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उसने देखा इस नज़र से

उसने देखा इस नज़र से | मैं गिरा अपनी नज़र से || अधर में बड़ी देर डोला | टूटा पत्ता जब शज़र से || रात कितनी बाकी है अभी | पूछे सन्नाटा गज़र से || साथ रखना दुआएँ माँ की | बचाएंगी बुरी नज़र से || नज़र में ना चुभो किसीकी | सबको बरतो इस नज़र से || नज़र न आए यार मेरा | मगर नहीं है दूर नज़र से || आईना मैं हूँ तुम्हारा | मुझको देखो इस नज़र से || दिल में अंक गई नजरे उसकी | उसने देखा इस नज़र से ||

नव वर्ष २०१२

वर्ष है नया मगर हम है नए क्या| हम नए नहीं हैं गर तो फर्क क्या हुआ || उम्मीद है कि इस नए वर्ष में हम भी नूतन बनने की कोशिशों में लगे रहेंगे .. हम जो हैं, उससे आगे 'जो होना चाहते हैं' की और अपने पग धरते रहेंगे. नए वर्ष में आपकी आँखों को सपनों की सौगात मिले, आपके सपनों को पंख मिले और आपकी परवाज को देख आसमां भी इन्द्रधनुषी मुस्कान से भर उठे, इसी दुआ के साथ आप सबों को और आपके सारे सपनों को , आपके सारे अपनों को नव वर्ष की ढेर सारी शुभकामनाएँ |

जीवन का ये ही अफसाना

२६-११-२०११ जीवन का ये ही अफसाना | राग नया है, साज पुराना || जीवन की गति परिचित सी है, पथ सारे जाने-पहचाने, पंख मिले हैं हम सब को, पर भूल गए है पर फैलाना | जीवन का ये ही अफसाना | राग नया है, साज पुराना || रिश्तों के सोते सूखे हैं, घर-अपने पीछे छूटे हैं , पैसे की दीमक ने शुरू किया है, घर की दीवारों को खाना | जीवन का ये ही अफसाना | राग नया है, साज पुराना || माँ –बाबूजी अब गाँवों में, बेटे शहरों के बाशिंदे; मोबाइल पर ही अब तो चलता है रिश्तों का निभाना | जीवन का ये ही अफसाना | राग नया है, साज पुराना || पिज्जा से अब भूख मिटे है और पेप्सी से प्यास, शायद बच्चे भूल ना जाये कैसा होता माँ का खाना | जीवन का ये ही अफसाना | राग नया है, साज पुराना || फेसबुकी इस दुनिया में अब मिलना भी आभासी है, जीने को मुल्तवी करते, करके ‘फुर्सत नहीं है’ का बहाना | जीवन का ये ही अफसाना | राग नया है, साज पुराना ||

इटली आया नहीं, फ्रांस गया नहीं-केबीसी के पंच कोटि विजेता सुशील कुमार की स्वर्णिम सफलता

इटली आया नहीं, फ्रांस गया नहीं-केबीसी के पंच कोटि विजेता सुशील कुमार बिहार के मोतिहारी के रहनेवाले सुशील कुमार ने एक मिसाल पेश की है भारत के संघर्षरत युवाओं के सामने. महात्मा गाँधी की कर्मभूमि चम्पारण से सम्बन्ध रखनेवाले और महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना में कम्प्युटर ऑपरेटर की नौकरी करनेवाले यह युवक भारत के युवाओं के लिए एक प्रेरणा बनकर उभरा है. हालाँकि कहनेवाले यह कह सकते हैं कि यह सफलता लौटरी में मिली सफलताओं जैसी ही है और ऐसे मौके हर किसी को नहीं मिलते. मगर, इस शख्श ने इस सफलता के लिए ११ सालों तक इंतजार किया है और इस मंच तक पहुचने के लिए हर संभव प्रयास उसने किये. अपने परिवार को सहारा देने के लिए स्कूली बच्चों को ट्यूशन पढ़ाने तक का काम किया. इसलिए उनकी इस सफलता को उनके संघर्ष के आईने में देखते हुए उसे समुचित सम्मान दिए जाने की जरुरत है. सुशील ने जिस हिसाब से इस खेल को खेला और जितने रिस्क लिए, वो भी काबिल-ए-तारीफ है. १ करोड़ के प्रश्न तक वो बस एक लाइफ लाइन प्रयोग कर पहुचे. उन्होंने अच्छे रिस्क भी लिए और किस्मत भी उनपर मेहरबान रही. कई बार उन्होंने अपने इन्ट्य...

जाना जगजीत का

जगजीत के जाने से गज़लों की दुनिया में जो सूनापन छाया है, उसके लिए यही कह सकते हैं कि जिंदगी की धूप से राहत देनेवाला गज़लों का सबसे घना सायादार वृक्ष आज नही रहा. जगजीत आज जहां चले गए हैं, वहां से चिट्ठी या सन्देश तो नही आने वाला पर उनकी गज़लों के सुर अब भी हम तक पहुचते रहेंगे. जगजीत के होठों ने जिन गज़लों को छुआ, उन्हें अमर कर डाला. उनकी गज़लों ने ना जाने कितने लोगों को प्यार का पहला खत लिखना सिखाया तो कितने लोगों को उनके बचपन की कागज की कश्ती और बारिश के पानी की याद दिला दी. उनकी गज़लों ने लोगों को हंसाते-रुलाते जिंदगी के हर रंग से रूबरू करवाया. उनके जाने पर तो बस इतना ही कह सकते हैं- "तुम ये कैसे जुदा हो गए हर तरफ हर जगह हो गए."

समंदर का गीत

समंदर आज भी वही गीत गाता है जो उसने पहली बार गाया था जब वो अस्तित्व में बस आया था | समंदर की रेत के हर कण और समंदर का हर जड़ -चेतन मिलेंगे तुम्हें उसी आदिम गीत में मगन | फिर इसमें अचरज क्यूँ हो कि समंदर जब भी लहरों के सुर में गाता है हर सुनने वाला गीतमुग्ध रह जाता है | २१-७-२०११

जिंदगी से क्या गिला

जिंदगी से क्या गिला | जो मिला है, सो मिला || दुःख से मुरझाया था मन | आज देखो फिर खिला || राजे-महराजे गए | खंडहर बचा है अब किला || उतरा नशा अब जिंदगी का | आके तू, जरा सा पिला || मुर्दों से फिरते हैं लोग यहाँ | कुछ भी कर, तू उन्हें जिला || मैं छोड़ आऊंगा सारा जहां | तू होगी, ये दिलासा तो दिला || प्यार-रिश्तों का जहाँ | पल भर में गया है ज्यूँ बिला || तेरी आँख में आंसू नही | तेरा ह्रदय है या है शिला || ताश के पत्तों की ढेरी है दुनिया ये | तू जरा सा इसको दे हिला || गम ना कर कीचड़ का तू | बस, कुछ कमल तू दे खिला || (१९-०८-२०१०)