सोमवार, अगस्त 20, 2012

धर्म की आंच पर सिक रही राजनीति की रोटियाँ


२०-८-२०१२

धर्म की आंच पर सिक रही राजनीति की रोटियाँ |

हर कोई फिट कर रहा अपनी- अपनी गोटियाँ ||



व्यवस्था का बूढ़ा गिद्ध है हरपल चौकन्ना |

जनता जिसे दिखती है बोटियाँ-ही-बोटियाँ ||



अपने ही देश में, लोग बेगाने हुए |

दर-दर भटक रहे बनके घुमंतू भोटियाँ ||



दल-दल के दांत है दिखाने के और ही |

मगर हमाम में सब, यार हैं  लँगोटियाँ ||

---केशवेंद्र ---








5 टिप्‍पणियां:

Fani Raj Mani Chandan ने कहा…

व्यवस्था का बूढ़ा गिद्ध है हरपल चौकन्ना |
जनता जिसे दिखती है बोटियाँ-ही-बोटियाँ ||

यह बूढा गिद्ध कब तक भूखा रहेगा पता नहीं...

सुन्दर प्रस्तुति!!!

Anupama Tripathi ने कहा…

समसामायिक ,सारगर्भित ...गहन अभिव्यक्ति ...!!
शुभकामनायें ...!!

जयकृष्ण राय तुषार ने कहा…

बहुत खूब |

RatheeshNirala ने कहा…

अच्छी कविता। शब्दों की ताकत महसूस होती है।

RatheeshNirala ने कहा…

अच्छी कविता। शब्दों की ताकत महसूस होती है।