सोमवार, जनवरी 25, 2010

तेरी रूह के निशान निकलते हैं

झगड़ों में जब भी आगे आन-और-बान निकलते हैं!

जंगल के घर-घर से तब तीर-कमान निकलते हैं!!


खूबसूरत मुखौटे के पीछे!

बदसूरत इंसान निकलते हैं!!


तन का मुखौटा हटा के देखो!

क्या भगवान निकलते है?


दुनिया की आग में जलनेवाले!

कुंदन के समान निकलते है!!


बाबाओं के पास जाकर लोग !

और भी परेशान निकलते हैं!!


जंगल में बस्ती मिलती है!

शहर वीरान निकलते हैं!!


मेरे  जिस्म के कतरे-कतरे से!
तेरी रूह के निशान निकलते हैं!!


तुम जब भी गुमी हो, तलाश में तेरी!

मेरे जिस्म-और-जान निकलते हैं!!

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