...