संदेश

द्रौपदियों के चीरहरण के देश में

द्रौपदियों के चीरहरण के देश में | दुर्योधन-दु:शासन है हर वेश में | एक की रक्षा कर लौटे कि दूजी पुकार | कृष्ण बेचारे पड़े हुए है क्लेश में | सत्ता भीष्म पितामह- सी लाचार पड़ी है | या फिर लुत्फ़ उठाती है, लाचारी के भेष में | द्रौपदी, कब तक कृष्ण-कृष्ण गुहराओगी | आ जाओ तुम अब काली  के वेश में | रक्तबीज की भांति हैं ये कामुक पिशाच | अट्टहास करो इनके वध के शेष में | ---केश्वेंद्र --- ५-५-२०१३

हर चुप्पी में इक चीख छुपी होती है

हर चुप्पी में इक चीख छुपी होती है| हर सन्नाटे में इक गूंज दबी होती है |   इन चीखों को, इन गूंजों को बिरले कोई ही सुनता है | कुछ आवाजों की दस्तक बस, दिल के दरवाजे होती है|   जो सुनता है और गुनता है- बैचैनी में सर धुनता है | जिसको सुनना था-वो बहरा, उसके कानों पर है पहरा |   फिर कोई भगतसिंह आता है, संग अपने धमाके लाता है | बहरे कानों की यही दवा, ये सीख हमें दे जाता है |   इन चीखों को, इन गूंजों को, अपने दिल में घर करने दे | सत्ता से जनता नहीं डरे, सत्ता को जनता से डरने दे |  

एक बलात्कारी दिन

    एक बलात्कारी दिन, आया, आके बीत गया | रोया ख़बरें सुन-सुन कर, मन मानों रीत गया ||   बच्चियों तक को न बख्शा इन वहशी दरिंदों ने | खुदा शायद हार गया, शैतान जीत गया ||   छीन ली कुछ मासूमों की मुस्कान सदा के लिये | खिलखिलाहटें थमीं और जीवन-संगीत गया ||   सत्ता के कानों पे जूं तक नहीं रेंगी | औरत का कोई नहीं, ऐसा परतीत गया ||   जनता का गुस्सा भी क्षणिक-सा उबाल है | नारे लगे, कैंडल जले और लावा रीत गया ||   ---केशवेन्द्र---

ग़ज़ल - आजतक कदर न की पैसे की

  आजतक कदर न की पैसे की | और कहता रहा-तेरी ऐसे की, तैसे की ||   दुनिया देख-देख के सर धुनती है | क्या करे समझ का मुझ जैसे की ||   बीन बजा-बजा के लोग हार गए | समझ में आए तब ना कुछ भैंसे की ||   दुनिया जलती है बहुत, मेहनत देखती है नहीं | पूछती फिरती है, ‘इतनी तरक्की कैसे की’ ?   मुस्कानें बांटीं, गम बटोरे और चलते रहे | जिन्दगी हमने अपनी गुजर-बसर ऐसे की ||

समंदर का गीत

समंदर आज भी वही गीत गाता है जो उसने पहली बार गाया था जब वो अस्तित्व में बस आया था | समंदर की रेत के हर कण और समंदर का हर जड़ -चेतन मिलेंगे तुम्हें उसी आदिम गीत में मगन | फिर इसमें अचरज क्यूँ हो कि समंदर जब भी लहरों के सुर में गाता है हर सुनने वाला गीतमुग्ध रह जाता है | २१-७-२०११

त्रिवेणी- शब्द जो पहले सजाते थे, अब लजाते हैं

किसी को नेता कह दो तो गाली लगती है | किसी को बाबू कह दो, साली, लगती है | शब्द जो पहले सजाते थे, अब लजाते हैं |

खुदा हाफिज़ दामिनी

दरिन्दे  भरे पड़े हैं दुनिया में  संभल के चलना माँओं -बहनों-बेटियों  खुदा हाफिज़. सरकार से ना रखो कोई उम्मीद  तो ही अच्छा. सरकार को वैसे भी कई जरूरी काम है. सरकार को इज़्ज़त से क्या, बस वोट चाहिए. न्याय की देवी की आंखों पे भी पट्टी है बँधी. और उसके यमदूतों से बचकर ही रहो, इसी में खुदा की रहमत है. हाँ अगर चिड़िया के खेत चुग जाने                      के बाद पछताने का और    वक्त और पैसा लुटाने का इरादा हो तो न्याय की दहलीज़ पे स्वागत है तुम्हारा.         पुलिस को देख् के झूठे dhandhas ना पालना मन में. वो तो होते हुए भी ना होने के बराबर है. आजकल तालियाँ बड़ी अच्छी वो बजाते हैं, और, नेताजी के जूते साफ करते पाये जाते हैं. प्रशासकों की तरफ़ भी उम्मीद से  मत देख बैठना बेचारे कितने सालों से रीढ़ की हड्डी तलाशे फिरते हैं. सन् पछत्तर में नसबंदी के बहाने  इनकी रीढ़ की हड्डी ही गायब कर दी, तबसे ये ...