शनिवार, फ़रवरी 18, 2012

उसने देखा इस नज़र से

उसने देखा इस नज़र से |
मैं गिरा अपनी नज़र से ||

अधर में बड़ी देर डोला |
टूटा पत्ता जब शज़र से ||

रात कितनी बाकी है अभी |
पूछे सन्नाटा गज़र से ||

साथ रखना दुआएँ माँ की |
बचाएंगी बुरी नज़र से ||

नज़र में ना चुभो किसीकी |
सबको बरतो इस नज़र से ||


नज़र न आए यार मेरा |
मगर नहीं है दूर नज़र से ||

आईना मैं हूँ तुम्हारा |
मुझको देखो इस नज़र से ||

दिल में अंक गई नजरे उसकी |
उसने देखा इस नज़र से ||

7 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) ने कहा…

बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
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कल शाम से नेट की समस्या से जूझ रहा था। इसलिए कहीं कमेंट करने भी नहीं जा सका। अब नेट चला है तो आपके ब्लॉग पर पहुँचा हूँ!
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आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी की गई है!
सूचनार्थ!

Umesh ने कहा…

बहुत बढ़िया है केशवेन्द्र!
"उसने देखा इस नज़र से |
मैं गिरा अपनी नज़र से ||"
एक लम्बे समय बाद तुम्हारे ब्लॉग पर आया तो मजा आ गया।

veerubhai ने कहा…

साथ रखना दुआएँ माँ की |
बचाएंगी बुरी नज़र से ||
उम्दा ग़ज़ल हर अशआर काबिले दाद .

S.M.HABIB (Sanjay Mishra 'Habib') ने कहा…

साथ रखना दुआएँ माँ की |
बचाएंगी बुरी नज़र से ||

बहुत बढ़िया रचना...
हार्दिक बधाई..

veerubhai ने कहा…

रात कितनी बाकी है अभी |
पूछे सन्नाटा गज़र से ||
बेहतरीन .

vidya ने कहा…

वाह!!!
खूबसूरत रचना...

बहुत खूब..

वृजेश सिंह ने कहा…

होली की हार्दिक शुभकामना।