रविवार, जुलाई 31, 2011

तीन त्रिवेणियाँ- दूसरी कड़ी

१.

ख्वाब इक खोया हुआ फुटपाथ पर


ख्वाब इक खोया हुआ फुटपाथ पर |
सर्द से कांपा किया था रात भर ||

आँख को क्या, चैन से सोई रही |

०७-५-२०११


२.मौत को जब करीब से देखा



झूठे ख्वाबों से हुई रुसवाई,
जिंदगी इक भरम नजर आई |

मौत को जब करीब से देखा |

०१-५-२०११

३.

फुर्सत नहीं है

वक्त दौड़ता जाता, जिंदगी थमी सी है|
आजकल हर किसी को वक्त की कमी सी है ||

जिससे मिलता हूँ, यही कहता है-फुर्सत नहीं है |
१६-७-२०११

6 टिप्‍पणियां:

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत खूब। सच आज किसी को किसी के लिए फ़ुरसत ही नहीं है।

रश्मि प्रभा... ने कहा…

ख्वाब इक खोया हुआ फुटपाथ पर |
सर्द से कांपा किया था रात भर ||
waah ... kitni gahrayi se dekha

KESHVENDRA ने कहा…

रश्मि जी और मनोज जी, आप दोनों का शुक्रिया.

S.N SHUKLA ने कहा…

ख्वाब इक खोया हुआ फुटपाथ पर |

nice post,dhanyawaad

vishy ने कहा…

बहुत खूब

Dr.Sushila Gupta ने कहा…

वक्त दौड़ता जाता, जिंदगी थमी सी है|
आजकल हर किसी को वक्त की कमी सी है ||

जिससे मिलता हूँ, यही कहता है-फुर्सत नहीं है |


aapke chand shabdon ne bahut kuch kah diya. thanks.