शनिवार, जनवरी 02, 2010

मन की पीड़ा अनकही

मन को कितनी.... पीड़ा होती है
जब तेरी आँखों में दिख जाता कोई मोती है.

दूर मुझसे जो रहो खुश.. तो कोई बात नही
तन्हा होते हुए भी गम का अहसास नही

मांगती फिरती हो खुशियों की दुआ सबके लिए
काश! लोगों के दिलों में आईने होते

जब से तेरी आँख में आंसू देखा
तब से मन मेरा बड़ा सूना है
बाँट सकता नही तेरा गम में
इसका दुःख मुझको और दूना है

ख्वाहिशे मन की मेरी मन में रही
बच गई एक तमन्ना..जो जीवन में रही

कोई दिन आएगा ऐसा की मेरी याद आएगी
अपने गम बांटने को, मुझको तू बुलाएगी.

क्या पता, वो दिन कब आएगा?
क्या पता, वो घडी आ पायेगी?
क्या पता..कल को क्या-क्या होगा?
क्या पता..उसको क्या पता होगा?

कल की ना जानूँ , मैं इतना जानूँ
 मौला जो भी करे अच्छा होगा.

बात सुन मेरी मेरे हमनवा, ओ यार मेरे!
भूल से भूलना भी मुमकिन ना, पहले प्यार मेरे
ये जो मौसम है उदासी का, चला जायेगा
कोई प्यारी-सी धुन.. भंवरा गुनगुनाएगा
तब मुझे याद करो, ना करो, कोई बात नही
अपने गम में मुझे बेगाना ना समझा करना
मुझपे ज्यादा ना सही, इतना भरोसा करना
एक आवाज जरा देके देख तो लेना
मैं वहां हूँ तुम्हारे साथ में या की नहीं....

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