रविवार, मई 05, 2013

द्रौपदियों के चीरहरण के देश में

द्रौपदियों के चीरहरण के देश में |

दुर्योधन-दु:शासन है हर वेश में |



एक की रक्षा कर लौटे कि दूजी पुकार |

कृष्ण बेचारे पड़े हुए है क्लेश में |



सत्ता भीष्म पितामह- सी लाचार पड़ी है |

या फिर लुत्फ़ उठाती है, लाचारी के भेष में |



द्रौपदी, कब तक कृष्ण-कृष्ण गुहराओगी |

आ जाओ तुम अब काली  के वेश में |



रक्तबीज की भांति हैं ये कामुक पिशाच |

अट्टहास करो इनके वध के शेष में |

---केश्वेंद्र ---

५-५-२०१३

8 टिप्‍पणियां:

Rajesh Kumari ने कहा…

आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार ७/५ १३ को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी आपका वहां स्वागत है ।

पूरण खण्डेलवाल ने कहा…

सटीकता को प्रदर्शित करती रचना !!

कालीपद प्रसाद ने कहा…

बहुत सुन्दर आह्वान ,सुन्दर अभिव्यक्ति !

अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
latest post'वनफूल'

Kuldeep Thakur ने कहा…

मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि
आप की ये रचना 10-05-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल
पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ।
आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाना।

मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।

दिगम्बर नासवा ने कहा…

द्रौपदी, कब तक कृष्ण-कृष्ण गुहराओगी
आ जाओ तुम अब काली के वेश में ...

समय की पुकार तो यही है ... काली का भेस धारण करना होगा नारी को ...
अच्छी रचना है ...

मन के - मनके ने कहा…


कृष्ण विचारे पडे हुए क्लेष में
अब एक नहीं कृष्ण को हजारों अवतार
लेने होंगे.

महेन्द्र श्रीवास्तव ने कहा…

अच्छी रचना
बहुत सुंदर

रजनीश तिवारी ने कहा…

sahi kaha hai. bahut achchhi rachna.