बुधवार, जनवरी 06, 2010

बादलों के घेरे में

बादलों के घेरे में
चेहरा तेरा दिखता है

क्या बताऊँ और किसे
गम भी जहाँ में बिकता है

ख़ुशी-आशा आए-गए
देखे मन में क्या अब टिकता है

दूर तक पसरा अँधेरा
मुझको तो अब दिखता है

खुश रहो कहता सभी से
दुनिया से ये ही रिश्ता है

बिछुड़ना तेरा याद आये तो
जख्म दिल का रिसता  है

विरह की चक्की में देखो
ह्रदय मेरा पिसता है

प्रेम करके प्रेम ही पाए
इंसां नही वो फ़रिश्ता है

हमने तो देखा यारों
प्रेम का गम से रिश्ता है.

(कृष्ण सोबती की कहानी "बादलों के घेरे" को समर्पित)

4 टिप्‍पणियां:

rewa ने कहा…

Ati sunder!

singhsdm ने कहा…

keshav
मिल गए तुम........
कहाँ कहाँ नहीं ढूँढा तुम्हे....
ब्लॉग पर मिलना ...आहा अब निश्चित ही मज़ा आएगा

singhsdm ने कहा…

केशव भाई बहुत ही बेहतरीन लिखा है आपने.........सुदूर दक्षिण में जाकर भी हिंदी से यह लगाव वाकई प्रशंसनीय है......रही बात कविता की तो वो तो दिल को छु जाने वाली रही.............ईश्वर आपसे ऐसे ही लिखते रहें.....!

KESHVENDRA ने कहा…

पवन भाई, इसी ही कहते हैं ना की मसूरी के बिछड़े ब्लॉग पर आ कर मिले. मैंने तो खैर शुरुआत की है पर आपके ब्लॉग को पढ़ कर वाकई मजा आ गया. अभी तो नयी रचनाएँ कम ही लिखी है, पुरानी लिखी रचनाओं को पोस्ट कर रहा हूँ...पर आपको ब्लॉग को देख कर थोड़ा और सक्रिय होने की प्रेरणा मिली. हालिया बस एक व्यंग कथा स्वामी प्रेम डूबे-युधिष्ठिर संवाद और एक कविता बलात्कार के विरुद्ध लिखी है. हाँ, अब फिर सोयी सृजनात्मकता जाग रही है.