संदेश

प्रेम पंखुरियां

प्रेम नही होता जग में तो कितना अच्छा होता | ऐसे ही बिन बात के ना कोई  हँसता, ना कोई  रोता || प्रेम किये दुःख होत है, यह जानत हर कोय | फिर भी प्रेम के चंगुल से बांच सका ना कोय || प्रेम घृणा में, घृणा प्रेम में ऐसे आवृत्त है | प्रेम से घृणा,घृणा से प्रेम- एक ही वृत्त है || प्यार करना है सरल, मुश्किल निभाना है | प्रेम पथ में ना है मंजिल, ना ठिकाना है || प्रेम को जो ना जाने,वो हैं पीटे ढिंढोरा | प्रेम के पंडित अक्सर ही खामोश देखे हैं  || प्रेम पंथ है अति कठिन, नट की रस्सी जान  | एक चूक भी गर हुई, ना बच पाए प्राण || आभासी दुनिया के बाशिंदे क्या बूझेंगे प्यार | लाभ-हानि के गणित से परे, है प्रेम व्यवहार || प्रेम  भुला देता है सारी दुनियादारी | दुनियादारी को अक्सर प्रेम याद आता है ||

शम्मा जलती है...

शम्मा जलती है, धुवाँ  होता है | सामने मौत का कुआँ होता है | जिसमे परवाना पानी ढूंढें फिरता है | हश्र आँखों के आगे तिरता है | इश्क़ एक बेवकूफी है जो अक्सर समझदार लोग किया करते हैं |

नववर्ष 2017 की शुभकामनाएँ

बदल गया कैलेंडर और डायरियां बदली | इनके सिवा और क्या बदला, नहीं पता  || काश कि कुछ और भी बदल पाए || मसलन, चलो कुछ पेड़-पौधें लगायें , या किन्हीं बेसहारों का सहारा बने , मदद करें उनकी जो है उसके हक़दार, खुशबू बांटें, खुशियाँ बांटे, बांटे थोडा प्यार | दिल से क्षमा मांगे अगर दुखाये हो दिल- बातें करें उन अपनों से जो आपके फ़ोन का करते हैं बेसब्री से इंतजार | जिनसे अकारण घृणा की हो, उनपर लुटाये ढेर-सारा प्यार | कंधे पर लदे अपेक्षाओं के बोझ को करे हल्का जिनके काम न कर पाए, उनसे कर ले ईमानदारी भरी क्षमाप्रार्थना | नजरे न चुराए, सामने आये, मन मिलाये | खुदा नहीं इंसान हैं, गलतियां सकारे | माता-पिता-गुरुजनों पर लुटाये स्नेह , जैसा उनसे बचपन में मिला-अनमिला | भाई,बहन, दोस्तों से निभाए रिश्ते | बीवी-बच्चों को दे ढेर सारा प्यारा समय | अपनों पे खीजना, गुस्सा होना करें कम | नए साल में ज्यादा ना सोचे,ना ही करे चिंता | उपलब्धि पर गर्व ना करे, ना हो हार की कुंठा | नए साल में नाहीं पाले चाह किसी आकाशकुसुम की | जैसे हम हैं, उसी में सुधरें, बस ये हो उत्कंठा | जीवन सरल र...

जिन्दगी, तेरी कमी खलती है

जिंदगी अपनी राह चलती है । तमन्नाएं  यूं ही बस मचलती है ॥  आस से प्यास कभी बुझती नहीं ।  उम्रभर मृगमरीचिकाएं  छलती हैं ॥  दौर ऐसे बहोत आते हैं जहाँ ।  जिंदगी, तेरी कमी खलती है ॥  काश ऐसा अगर हुआ होता ।  सोचकर, हसरतें हाथ मलती  हैं ॥  बस में जो है, कसर नहीं रक्खी ।  क्या करे गर, होनी टाले नहीं टलती है ॥  लाख कोशिश से भी जहां दाल नहीं गलती है ।  वहां भी उम्मीद की एक लौ जरूर जलती है ॥  खुदा धरती का हाल देख सोच पड़े ।  क्या इंसान बनाना बड़ी गलती है ॥  देर हो सकती है, अंधेर नहीं  ।  दुआएं सच्चे दिल की जरूर फलती हैं ॥  पाखी घर लौट रहे, चलो 'केशव' ।  कि सुरमई स्याह शाम ढ़लती है ॥ 

