तुम्हे देख के ऐसा लगता है
तुम्हे देख के ऐसा लगता है इक आंसू की बूँद जो छलकी नही नयनों तक आई प लुढकी नही जीती भी रही मरती भी रही फिर आँखों-ही-आँखों में सूख चली. तुम्हे देख के ऐसा लगता है गंगा के जैसी दिखती हो तुम पावन सबको करती आई पर तुमको सबने मैला किया तुम रह गयी अपनी परछाईं. तुम्हे देख के ऐसा लगता है जैसे राधा खड़ी हो यमुना तट रोती भी नही, हंसती भी नही सुध-बुध बिसरा कर तन-मन की निर्मोही की बाट अगोरे है. तुम्हे देख के ऐसा लगता है जैसे बादल का इक छोटा टुकड़ा आकाश के कोने में तन्हा छुप-छुप के रोया करता है हर ग़म को छुपाये फिरता है. तुम्हे देख के ऐसा लगता है जैसे कोई बिन माँ का बच्चा हँसना भी भूला, रोना भी उसे भूख-प्यास का भी पता नही आकाश निहारा करता है. तुम्हे देख के ऐसा लगता है जैसे कोई कली मुरझाई-सी खिलने से पहले लील गई जिसको इस जग़ की निठुराई कोमलता का करुणांत हुआ. तुम्हे देख के ऐसा लगता है जैसे इक अभिमन्यु हो रण में आशा सारी नैराश्य भरी फिर भी रथ-चक्र उठाता है लड़ता जाता अं...