बुधवार, जनवरी 27, 2010

ऐसी ही कोई आस हूँ.


ना खुश हूँ, ना उदास हूँ!
ना दूर हूँ, ना पास हूँ!!

 
मिट पाए ना मिटाने से!
ऐसी अबूझ प्यास हूँ!!
 
 
हर पाँव जिसको रौंदता!  
बेबस-सी  मैं वो घास हूँ!!
 
 
सारी उदासी धुल उठे!
ऐसा मुकम्मल हास हूँ!!
 
 
बुझ-बुझ के भभक जो उठे!

ऐसी ही कोई आस हूँ!!

3 टिप्‍पणियां:

रवि कुमार, रावतभाटा ने कहा…

बेहतर...
यहां यही महसूस हुआ...अच्छा लगा...

KESHVENDRA ने कहा…

रवि भाई, ब्लॉग को पढने और सराह कर उत्साहवर्धन के लिए शुक्रिया.

संजय भास्कर ने कहा…

कई रंगों को समेटे एक खूबसूरत भाव दर्शाती बढ़िया कविता...बधाई