बुधवार, जून 12, 2013

क्यूँ कहते हो कि बेटी परायी है


यह कविता जितनी मेरी नन्हीं बिटिया के लिए है उतनी ही दुनिया की हर बेटी के लिए है | नीलेश रघुवंशी जी की कविता की इक पंक्ति याद आ रही है कि –“इस दुनिया को तोड़-मरोड़कर बनानी चाहिये इक नयी दुनिया/ बेटी जिसमे इतनी परायी न हो”|

वाकई, बेटियां अनमोल होती है | हमें इस दुनिया को उनके लिए सुरक्षित, सुंदर और अपनापन भरी बनाने में अपना हरसंभव योगदान देना होगा |



मेरी नन्हीं परी जब से घर में आयी है |

मेरे ख्वाबों-ख्यालों पे वही छायी है ||


ख़ुशी के आंसुओं से मेरी आँख छलछलाई है |

नींद में सोयी हुई जब वो मुस्करायी है ||


गोद में बिटिया मेरी पहले-पहल जब आयी |

मेरी ख़ुशी तितली-सी फड़फड़ायी है ||


उसकी किलकारियों-से खिल उठा घर सारा |

उसके रोने में भी मानों बजती शहनाई है ||


बेटियां तो खुदा की नेमत है |

फिर क्यूँ कहते हो कि बेटी  परायी है ||


---केशवेन्द्र कुमार---





2 टिप्‍पणियां:

बेनामी ने कहा…

bahut ache keshav

कविता रावत ने कहा…

उसकी किलकारियों-से खिल उठा घर सारा |
उसके रोने में भी मानों बजती शहनाई है ||

बेटियां तो खुदा की नेमत है |
फिर क्यूँ कहते हो कि बेटी परायी है ||
...यही विरोधाभास समाज में घुन का काम करता है ...
बहुत सुन्दर सार्थक रचना