दिल्ली - धुंध है, धुंआ है, लाचारी है

धुंआ है, धुंध है, लाचारी है | मार कुदरत की सब पे भारी है || कोसने से पहले सोचे, हमने क्या किया अब तक | एक पौधा भी लगाया, या की बस बातें की || कहते रहे धरती को बचाना है | और प्लास्टिक की पत्तलों में खाना है || नदियों को माँ कह के बस पूजते रहे | या जिन्होंने गन्दगी फैलाई ,उन्हें रोका भी || जैसा चल रहा, चलता रहा अगर वैसा ही | पानी बोतल में, हवा सिलिंडर में भर के बेचेंगे || बची रही नहीं अगर धरती हरी -भरी | तो हम भी बचेंगे म्यूजियम में ही कहीं || शुद्ध हवा हमको अगर पाना है | आज ही एक पेड़ चलो चलके लगाना है || ऐसी कैसी धरती छोड़ के हम जायेंगे | शस्य श्यामल नहीं जो कालिम हो || ऐसा आकाश देंगे बच्चों को | नीलिमा जिसकी कालिख वाली हो? ऐसी नदिया कैसे छोड़ के हम जायेंगे | जिसमे मछली भी जिन्दा नहीं है रह पाती || ये धरती हमारी नहीं, भविष्य की थाती है | आओं, इसे हरी-भरी और खुशनुमा रखे || तितलियों, चिड़ियों, फूलों- फलों, वन्य प्राणियों से भरा-पूरा रक्खे || सिर्फ कैंडल नहीं जलाएं हम | उससे भी सिर्फ धुआं फैलेगा || सिर्फ ना...

त्रिवेणी - स्याह समय में

कलम आजकल बंद पड़ी है, कागज़ कोरे कोरे हैं  | स्याह समय में, आशा के उजले  कण थोड़े थोड़े हैं | स्याही आजकल कागज नहीं, चेहरे काले करती है ||

वायनाड (केरल) से एक दिन का लेखा-जोखा

केरल राज्य में एक बड़ी ही प्यारी सी जगह है वायनाड | कैलिकट, ऊटी, मैसूर और कुर्ग जैसी घूमने में प्यारी जगहों के पास है यह जिला | प्रकृति ने इसे सजाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है | चाय और कॉफ़ी के बगान तो कहीं नारियल और सुपारी के पेड़, छोटी-छोटी सुन्दर पहाड़ियां, हाथी,बाघ,हिरण, चिड़ियों और तितलियों से भरे घने जंगल,  हंसती-गाती नदियाँ और खिलखिलाते झरने | पश्चिम घाट की गोद में बसे इस हिल स्टेशन की शोभा ही निराली है | लाखों देसी-विदेशी सैलानियों के मन को हरने वाली है यह जगह | लेकिन इस जगह का एक सच और भी है | केरल राज्य में सबसे ज्यादा आदिवासी जनसंख्या वाला जिला है वायनाड | कुरिचिया, कुरमा, पणीया, अडिया, काट्टूनाइकर, उराली जैसी आदिवासी जातियां यहाँ बस्ती है | इनमे  पणीया, अडिया, काट्टूनाइकर आदिवासी जातियों की अवस्था काफी सोचनीय है | अपनी जमीन से विस्थापित, मजदूरी कर जीने को मजबूर, शराब और नशे के हाथों अपनी जिन्दगी दांव पर लगाते ये लोग वाकई में समय की तेज चाल में अपने को लाचार महसूस कर रहे हैं | वायनाड में पिछले साल जिला कलक्टर बन कर आने के बाद इन आदिवासियों की दशा को जानने के...